देश-धर्म इस राष्ट्र को मत जकड़ो जंजीरों में

लेखक : गजेन्द्र सिंह शेखावत

देश-धर्म इस राष्ट्र को मत जकड़ो जंजीरों में ।
इसके वैभव के लिए, गला कटाया है यहाँ, असंख्य वीरों ने ।

सफेदपोश नौकरशाहों, मत इसको अब झंझोड़ो तुम |
सरहद पर बैठा हरवक्त रक्षक, उसको भी याद रखो हरदम ।

शीत-ग्रीष्म के मौसम में वो ताने खड़ा संगीन वहां ।
तुम संसद में लड़ते हो, गीदड़ की भांति यहाँ ।

शहीद की चिता पर जाकर कहा, हर संभव मदद दिलवाएंगे ।
क्या कभी कहा किसी नेता ने, पुत्र अपना हम भी सरहद पर भिजवाएंगे ।।

भ्रष्टाचार-दुराचार की प्राकाष्ठित सीमा पार हुई |
रोज देख समाचार-पत्रों को, माँ भारती अब शर्म सार हुई ।

विश्वगुरु था, अगुआ विश्व का इसका भी कुछ ध्यान करो |
इसकी गौरव कीर्ति का कुछ तो तुम सम्मान करो |

दूषित राजनीति के लश्कर से मत बांधो प्राचीरों को ।
मत उकसाओ धर्म वाद पर, ना बांटों मंदिर-पीरों को ।

लेखक : गजेन्द्र सिंह शेखावत

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