दुष्प्रचार का शिकार : जयचंद

किसी भी धोखेबाज, देशद्रोही या गद्दार के लिए जयचंद नाम मुहावरे की तरह प्रयोग किया जाता है| साहित्यिक रचनाएँ हो, कवियों की काव्य रचनाएँ हो या देशवासियों के आम बोलचाल की भाषा में धोखेबाज, गद्दार, घर के भेदी, देशद्रोही को जयचंद की तुरंत उपमा दे दी जाती है| बेशक उपमा देने वाला व्यक्ति जयचंद के बारे में कुछ जानता तक नहीं हो, यही क्यों ? खुद जयचंद के वंशज बिना जाने कि वे भी उस जयचंद के ही वंशज है जिस जयचंद को पृथ्वीराज गौरी के युद्ध में साहित्यकारों, कवियों आदि ने देशद्रोही घोषित पृथ्वीराज की हार का ठीकरा झूंठ ही उसके सिर पर फोड़ दिया, जाने अनजाने सुनी सुनाई बातों के आधार पर देशद्रोही ठहरा देते है और अपने आपको उसका वंशज समझ हीनभावना से ग्रसित होते है|

जयचंद पर आरोप है कि उसनें गौरी को पृथ्वीराज पर आक्रमण करने हेतु बुलाया और सैनिक सहायता दी लेकिन समकालीन इतिहासों व पृथ्वीराज रासो में कहीं कोई उल्लेख नहीं कि गौरी को जयचंद ने बुलाया और सहायता दी| फिर भी जयचंद को झूंठा बदनाम किया गया उसे गद्दार, देशद्रोही की संज्ञा दी गई जिसे एक वीर ऐतिहासिक पुरुष के साथ न्याय कतई नहीं कहा जा सकता है|

आईये पृथ्वीराज की हार के कुछ कारणों व उस वक्त उसके साथ गद्दारी करने वालों व्यक्तियों के ऐसे ऐतिहासिक तथ्यों पर नजर डालते है जो साबित करते है कि जयचंद ने कोई गद्दारी नहीं की, कोई देशद्रोह नहीं किया| दरअसल पृथ्वीराज और जयचंद की पुरानी दुश्मनी थी, दोनों के मध्य युद्ध भी हो चुके थे फिर भी पृथ्वीराज द्वारा संयोगिता से शादी के बाद वह जयचंद का दामाद बन चुका था और यदि जयचंद पृथ्वीराज को मारना चाहता तो संयोगिता हरण के समय कन्नोज की सेना से घिरे पृथ्वीराज को जयचंद आसानी से मार सकता था, पर उसनें पृथ्वीराज को संयोगिता के साथ घोड़े पर बैठे देख, सुरक्षित रास्ता दे जाने दिया और उसके बाद अपने पुरोहित दिल्ली भेजे जिन्होंने विधि-विधान से पृथ्वीराज-संयोगिता का विवाह संपन्न कराया|

तराइन के दुसरे युद्ध में चूँकि पृथ्वीराज ने जयचंद से किसी भी तरह की सहायता नहीं मांगी थी अत: जयचंद उस युद्ध में तटस्थ था, वैसे भी पृथ्वीराज उस युद्ध में इतने आत्मविश्वास में थे कि जब गुजरात के चालुक्य शासक भीमदेव ने सैनिक सहायता का प्रस्ताव भेजा तो पृथ्वीराज ने उसकी जरुरत ही नहीं समझी और संदेश भिजवा दिया कि गौरी को तो वह अकेला ही काफी है| ऐसी परिस्थितियों में पृथ्वीराज द्वारा जयचंद से सहायता मांगने का तो प्रश्न ही नहीं उठ सकता|

  • फिर कौन थे वे देशद्रोही और गद्दार जिन्होंने गौरी को बुलाया ?

पृथ्वीराज रासो के उदयपुर संस्करण में गौरी को ख़ुफ़िया सूचनाएं देकर बुलाने वाले गद्दारों के नाम थे- नियानंद खत्री, प्रतापसिंह जैन, माधोभट्ट तथा धर्मयान कायस्थ जो तंवरों के कवि व अधिकारी थे| पंडित चंद्रशेखर पाठक अपनी पुस्तक “पृथ्वीराज” में माधोभट्ट व धर्मयान आदि को गौरी के भेजे जासूस बताया है जो किसी तरह पृथ्वीराज के दरबार में घुस गए थे और वहां से दिल्ली की सभी गोपनीय ख़बरें गौरी तक भिजवाते थे|

जब संयोगिता हरण के समय पृथ्वीराज के ज्यादातर शक्तिशाली सामंत जयचंद की सेना से पृथ्वीराज को बचाने हेतु युद्ध करते हुए मारे गए जिससे उसकी क्षीण शक्ति की सूचना इन गद्दारों ने गौरी तक भिजवा उसे बुलावा भेजा पर गौरी को इनकी बातों पर भरोसा नहीं हुआ सो उसनें फकीरों के भेष में अपने जासूस भेज सूचनाओं की पुष्टि करा भरोसा होने पर पृथ्वीराज पर आक्रमण किया|

जम्मू के राजा विजयराज जिसका कई इतिहासकारों ने हाहुलिराय व नरसिंहदेव नाम भी लिखा है, हम्मीर महाकाव्य के अनुसार “घटैक” राज्य के राजा ने गौरी की युद्ध में सहायता की| घटैक राज्य जम्मू को कहा गया है| पृथ्वीराज रासो में भी जम्मू के राजा का गौरी के पक्ष में युद्ध में आना लिखा है, रासो में इसका नाम हाहुलिराय लिखा है जो युद्ध में चामुण्डराय के हाथों मारा गया था| तबकाते नासिरी के अनुसार- कश्मीर की हिन्दू सेना गौरी के साथ युद्ध में पृथ्वीराज के खिलाफ लड़ी थी|

Maharaj Jaichand
Maharaj Jaichand

इतिहासकारों के अनुसार पृथ्वीराज का सेनापति स्कन्ध भी पृथ्वीराज से असंतुष्ट था जब गौरी ने पृथ्वीराज को मारने के बाद अजमेर का राज्य पृथ्वीराज के बेटे गोविन्दराज को देकर अपने अधीन राजा बना दिया था तब स्कन्ध ने पृथ्वीराज के भाई हरिराज को लेकर अजमेर पर आक्रमण किया और उसके बाद जब गोविन्दराज रणथम्भोर चला गया तब भी स्कन्ध ने हरिराज के साथ मिलकर उसका पीछा किया तब पृथ्वीराज के बेटे गोविन्दराज की कुतुबुद्दीन ऐबक ने सहायता की थी| अत: सेनापति स्कन्ध का असंतुष्ट होना भी पृथ्वीराज की हार का कारण हो सकता है और उसका नाम भी गद्दारों की सूची में होना चाहिये था|

राजस्थान के जाने माने इतिहासकार देवीसिंह मंडावा अपनी पुस्तक “सम्राट पृथ्वीराज चौहान” में लिखते है प्रारंभ में गौरी का इरादा था- पृथ्वीराज को अपने अधीन राजा बना दूँ तथा उसने पृथ्वीराज को कैद से मुक्त भी कर दिया था, ऐसा ताजुल मासिरी में लिखा है| शायद गौरी ने इतने बड़े साम्राज्य पर नियंत्रण करने में स्वयं को असमर्थ महसूस किया हो| यह बात इससे सिद्ध होती है कि गौरी ने प्रारंभ में जो सिक्का (मुद्रा) निकाला वह चौहान शैली का था| जिस पर एक तरफ अश्वारोही और पृथ्वीराज देव अंकित था तथा पृष्ठ भाग में बैठा हुआ बैल और लेख “श्री महमद साम” दिया है|

प्रबंध चिंतामणि, प्रबंध संग्रह और ताजुल मासिरी के अनुसार पृथ्वीराज के एक मंत्री प्रतापसिंह पुष्पकरणा ने गौरी को सूचना दी कि पृथ्वीराज मुसलमानों का घोर विरोधी है और नफरत करता है| ताजुल मासिरी लिखता है- अजमेर में पृथ्वीराज को कैद से गौरी ने छोड़ दिया था किन्तु इस्लाम के प्रति घृणा तथा किसी संभावित षड्यंत्र की आशंका हो जाने पर गौरी ने अजमेर में ही पृथ्वीराज का तलवार से सिर कटवा दिया था| हम्मीर महाकाव्य में भी पृथ्वीराज का अजमेर में ही मारा जाना लिखा है|

युद्ध के दौरान घटी घटनाओं व विभिन्न इतिहास पुस्तकों में पृथ्वीराज की हार के कारणों के उपरोक्त तथ्यों पर विचार करने से स्पष्ट हो जाता है कि इस युद्ध और उसमें हार के प्रति जयचंद की कोई भूमिका नहीं थी| उसे तो मुफ्त में ही पृथ्वीराज से दुश्मनी होने के चलते बदनाम कर दिया गया| जो उस ऐतिहासिक पात्र के साथ अन्याय है|

  • पृथ्वीराज गौरी की दुश्मनी का असली का कारण

सोने की चिड़िया के रूप में ख्याति प्राप्त भारत में धन प्राप्ति के चक्कर में विदेशी लुटरों के आक्रमण सतत चलते रहे है गौरी को भी धन लिप्सा थी कि भारत में अथाह धन है जिसे लूटकर मालामाल हुआ जा सकता है, अत: भारत पर आक्रमण करने का उसका पहला इरादा यह भी समझा जा सकता है, फिर भी सवाल उठता है कि उसनें पृथ्वीराज चौहान जैसे शक्तिशाली सम्राट से सीधी टक्कर क्यों ली| जबकि वह छोटे-छोटे अनेक राज्यों को आसानी से लूटकर अपना खजाना भर सकता था|

पंडित चंद्रशेखर पाठक की “पृथ्वीराज” नामक अपनी पुस्तक के अनुसार – पृथ्वीराज ने शिकार खेलने के लिए नागौर के पास वन में डेरा डाल रखा था तब वहां गौरी का एक चचेरा भाई “मीर हुसैन” चित्ररेखा नाम की एक वेश्या के साथ आया| यह वेश्या सुन्दरता के साथ अति गुणवती थी, वीणा बजाने व गायन में वह पारंगत थी| गौरी ने उसकी सुंदरता के अलावा उसके गुण नहीं देखे पर मीर हुसैन उसे उसके गुणों के चलते चाहने लगा अत: वह उसे साथ लेकर गजनी से भाग आया| नागौर के पास शिकार खेल रहे पृथ्वीराज से जब मीर हुसैन में सब कुछ बता शरण मांगी तब उस उदारमना हिन्दू सम्राट ने अपने सामंतों से सलाह मशविरा किया और शरणागत की रक्षा का क्षत्रिय धर्म निभाते हुए उसे शरण तो दी ही साथ ही उसे अपने दरबार में अपने दाहिनी और बैठाने का सम्मान भी बख्शा, यही नहीं पृथ्वीराज ने मीर हुसैन को हांसी व हिसार के परगने भी जागीर में दिये|

इन सब की सूचना धर्मयान कायस्थ और माधोभट्ट के जरिये गौरी तक पहुंची तब गौरी ने संदेशवाहक भेजकर मीर हुसैन व चित्ररेखा को उनके हवाले करने का संदेश भेजा जिसे पृथ्वीराज व उसके सामंतों में शरणागत की रक्षा का अपना धर्म समझते हुए ठुकरा दिया|
चंदरबरदाई के अनुसार पृथ्वीराज- गौरी के आपसी बैर का मुख्य कारण यही था|

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