दिल्ली के चर्चित घृणित एवं वीभत्स कांड से सबक लेना चाहिए

“कुँवरानी निशा कँवर”
मैं सबसे पहले यह निवेदन कर देना चाहती हूँ कि- इस दुर्दांत कांड के उन पांच -छ: राक्षसों के इस दुष्कृत्य के लिए आज तक की सुझायी गयी सभी सजाएं बहुत ही कम है| मेरा तो इस फाँसी की सजा से कई गुना ज्यादा सजा देने का प्रस्ताव है, जिसे सुनकर शायद आपको अटपटा लगे| किन्तु न्यायोचित एवं तथ्य परक है वे सभी सजाये ! खैर इनके बारे में आगे चल चर्चा करेंगे| सर्व प्रथम हम चर्चा करते है कि -“इस दुर्दांत कांड का सबसे ज्यादा प्रसंशा प्राप्त कर रहा वह तथाकथित “दोस्त” जिसे आजकल कुछ लोग “वीर”, “साहसी” , “यौद्धा”, और न जाने कितनी ही उपाधियों से विभूषित करने में लगे है ! क्या वास्तव में “दोस्त” का कर्तव्य मात्र इतना ही रह गया है ? कि किसी पीवीआर में फिल्म दिखादे , किसी मनोरंजन के स्थान पर घूम फिर ले, और जब किराया और जेब में पैसे कम पड़ जाये तो टैक्सी या ऑटो छोड़ कर किसी भी बस में साथ ले जाये और जब कोई गन्दी गाली देने लगे तो एक बार तो जोश भी दिखादे किन्तु उसके बाद मात्र 5-6 शराबियों, जिनके पास कोई “धार-दार हथियार या फायर आर्म” भी नहीं, उनसे भी जिस महिला को वह घुमने फिरने के लिए तो मित्र कह रहा है उसे बचाने में पूरी तरह असफल रहा हो फिर भी वह “वीर, साहसी और योद्धा”है ???????

तर्क दिया जा रहा है कि यह “महा योद्धा “एक रोड की चोट से बेहोश होगया था | किसी महिला चाहे वह मित्र न भी होती उसकी अस्मत लुटने पर हो और मात्र 5-6 शराबियों से कोई अपने ऊपर बेहोशी को हावी होने दे, क्या फिर भी वह साहसी है ???? वीर है ???? योद्धा है ?????

फिर या तो लोग इन शब्दों का अर्थ ही नहीं जानते या फिर उन्हें ज्ञान ही नहीं है कि न्याय,सत्य और धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष करने वालो में कितनी शक्ति होती है ????? उन्हें कोई रोड मुर्च्छित नहीं कर सकती! उनके सामने केवल 5-6 शराबी और गुंडे तो क्या असंख्य लोग भी शरीर के अन्दर प्राण रहने तक किसी महिला को बेआबरू तो दूर की बात, नजदीक भी नही आ सकते|
अब मै एक सवाल पूंछती हू कि इस तथाकथित “दोस्त” की अपनी बहिन या माँ या फिर पत्नि या फिर पुत्री रही होती वह पीड़ित महिला, तो क्या तब भी या केवल इतना ही प्रयास करता जितना अब इसने किया था ?????????

प्रत्येक महिला, बालिका या नारी और खास-तौर क्षत्राणी इस सवाल को अपने मन में बार-बार दोहराएँ कि क्या तब भी ऐसे तथाकथित दोस्तों का मात्र इतना सा ही प्रयास होगा ???? यदि नहीं तो फिर यह जो आजकल अपने आपको आधुनिक दिखने को होडा-होड़ ऐसे तथाकथित दोस्त बना रही है! वे यह जानले कि भाई,पिता ,पुत्र या पति का स्थान यह “तथाकथित दोस्त” कभी नहीं ले सकते!

मैं यह मानने के लिए तनिक भी तैयार नहीं कि यह तथाकथित दोस्त बेहोश होगया था ! टीवी पर कर जिस ढंग से यह बयान दे रहा था और उस दुर्दांत घटना का आँखों देखा हाल सजीव बता रहा था , पुलिस के लोग क्या क्या बाते कर रहे थे ?, कितने मिनट बाद कौन-कौन पीसीआर आयी ?, 5-6 गुंडों में किसने क्या क्या दुष्कृत्य किया ? इस सबका विवरण देते समय यह कही से नहीं लग रहा था कि यह बेहोश रहा होगा !! क्योंकि बेहोशी की हालत तो दूर की बाते है केवल निद्रा में होने वाले व्यक्ति को भी ऐसा कुछ सुनाई या दिखाई नहीं पड़ सकता ! अब इसके दो ही अर्थ है कि – या तो वह अपने प्राणों के भय-वश “विवश” था यह सब कुछ देखने और सुनने के लिए या फिर वह झूंठ बोल रहा है| अब यदि वह “भय-वश विवश” था तो वह पूर्णतः सहानुभूति का हक़दार तो हो सकता है किन्तु “वीर”,”साहसी”,”योद्धा” जैसे शब्दों या उपमा का हक़दार कभी नहीं होसकता ! क्योंकि भय केवल कायरों को विवश करता है, वीरों, साहसियों व योद्धाओं को नहीं ! और यदि वह झूंठ हो बोल रहा है तब तो कहानी ही ख़त्म हो गई | झूंठे की किस बात का ऐतबार करे ? और किसका नहीं ??

कुछ लोग ऐसे भी मिले जिन्होंने तर्क दिया की 5-6 आदमियों से एक “बेचारा” कैसे लड़ सकता था ? तर्क में दम हो सकता है, मैं इससे इंकार नहीं करती , किन्तु यह सामान्य स्थिति में सही तर्क है कि “5-6 आदमियों से एक बेचारा न लड़ सके” किन्तु यह एक अति दुर्लभ और विशेष परिस्थिति थी और यहाँ एक महिला की इज्जत और जान पर बन आई थी ! ऐसी स्थिति में भी यदि यही तर्क रहा, तो फिर यह एक बहाना हो जायेगा और बहाना केवल बुद्धि से उपजी हुयी कायरता होती है ,,,वीरता, साहस या कर्तव्य भावना केवल आत्म -बल से निभाए जाते है ! उस तथाकथित दोस्स्त ने 5-6 गुंडों में से एक को भी नहीं मारा, यानि वे सभी जीवित है, एक को भी अंग-भंग नहीं किया, यहाँ तक कि जो बस चालक था उसका संतुलन तक नहीं बिगाड़ पाया, और स्वयं भी अपने प्राण नहीं दे पाया फिर वह कैसे “कायरता से बचकर वीरता की श्रेणी में हो गया ?

किसी महिला के साथ इतना दुर्दांत और वीभत्स, रोंगठे खड़े करने वाला कांड हो रहा हो और उसकी चीखें जिसकी बेहोशी नहीं तोड़ पाए कम से कम कोई “क्षत्राणी” तो उसे कभी भी वीर नहीं कह सकती ! यह पीड़ित बालिका नि:संदेह “वीरांगना” थी “साहसी” थी, एक “योद्धा” थी! जिसने उन गुंडों से इस “तथाकथित दोस्त” की जान बचायी ,उन राक्षसों से कोई समझौता नहीं किया| स्वयं लुट गयी, मर गयी, बर्बाद हो गई लेकिन अपनी अस्मत के लिए आखिरी दम तक लड़ती रही ! यह नि:संदेह एक वीरांगना का ही कार्य था ! किन्तु साथ ही साथ एक मूक संदेश दे गयी सभी को कि “नारी सुरक्षित है तो केवल अपने आत्म-बल के साथ” या फिर अपने भाई के साथ, अपने पिता के साथ, अपने पति के साथ, अपने पुत्र के साथ ! “कोई कानून, कोई सरकार, कोई पुलिस और कोई तथाकथित दोस्त नहीं दे सकता आपको सुरक्षा|”

अब बात करते है कि उन राक्षसों के इस कुकृत्य के लिए क्या दण्ड न्याय हो सकता है| एक बार एक कोल्ड ड्रिंक की बोतल में कीड़ा पाया गया, एक चोकलेट के अन्दर कीड़ा निकला, तो उनकी कंपनीयों को दोषी ठहराया गया और उन्हें जो भी जुर्माना किया, कम्पनी के मालिकों को भुगतना पड़ा और यह सही भी है| हम सभी ने बचपन से एक कहावत सुनी है कि “चोर को नहीं चोर की माँ को मारों ” अर्थ बिलकुल साफ़ है कि “माँ बच्चों की निर्माता” है यह स्वयं राजकन्या मदालसा ने सिद्ध कर दिया था ! इन अधम, नीच, नरपिसाचों से भी ज्यादा दोष उनके “माता-पिता और उस परिवेश का है जहाँ इनका निर्माण” हुआ है ! अतः इनकी माताओं को, पिताओं को इनके सामने लाकर सार्जनिक रूपसे इनकी “आत्माओ को झकझोर सके| ऐसे दंड “देने के बाद, इनका कम से कम प्रति-दिन “1 किलोग्राम मांस शरीर से निकाल कर कुत्तों को खिलाया जाये और फिर नमक मिर्च भर दी जाये|” ऐसे करके करके कोई 20-21 दिन तक इन्हें जीवित रखा जाये और बाकायदा इनके आँखों देखा हाल सभी चैनलों पर प्रसारित किया जाये, इनसे इनका अनुभव पुछा जाये और उसे उदाहरण के रूप में इस्तेमाल किया जाये|

आज लोग कानून की बातें करते है, उसके प्रावधानों की बाते करते है| मुझे नहीं मालूम लोग कैसे उन कानून बनाने वालों को विद्धवान कह देते है?? मेरी नजर में तो वे अदूरदर्शी और न्याय से पूरी तरह से अपरिचित, पूर्वाग्रहों से ग्रषित मात्र थे ,,,जो भारतीयों के ऊपर अपनी संस्कृति को लादना चाहते थे ! हर अपराध और प्रकरण की अलग अलग परिस्थिति और उसके मौलिक कारण होते है !उन्हें किसी बंद डिब्बे जैसे नियमो में नहीं बांधा जा सकता है ! यह “नाबालिग” यह कौनसा ऐसा फार्मूला है कि ठीक “18 वर्ष के बाद व्यक्ति में पूरी समझदारी आ जायेगी और उससे 1 क्षण पूर्व वह बालिग” नहीं है ??? समाज शास्त्र के हिसाब से भी अलग-अलग परिवेश और परिस्थिति में अलग अलग उम्र में व्यक्ति में समझदारी आती है ! फिर इसमें उम्र कहाँ से आगई ????? क्या हम ऐसी न्याय प्रणाली विकसित नहीं कर सकते, जो किसी भी “क़ानूनी बंधन या लिखित विधानों” के बजाये हर प्रकरण एवं अपराध के लिए यथोचित न्याय देने में सफल हो ,,,,,,,,,,,,खैर यह लम्बी बहस है और यह “न्यायोचित राज्य-व्यवस्था ” की स्थापना के बगैर वर्तमान परिस्थिति में शायद कल्पना से परे है !

इस आलेख का एक ही उद्देश्य है कि इस वीभत्स कांड के बाद हम यह जरुर सबक ले कि किसी भी नारी का यदि कोई पुरुष सही मायने में मित्र हो सकता है तो वह केवल उसके अपने भाई,पिता,पति या पुत्र ही हो सकतें है न कि कोई और इस तरह का तथाकथित दोस्त|

“कुँवरानी निशा कँवर”
श्री क्षत्रिय वीर ज्योति

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