तुम सब जानती व्यथा हमारी किसको पुकारें माँ

तुम सब जानती व्यथा हमारी किसको पुकारें माँ |
सपनो की नगरी सूनी है उजड़ा उपवन माँ ||

प्राण पपीहे ने पी पी करके नभ मंडल है छाना |
प्यास बुझाने को आतुर यह जीवन एक बहाना ||
चाँद सितारे दे गए धोखा ज्योति न दिखती माँ |

नाज हमें है इन गीतों पर इस स्वर को ले लो |
हम लोगों के जीवन में जो अच्छा हो वो ले लो ||
भक्ति हमारी तेरी ममता कौन बड़ी है माँ |

नयन सामने पग पीछे यह जीवन की दुविधा |
तेरे यज्ञकुण्ड में लाखों अरमानो की समिधा ||
हम निराश शरणागत तेरे क्या मर्जी है माँ |

हमने सुना है विपदा में गज ने पुष्प चढाया |
छोड़ गरुड़ विष्णु भागे थे ग्राह को मार गिराया ||
हम दुखियों के आर्तनाद पर अब सिंह छोडो माँ |

नहीं संपदा हमें चाहिए हम है नहीं भिखारी |
हम तो किस्मत के मारे है हाथों किस्मत मारी ||
बड़ी उम्मीदे लेकर आए मत ठुकराना माँ |

कालेज की पढाई के दौरान श्री कल्याण राजपूत छात्रावास में रहते रात आठ बजे रोज यह प्रार्थना करते थे तब यह सोचते थे कि जिसने भी यह प्रार्थना लिखी होगी वो कितना बुद्धिमान व्यक्ति होगा लेकिन जब यही प्रार्थना स्व. श्री तन सिंह जी की पुस्तक ” झंकार “में पढ़ी तो समझ आया कि ऐसी लेखनी तो उन्ही की हो सकती है | ये प्रार्थना मानसपटल पर इतनी बैठ चुकी कि कभी भी मन इसे गुनगुनाने लगता है | भृगु आश्रम ,आबू शिखर में ३ जून १९६० में इस रचना की रचना करने के लिए स्व. श्री तन सिंह जी का हार्दिक आभार |

स्व. श्री तन सिंह जी की अन्य रचनाएँ पढने के लिए यहाँ चटका लगाएँ |

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