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Tuesday, May 24, 2022

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तुम मर्द भी ना कभी नहीं जीतने दोगे मुझे


मैंने देखा है तुमको मेरे सीने पे उभरे माँस को ताकते हुए
तब जब मै घूँघट मे थी, और आँचल लिपटा था दामन पे

घूँघट हटा मैने दुपट्टा ले लिया ,
ये सोचकर की मेरी तैरती आँखे देख
शायद तुम ताकना बंद कर दो .

पर गिरी नजरे ऊपर उठे तो देखो न तुम मेरी आँखों में
तुम तो जैसे गड से गए हो मेरे उभारो में

वक़्त सरका दुपट्टा भी सरक गया सिर से
पर तुम्हारी नजरें है कि सरकने का नाम ही नहीं लेती

तुम्हें आसानी हो जाये इसलिए ,
मैने अब चिथड़ो में लपेट लिया है
इन माँस के टुकड़ों को

लो तुम झट से बोल पड़े-
”कितनी बेशर्म हो गई है आज की औरत ”

तुम मर्द भी ना कभी नहीं जीतने दोगे मुझे|

केसर क्यारी…उषा राठौड़

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31 COMMENTS

  1. संभवतः एक लड़की के पारिवेशिक शर्म की कमी है इस कविता में.
    परन्तु एक खुलापन जो लड़की के शब्दों में है वो प्रशंसनीय है!

  2. बेबाकी से सच्ची बात कहती शानदार प्रस्तुति…मज़ा अगया पढ़कर समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है।

  3. इसे कहते हैं दोधारी तलवार | मैंने एक बार लिखा था:

    तलवार की तो एक तरफ धार होती है,
    बेरहम दुनिया की दोनों तरफ धार होती है |

  4. Dear Usha ji kya aapko pata hai bharat samet dunia main bahut si aisa jagah hai(aadivasi) koi us taraf dekhta hi nahi to stan kya dakna lekin humara samaj prakriti k sahaj niyam man kar apne dogle aadarsh banata hai aap 5000 ka itihas dekh liziye hamare aadarsh aur sanskriti ki pol khul jayegi

  5. बेबाक अभिव्‍यक्ति। पुरुष की मानसिकता को उकेरती। मैंने एक बार एक लेख में लिखा था कि सड़क पर जाते हुए, चाहे कार, स्‍कूटर, मोटर साईकिल अथवा पैदल हम किसी आती जाती युवती को ताकना नहीं भूलते, इसे निहारना नहीं कहा जाएगा। यह तो स्‍त्री काया देखकर पुरुष आंखें गोलायमान हो जाती हैं।

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