तुम मर्द भी ना कभी नहीं जीतने दोगे मुझे

तुम मर्द भी ना कभी नहीं जीतने दोगे मुझे


मैंने देखा है तुमको मेरे सीने पे उभरे माँस को ताकते हुए
तब जब मै घूँघट मे थी, और आँचल लिपटा था दामन पे

घूँघट हटा मैने दुपट्टा ले लिया ,
ये सोचकर की मेरी तैरती आँखे देख
शायद तुम ताकना बंद कर दो .

पर गिरी नजरे ऊपर उठे तो देखो न तुम मेरी आँखों में
तुम तो जैसे गड से गए हो मेरे उभारो में

वक़्त सरका दुपट्टा भी सरक गया सिर से
पर तुम्हारी नजरें है कि सरकने का नाम ही नहीं लेती

तुम्हें आसानी हो जाये इसलिए ,
मैने अब चिथड़ो में लपेट लिया है
इन माँस के टुकड़ों को

लो तुम झट से बोल पड़े-
”कितनी बेशर्म हो गई है आज की औरत ”

तुम मर्द भी ना कभी नहीं जीतने दोगे मुझे|

केसर क्यारी…उषा राठौड़

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