तुम मर्द भी ना कभी नहीं जीतने दोगे मुझे

तुम मर्द भी ना कभी नहीं जीतने दोगे मुझे


मैंने देखा है तुमको मेरे सीने पे उभरे माँस को ताकते हुए
तब जब मै घूँघट मे थी, और आँचल लिपटा था दामन पे

घूँघट हटा मैने दुपट्टा ले लिया ,
ये सोचकर की मेरी तैरती आँखे देख
शायद तुम ताकना बंद कर दो .

पर गिरी नजरे ऊपर उठे तो देखो न तुम मेरी आँखों में
तुम तो जैसे गड से गए हो मेरे उभारो में

वक़्त सरका दुपट्टा भी सरक गया सिर से
पर तुम्हारी नजरें है कि सरकने का नाम ही नहीं लेती

तुम्हें आसानी हो जाये इसलिए ,
मैने अब चिथड़ो में लपेट लिया है
इन माँस के टुकड़ों को

लो तुम झट से बोल पड़े-
”कितनी बेशर्म हो गई है आज की औरत ”

तुम मर्द भी ना कभी नहीं जीतने दोगे मुझे|

केसर क्यारी…उषा राठौड़

31 Responses to "तुम मर्द भी ना कभी नहीं जीतने दोगे मुझे"

  1. sushma 'आहुति'   December 14, 2011 at 4:57 pm

    bhaut hi acchi….

    Reply
  2. chandan singh bhati   December 14, 2011 at 5:00 pm

    lazwab

    Reply
  3. संगीता स्वरुप ( गीत )   December 14, 2011 at 5:57 pm

    सच को कहती अच्छी रचना ..

    "जितने" की जगह जीतने दोगे … आना चाहिए था शायद ..

    Reply
  4. काजल कुमार Kajal Kumar   December 15, 2011 at 12:35 am

    सुंदर.

    Reply
  5. Ratan Singh Shekhawat   December 15, 2011 at 2:19 am

    बहुत बढ़िया और हकीकत बयान करती रचना !

    Reply
  6. padmsingh   December 15, 2011 at 3:37 am

    सटीक …

    Reply
  7. डॉ॰ मोनिका शर्मा   December 15, 2011 at 3:49 am

    गहन अभियक्ति शुभकामनायें

    Reply
  8. प्रवीण पाण्डेय   December 15, 2011 at 4:01 am

    गहरी और सन्नाट।

    Reply
  9. सतीश सक्सेना   December 15, 2011 at 5:41 am

    उफ़…..

    Reply
  10. Gajendra Singh   December 15, 2011 at 6:13 am

    संभवतः एक लड़की के पारिवेशिक शर्म की कमी है इस कविता में.
    परन्तु एक खुलापन जो लड़की के शब्दों में है वो प्रशंसनीय है!

    Reply
  11. घनश्याम मौर्य   December 15, 2011 at 6:15 am

    जिस उन्‍मुक्‍तता से आपने नारी समाज की व्‍यथा को कहा है वह प्रशंसनीय है।

    Reply
  12. Gajendra singh shekhawat   December 15, 2011 at 10:16 am

    सदियों से पुरुष प्रधान समाज में नारी ने यही तो सहा है !

    Reply
  13. Rajput   December 15, 2011 at 4:12 pm

    कड़वा सच , जो कहना और सुनना ही दोनों मुश्किल

    Reply
  14. अमित श्रीवास्तव   December 15, 2011 at 4:56 pm

    an absolute truth.

    Reply
  15. H P SHARMA   December 16, 2011 at 3:25 am

    jeet haar ka pata nahi usha ji par saare mardo ki neeyat ka band baja diya aapne

    Reply
  16. Pallavi   December 16, 2011 at 10:58 am

    बेबाकी से सच्ची बात कहती शानदार प्रस्तुति…मज़ा अगया पढ़कर समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है।

    Reply
  17. अन्तर सोहिल   December 16, 2011 at 11:21 am

    उफ!!!
    दिल पर घूंसा सा मारती रचना
    लेकिन सच
    पूर्णत: सच

    प्रणाम स्वीकार करें

    Reply
  18. Vaneet Nagpal   December 16, 2011 at 12:44 pm

    बढ़िया प्रस्तुति | समाज में विचरते लोगों के डबल स्टैंडर्ड को उजागर करती रचना |

    टिप्स हिंदी में
    क्या किसी भी गज़ल का बहर में होना जरूरी है ?

    Reply
  19. H.K.L. Sachdeva   December 17, 2011 at 6:25 am

    इसे कहते हैं दोधारी तलवार | मैंने एक बार लिखा था:

    तलवार की तो एक तरफ धार होती है,
    बेरहम दुनिया की दोनों तरफ धार होती है |

    Reply
  20. विष्णु बैरागी   December 21, 2011 at 5:56 pm

    यह भी एक नजरिया है। भाव अच्‍छा है, कविता उतनी अच्‍छी नहीं।

    Reply
  21. बी एस पाबला BS Pabla   December 25, 2011 at 4:59 pm

    सटीक

    Reply
  22. rajat   January 26, 2012 at 5:07 pm

    Dear Usha ji kya aapko pata hai bharat samet dunia main bahut si aisa jagah hai(aadivasi) koi us taraf dekhta hi nahi to stan kya dakna lekin humara samaj prakriti k sahaj niyam man kar apne dogle aadarsh banata hai aap 5000 ka itihas dekh liziye hamare aadarsh aur sanskriti ki pol khul jayegi

    Reply
  23. Manish Kr. Khedawat " मनसा "   March 16, 2012 at 1:40 pm

    bahut sunder:D

    Reply
  24. sahsik rachna !

    Reply
  25. अविनाश वाचस्पति   June 3, 2012 at 5:18 pm

    बेबाक अभिव्‍यक्ति। पुरुष की मानसिकता को उकेरती। मैंने एक बार एक लेख में लिखा था कि सड़क पर जाते हुए, चाहे कार, स्‍कूटर, मोटर साईकिल अथवा पैदल हम किसी आती जाती युवती को ताकना नहीं भूलते, इसे निहारना नहीं कहा जाएगा। यह तो स्‍त्री काया देखकर पुरुष आंखें गोलायमान हो जाती हैं।

    Reply
  26. वन्दना   July 4, 2012 at 10:59 am

    ्सच को बेबाकी से कहती अभिव्यक्ति

    Reply
  27. दर्शन कौर धनोय   July 4, 2012 at 1:43 pm

    aek sachchi aatm-vyakti ….

    Reply
  28. दर्शन कौर धनोय   July 4, 2012 at 1:43 pm

    aek sachchi aatm-vyakti ….

    Reply
  29. दर्शन कौर धनोय   July 4, 2012 at 1:53 pm

    मन के अन्दर घुमड़ते ज्वलंत शब्दों की बारिश ..बहुत बढ़िया विचारणीय प्रश्न…

    Reply
  30. jagdish   July 11, 2012 at 7:39 am

    बहुत सुन्दर रचना …:)

    Reply
  31. bharat   September 1, 2012 at 6:26 pm

    ….कड़वे सच को उभारा है आपने इस रचना में…बहुत ही लाजवाब..उषा जी

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published.