तिहावली किले का इतिहास

खंडहर में तब्दील होते जा रहे इस छोटे से किले के भी कभी सुनहले दिन थे | आस पास के कई गांवों पर इस किले से शासन चलता था | इसी किले में कभी कचहरी लगती थी, जिसमें यहाँ के ठाकुर अपने अधीन गांवों के निवासियों का न्याय करते थे और उनके सुख दुःख के भागीदार बनते थे | पर आज यह गढ़ देख रेख के अभाव में खंडहर में तब्दील होने को अग्रसर है और  भविष्य में इसे मलबे के एक टीले में तब्दील होने से मुस्किल से ही कोई बचा पायेगा |

जी हाँ हम बात कर रहे सीकर जिले के तिहावली गांव के इस क्षत विक्षत गढ़ की | तिहावली गांव सीकर से 70 किलोमीटर व शेखावाटी के प्रसिद्ध ओअर्य्तन केंद्र मंडावा से मात्र 6 किलोमीटर दूर है | यह गांव हाल ही में देशभर की मीडिया में सुर्खिया बना था जब इसी गांव में जन्में दिल्ली पुलिस के कांस्टेबल रतन लाल दिल्ली में हुए दंगों में शहीद हो गये थे और उनके परिवार को सांत्वना देने के लिए केन्द्रीय मंत्री गजेन्द्रसिंह शेखावत, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधराराजे सहित बड़े बड़े नेता तिहावली पहुंचे |

सीकर के राजा देवीसिंह जी ने बाघसिंह शेखावत को तिहावली का पट्टा दिया था | बाघसिंह राव शेखाजी के सबसे बड़े पुत्र दुर्गाजी के वंशज थे | दुर्गाजी के वंशजों को टकनेत शेखावत कहा जाता है | टकनेत शेखावतों के शेखावाटी में बहुत सारे ठिकाने हैं, जहाँ आजादी पूर्व वे शासन किया करते थे | दुर्गाजी भीष्म की तरह खुद को मिलने वाले राज्य को त्यागने की प्रतिज्ञा करने व उसका पालन करने के लिए इतिहास में प्रसिद्ध में है |

सीकर राजा से तिहावली की जागीर मिलने के बाद बाघसिंह ने यहाँ प्रशासन चलाने व अपने रहने के लिए यह गढ़ बनवाया | बाघसिंह भी वीर पुरुष थे उन्होंने सिरोही के पास वि. सं. 1837 में नजबकुलीखान के सेनापति अहमद के साथ हुए युद्ध में वीरता प्रदर्शित की थी | इसी वर्ष खाटू में हुए युद्ध में भी बाघसिंह ने सीकर के राजा देवीसिंह के नेतृत्व युद्ध में भाग लिया और वीरता का प्रदर्शन किया | इस किले ने सीकर, रामगढ, बिसाऊ आदि ठिकानों को कई बहादुर किलेदार दिए जिन्होंने उक्त ठिकानों के किलों की सुरक्षा की |

आज इस गांव में बाघसिंह के वंशजों के साथ ही विभिन्न जातियों के लोग निवास करते हैं | तिहावली पंचायत मुख्यालय भी है | इस पंचायत में लगभग छ: हजार मतदाता है जो अपने मताधिकार का प्रयोग कर लोकतंत्र को मजबूती प्रदान कर रहे हैं | गांव सीकर जिले में है पर इस गांव का संसदीय क्षेत्र झुंझुनू है |

चूँकि यह गढ़ गांव में बाघसिंह के कई वंशजों की सामूहिक सम्पत्ति है अत: कोई एक मालिक ना होने के कारण इस दशा को प्राप्त हुआ है | गढ़ में एक भोमिया जी का मंदिर भी है, जो किसी युद्ध में झुझते हुए शहीद हुए थे | भोमिया जी का यह मंदिर गांवों वालों की आस्था का केंद्र है ग्रामीण विभिन्न अवसरों पर यहाँ धोक लगाने आते हैं |

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