ठाकुर हणूंतसिंह डूण्डलोद, मांडण युद्ध के योद्धा

बिसाऊ के ठा. केसरीसिंह शार्दूलसिंहोत के दोनों पुत्रों में ठाकुर हणूंतसिंह ज्येष्ठ थे। उन्होंने डूण्डलोद में गढ़ बनवा कर अपना अलग ठिकाना कायम कर लिया। बिसाऊ पर उनके छोटे भाई सूरजमल का अधिकार रहा। द्वितीय जाट अभियान के समय (सं. 1731 वि.) नवाब नजफकुली ने झुंझुनू पर भी चढ़ाई करनी चाही थी, किन्तु अपने सलाहकारों के परामर्श से रक्तपात से बचने के लिये उसने छल-कपट का सहारा लिया। मित्रता बताकर उसने नवलसिंह नवलगढ और बाघसिंह खेतड़ी के साथ ठाकुर हणूंतसिंह और सूरजमल को भी मिलने बुलाया। शाही सेना के पड़ाव पर पहुंचने पर उनका स्वागत सत्कार किया गया। किन्तु उदयपुर (शेखावाटी) पहुंचते ही उन्हें उनके भाई सूरजमल के साथ ही सेना के पहरे में नजरबन्द कर दिया गया।

शाही सेना के कामां  पहुंचने पर समरू की मध्यस्थता से जब समझौता हुआ तो नवलसिंह तथा बाघसिंह के साथ उन दोनों भाईयों को भी मुक्ति मिली दूसरे ही वर्ष (सं. 1832 वि.) माण्डण के रण क्षेत्र में शाही सेना को करारी हार देकर शेखावतों ने उनके साथ किये गये विश्वासघात और अपमान का पूरा बदला चुका दिया। उस युद्ध में ठाकुर हणूंतसिंह ने अपने सैनिकों के साथ भाग लेकर युद्ध जीतने में पूरा सहयोग दिया।

जयपुर के महाराजा प्रतापसिंह ने अलवर के नवनिर्मित राब राजा प्रतापसिंह नरूका पर चढ़ाई की । बसवा के युद्ध में अलवर की सेना को हराकर जयपुर की सेना राव राजा के गांवों को लूटती हुई राजगढ़ पहुँच गई। ठा. हणूंतसिंह जयपुर की सेना में शामिल थे। दोनों ही तरफ कछवाहों के जन धन ही हानि होते देखकर ठाकुर हणूंतसिंह ने राव राजा को समझाया और उसे जयपुर के महाराजा के सामने झुकने को बाध्य करके समझौता कराया। उनकी उस कार्य कुशलता से जुयपुर नरेश अत्यन्त प्रसन्न हए और उन्हें हाथी सिरोपाव देकर सम्मानित किया।

ठा. हणूंतसिंह की मृत्यु सं. 1841 वि. में हुई। डूण्डलोद के रावल स्व. हरनाथसिंहजी जो राजपूत इतिहास के अध्येता विद्वान थे, इन्हीं हणूतसिंहजी के यशस्वी वंशधर थे।

सन्दर्भ पुस्तक : माण्डण युद्ध : लेखक : ठाकुर सुरजनसिंह झाझड़

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