ठाकुर साहब की अकड़ और मूंछ की मरोड़ का राज

ठाकुर साहब की अकड़ और मूंछ की मरोड़ का राज

ठाकुर साहब की अकड़, मूंछ की मरोड़ आदि के बारे में तो आपने सुना ही होगा| अक्सर गांवों में ठाकुर साहबों की आपसी हंसी मजाक में कह दिया जाता कि- ठाकुर साहब “पेट से आधे भूखे जरुर है पर अकड़ पुरी” है| दरअसल राजस्थान में आजादी से पहले राजपूत राजाओं का राज था| बड़े भाई को राज्य मिलता था और छोटे भाई को गुजारे के लिए जागीर दे दी जाती थी| और जागीरदार के छोटे भाई को गुजारे के लिए थोड़ी सी जमीन दे दी जाती थी| इस तरह छोटा भाई महल से निकलकर सीधा झोंपड़े में आ जाता था| बड़ा भाई राजा या जागीरदार टेक्स वगैरह वसूलने में अपने भाई के साथ भी वही व्यवहार करता था जो आम जनता के साथ करता था|

पर छोटे भाई से आम जनता ज्यादा फायदे में रहती थी, कारण छोटे भाई का राजा या जागीरदार कर आदि लेने के बावजूद भी भावनात्मक शोषण ज्यादा करते थे| चूँकि राजाओं व जागीरदारों के पास नियमित सेना ज्यादा बड़ी नहीं होती थी| संकट आने पर अपने कुल के छोटे भाइयों को युद्ध में आमंत्रित कर लिया जाता था वे बिना वेतन के ही युद्ध लड़ते थे हाँ शहीद होने पर उनके वारिस को सिर कटाई के बदले कुछ भूमि जरुर से दी जाती थी|

उधर राजपरिवार का वह छोटा भाई जो खास से आम हो गया को छुट्ट भाई कहा जाता है पर उसकी मानसिकता आम होने के बावजूद भी खास ही बनी रहती थी| वहीं आम जनता के बीच रहने की वजह से आम जनता भी अपनी हर समस्या उसे शासक परिवार का सदस्य समझ उसी के पास लेकर आती थी और वह आम होने के बावूजद अपनी खास वाली मानसिकता के वशीभूत आम लोगों की समस्याओं व झगडों को निपटाने के लिए उन फालतू पंचायतियों में उलझा रहता था जो उसके शासक भाइयों के काम होते थे| इस तरह वह खास से आम बना राजपूत अपने लिए कमाने के अवसर ऐसे ही जाया कर दिया करता था| उसकी आय का प्रमुख साधन कृषि भी उसकी जमीन पर किसी किसान द्वारा की जाती थी जिसमें उसके लिए सिर्फ पेट भरने लायक ही बचता था| एक तो किसान अपनी मेहनत का ले जाता दूसरा ठाकुर साहब द्वारा अपने खेत-खलिहान न सँभालने पाने के चलते किसान भी उसको सही उपज नहीं बताते थे|

इस तरह आम राजपूत परिवार का मुखिया जिसे गांवों में ठाकुर साहब कहा जाता था उनकी मूंछ की अकड़ तो वही शासकों वाली रहती पर आर्थिक दृष्टि से वे आम जनता से गरीब ही होते और फालतू की शान दिखाने के चक्कर में कर्ज में भी डूबे रहते थे| इसलिए कहा जता था- “ठाकुर साहब आधे भूखे है पर मूंछ की अकड़ पुरी है|”

गांवों में ठाकुर साहब की मूंछ में अकड़ क्यों है ? पर एक मजेदार किस्सा भी प्रचलित है –

एक बार रात के समय भगवान ने एक साधु का भेष का धारण किया और पृथ्वी पर आकर एक गांव के बाहर एक रेत के टीले पर अपना आसान लगाकर बैठ गये| सुबह होते ही सबसे पहले गांव का बनिया उठा और जब वह गांव के बाहर निकला तो देखा एक बाबा टीले पर बैठे है उसने जाकर बाबा को दंडवत प्रणाम किया| बाबा ने खुश होकर उसे कुछ मांगने को कहा| बनिए ने बाबा से लक्ष्मी मांग ली| और बाबा ने तथास्तु कह उसे आशीर्वाद दे दिया| इस तरह बनिया बाबा से धनी होने का आशीर्वाद लेकर अपने घर लौट आया|

उसके बाद एक ब्राहमण मंदिर में सुबह आरती आदि के दैनिक कार्य निपटाकर उधर गया उसने भी बाबा को देखा तो जाकर प्रणाम किया| बाबा ने उसे भी कुछ मांगने को कहा| ब्राहमण से बाबा से ज्ञान मांग लिया| और बाबा से ज्ञानी बनने का आशीर्वाद लेकर घर लौट आया|

उसके बाद एक अपने खेतों में जाते एक किसान की नजर बाबा पड़ी तो वह भी अपनी श्रद्धा व्यक्त करने बाबा के पहुंचा और बाबा को प्रणाम किया| बाबा ने उससे कहा-“कि तूं थोड़ा देर से आया है लक्ष्मी तो बनिया ले गया, ज्ञान ब्राह्मण ले गया अब मेरे पास मेहनत बची है यदि तुझे चाहिए तो बेहिचक मांग ले|”

किसान बोला- “महात्मन ! एक किसान खेती में तभी सफल होता है जब वह मेहनती हो| आप मुझे मेहनत दे दीजिए मेरे लिए तो यह धन व बुद्धि से भी बढ़िया आशीर्वाद होगा|”

बाबा ने तथास्तु कह किसान को मेहनत का आशीर्वाद दे दिया|

उस दिन ठाकुर साहब रात को किसी महफ़िल में थे सो देरी से सोये थे तो देर से ही उठे थे| उन्हें गांव के एक दलित ने सूचना दी कि – “गांव के बाहर एक बाबा आया है और आशीर्वाद दे रहा है बनिया, ब्राह्मण, किसान तो ले आये है आप गांव के स्वामी है आप भी बाबा से कुछ ले आये|”

सुनकर ठाकुर साहब मूंछ पर बल देते हुए उस दलित को साथ ले बाबा के पास पहुंचे| श्रद्धा से बाबा को प्रणाम किया|

बाबा बोले- “आपने आने में देरी कर दी ! मेरे पास जितनी काम की चीजें थी वो तो मैंने दे दी| अब आपके लायक कुछ बचा ही नहीं|”

ठाकुर साहब- “ऐसा मत कीजिये बाबा श्री ! हम रात को एक पंचायत में व उसके बाद एक महफ़िल में थे सो देरी उठे वरना हम सबसे पहले आपके पास आते| फिर भी आप हमें यूँ खाली हाथ मत लौटायें, कुछ तो दीजिए|”

बाबा- “हमारे पास अब आपके लायक अकड़ (मूंछ की मरोड़) बची है आप चाहें तो वो ले सकतें है|”

ठाकुर साहब ने यह कहते हुए कि- “ये तो उनके लिए बढ़िया रहेगी| वैसे भी हमारी मूंछ की मरोड़ तो देखने लायक होनी चाहिए|’ बाबा से अकड़ ले ली|

ठाकुर के साथ गया दलित भी कहाँ पीछे रहने वाला था उसने भी अपनी गरीबी का वास्ता देकर बाबा से अपने लिए कुछ देने का अनुरोध किया|

बाबा बोले- “अब हमारे पास देने को कुछ नहीं बचा|

यह सुनते ही ठाकुर साहब अकड़ते हुए बोले- “अबे ! बाबा इस गरीब को दे रहा है या निकालूं अपनी तलवार ?” आखिर अकड़ वाला आशीर्वाद पाने के बाद ठाकुर साहब में अकड़ का असर हो चुका था|

बाबा बोले- “अब हमारे पास सिर्फ भूख बची है चाहे तो ये दलित ले सकता है|

दलित ने बिना सोचे समझे भूख मांग ली और बाबा ने उसे तथास्तु कह भूख का आर्शिर्वाद दे दिया| पर तभी ठाकुर साहब फिर अकड़ते हए बोले- “ये अकेले भूख का क्या करेगा ? फिर आया भी तो मेरे ही साथ था सो अकेले को नहीं मिलेगी आधी भूख हम रखेंगे|”

बाबा भी समझ गये थे कि- अब अकड़ का आशीर्वाद लिया ठाकुर कुछ भी कर सकता है तो उसने अपने दलित को दिए पुराने आर्शिर्वाद में अमेंडमेंड करते हुए तुरंत तथास्तु कह दिया|

तभी से ठाकुर साहब के पास अकड़ तो पुरी है पर भूख यानी गरीबी आधी| मतलब अकड़ के चलते ठाकुर साहब गरीब होते भी किसी को गरीब नहीं दिखाई देते| सरकार को भी नहीं !
तभी तो गरीब होने के बावजूद ठाकुरों मतलब राजपूतों को किसी भी तरह के आरक्षण से दूर रखा जाता है|

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