ठाकुर श्री हरिदेवजी महाराज, मथुरा

ठाकुर श्री हरिदेवजी महाराज, मथुरा

मथुरा स्थित गोर्वधन पर्वत युगों-युगों से विश्वविख्यात हैं। मथुरा चंद्रवंशी क्षत्रिय भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली एवं कर्मभूमि भी रही है। पूरा ब्रज श्रीकृष्ण की कई लीलाओं से कृतार्थ रहा है। यहाँ स्थित गोर्वधन पर्वत को बाल रूपी भगवान श्री कृष्ण ने अपनी उंगली पर उठाकर समस्त प्राणीजनों की भयंकर मुसलाधार वर्षा से रक्षा की थी। गोर्वधन पर्वत की परिक्रमा के लिए हर रोज हजारों भक्तगण यहाँ पधारते हैं एवं यहाँ परिक्रमा और भगवान श्री कृष्ण के विभिन्न स्वरूपों के दर्शन कर असीम सुख की अनुभूति प्राप्त करते हुये अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए प्राथर्ना करते हैं। गोर्वधन पर्वत में भगवान श्री कृष्ण के अनेकों रूपों के मंदिर बने हुए हैं, जिनमे भगवान श्रीकृष्ण के अनेक स्वरूप विराजमान हैं। उन्ही में से एक अति प्राचीन मंदिर हैं, ठाकुर श्री हरिदेव जी का।

ठाकुर श्री हरिदेवजी के मंदिर का निर्माण आमेर महाराजा भारमल के छोटे पुत्र, जो कि आमेर महाराजा भगवंतदास के छोटे भाई थे व लवाण के जागीरदार राजा भगवानदास बाँकावत ने आज से करीब 550 वर्ष पूर्व करवाया था। भगवानदास जी बड़े वीर एवँ धार्मिक व्यक्तित्व के धनी थे। अकबर के दरबार में इन्हें बड़ा मनसब प्राप्त था। भगवानदास ऐसे राजा थे, जिनका लोहा बादशाह अकबर भी मानता था। भगवानदास जी की वीरता एवं बांकेपन से प्रभावित होकर अकबर इन्हें ”बांकेराजा” कहकर संबोधित करता था। इस वजह से इतिहास में ये “बाँकेराजा भगवानदास”के नाम से प्रसिद्ध हुए एवम् उनके वंशज बाँकावत कहलाए। बांके राजा भगवानदास जी लवाण के राजा एवँ मथुरा के हाकिम थे। इनका अधिकतर समय भगवान श्री कृष्ण की भक्ति करने में ही व्यतीत होता था। भगवानदास जी भागवत के ज्ञाता एवं हमेशा भक्तिभाव में समर्पित रहने के कारण संसार मे निर्भय विचरण किया करते थे, बादशाह तक की भी बंदिश नहीं रखते थे। बांके राजा भगवानदास जी स्वयं माला, तिलक, कण्ठी धारण किया करते थे। मथुरा के हाकिम होने के कारण जो कोई तिलक कण्ठी धारण करके आता, उसकी चुंगी माफ करवा देते थे। यवन भी तिलक कण्ठी धारण करके आते, तो वो भी बिना चुंगी दिए निकल जाते थे। ये बात बादशाह को अच्छी नहीं लगी। उस समय बादशाह जहाँगीर था, उसने घोषणा की जो कोई भी तिलक कण्ठी धारण करेगा उसे फाँसी पर लटका दिया जाएगा। इसलिये बहुत से लोगों ने माला, तिलक, कण्ठी धारण करना बंद कर दिया, बहुत से छिपकर रहने लगे। बाँके राजा भगवानदास जी को जब ये बात पता चली तो वे मोटी-मोटी तुलसी की कई मालाएं, कण्ठियाँ धारण कर व बड़ा तिलक लगाकर जहाँगीर के दरबार मे उपस्थित हुए। जहाँगीर उन्हें देखकर कुपित हुआ और बोला आपने मेरे आदेश की अवहेलना की है, इसलिए आपको प्राणदंड दिया जाएगा।

बांकेराजा भगवानदास जी ने कहा कि हमारे हिन्दू शास्त्रों में लिखा है कि जो व्यक्ति तिलक, कण्ठी धारण किये शरीर छोड़ता है, उसे बैकुंठ की प्राप्ति होती है। अंतिम संस्कार के समय तिलक लगाते हैं, इसलिए बैकुंठ यात्रा के लिए, मैं तैयार होकर आया हूँ । बांकेराजा भगवानदास जी को देह के लिए पद, मान सम्मान का मोह बिल्कुल भी नहीं था। इसलिये जहाँगीर ने जब हिन्दू धर्म पर ये कुठाराघात किया तो उनको धर्म की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति दे देने का निर्णय करते देर नहीं लगी। धर्म के प्रति बाँकेराजा भगवान जी की इतनी निष्ठा देखकर जहाँगीर का मन बदल गया, उसने कहा बाँकेराजा, मैं तुम्हारी धर्म के प्रति इतनी निष्ठा देखकर प्रसन्न हूँ, तुम जो चाहो, वो मांगों। बाँकेराजा भगवानदास जी ने कहा कि आप प्रसन्न हैं तो मुझे मथुरा का निरन्तर वास दे, मथुरा के बाहर मैं कहीं नहीं जाना चाहता, प्रजा पर चुंगी का भार अधिक हैं, चुंगी को हटा लें और जिन्हें तिलक, कण्ठी धारण करने पर गिरफ्तार किया गया है, उन्हें छोड़ दें। जहाँगीर ने ऐसा ही किया। बाँकेराजा भगवानदास जी के संग का प्रभाव रसखानजी पर भी पड़ा। कहते है वो बहुत सी माला, कण्ठी, तिलक धारण करते थे। एक बार जहाँगीर ने पूछा हिन्दू भी इतनी माला, कण्ठी धारण नहीं करते रसखान, तुम क्यों इतनी धारण करते हो? रसखान ने उत्तर में एक दोहा पढ़ा “तन पावन जल अगम को तनक काठ कर पार, बड़े काठ ऊपर तब तन पावे भार” अर्थात् जो पवित्र हैं एवं हल्के हैं उन्हें थोड़ा सा काठ (लकड़ी) भी पार करा देता हैं पर जो पापी और पत्थर के समान भारी हैं उन्हें पार करने के लिए बहुत से काठ अर्थात् लकड़ी की आवश्यता पड़ती हैं। इसलिए मैं इतनी अधिक तिलक, कण्ठी धारण करता हूं।

बाँकेराजा भगवानदास की धर्म के प्रति निष्ठा और भक्ति भाव से उनके इष्ट भगवान श्रीकृष्ण भी प्रसन्न हुए।बाँकेराजा भगवानदास जी व प्रभु श्रीकृष्ण का एक प्रसंग है कि गोर्वधन में केशवचार्य जी रहते थे। उन्हें स्वप्न्न में श्रीकृष्ण जी के प्रपौत्र महाराज व्रजनाभ द्वारा प्रतिष्ठित श्रीकृष्ण के हरिदेवजी नामक स्वरूप ने कहा कि मैं अमुक स्थान पर हूँ । वहाँ से लाकर मेरी सेवा करो। केशवचार्य जी ने वहाँ से हरिदेवजी के स्वरूप को निकालकर मानसी गंगा तट पर एक कुटिया में पधराया।हरिदेवजी केशवचार्य जी से कभी कुछ मांगते, कभी कुछ मांगते। एक बार उन्होंने खीर भोग लगाने को कहा तो केशवचार्य जी ने कहा प्रभु रोज तरह-तरह की फरमाइशें करते हो, मैं गरीब वैष्णव कहाँ से लाऊँ। हरिदेवजी ने कहा कि तुम किसी से मांगो मत, पर जो अपने आप आ जाये तो उसे अस्वीकार भी ना करो।आज से सातवें दिन राजा भगवानदास तुम्हारे पास आकर कहेंगे कि मैं हरिदेवजी का मंदिर बनवाना चाहता हूँ, उनकी सेवा पूजा सुंदर रूप से चले ऐसी व्यवस्था करवाना चाहता हूँ तो उन्हें करने देना। उधर राजा भगवानदास जी की हरिदेवजी ने स्वप्न्न में आकर कहा कि मैं गोर्वधन में हूँ और केशवचार्य जी के प्रेम से प्रकट हुआ हूँ।तुम मंदिर बनवाकर मेरे भोग राग की व्यवस्था करो।बाँकेराजा भगवानदास जी ने मानसी गंगा तट पर हरिदेवजी का लाल पत्थर का विशाल मंदिर बनवाकर हरिदेवजी के स्वरूप को वहाँ विराजमान करवाया औऱ उनकी सेवा पूजा की सुंदर व्यवस्था के लिए केशवचार्य जी को नियुक्त कर उन्हें जिम्मेवारी प्रदान की।  केशवचार्य जी के वंशज आज भी इस मंदिर की सेवा पूजा कर रहे हैं। हरिदेवजी के स्वरूप के दर्शन के बिना गोर्वधन परिक्रमा अधूरी मानी जाती हैं। ठाकुर श्रीहरिदेवजी बाँकावत कछवाहों के इष्टदेव हैं। बाँकावत कछवाहा “जय हरिदेव जी की” बोलकर ही एक दूसरे का अभिवादन करते है।

लेखक : रणजीत सिंह बांकावत

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