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ठाकुर बाघसिंह खेतड़ी : मांडण युद्ध के योद्धा

ठाकुर बाघसिंह खेतड़ी : खेतड़ी के स्वामी भोपालसिंह सं. 1828 वि. (भादवा बदी’ 10) में लोहारू के युद्ध में मारे गये। उनके निःसन्तान होने से बाघसिंह को खेतड़ी का स्वामी बनने का अवसर मिला। ठा. किशनसिंह शार्दूलसिंहोत के वे तृतीय पुत्र थे। भोपालसिंह और पहाडसिंह उनके बड़े भाई थे। वे क्रोधी स्वभाव के थे किन्तु नीतिज्ञ, व्यवहार कुशल एवं महत्वाकांक्षी थे। सं. 1831 वि. में मेवात और हरियाणा के शाही-सेनाधिकारी नजफकुली खाँ ने दादरी नगर को लूटने औरकाणीढ़ के राव से नजराना वसल करने के पश्चात् खेतड़ी के किले भोपालगढको विजय करने का मनसूबा बांधा। किन्तु गढ़ की दुरूहता और ठाकुर बाघसिंह खेतड़ी की सुदृढ़ सैनिक शक्ति के सामने उसे ऐसा करने का साहस नहीं हुआ। इसलिये उसने समझौता करने का बहाना बनाकर बाघसिंह को शाही सेना के पड़ाव पर ससम्मान बुलाया।

शाही सेना के साथ वे उदयपुर (शेखावाटी) तक गये। वहीं पर ठा. नवलसिंह नवलगढ़ आदि तीन प्रमुख शेखावत सरदारों के साथ उन्हें नजरबन्द कर दिया गया व शाही सेना के साथ ले जाया गया। शाही सेना के तोपखाने के अधिकारी समरू के प्रयत्न से मामला (राज्यकर) चुकाने का समझौता होने पर उन्हें मुक्ति मिली। तत्पश्चात् सं. 1832 वि. में माण्डण के मैदान से लड़े गये भयंकर युद्ध में ठाकुर बाघसिंह ने अपनी शक्तिशाली सेना के साथ भाग लेकर बड़ी वीरता से लड़ाई लड़ी थी। उस युद्ध में शाही सेना को करारी हार देकर अपने साथ किये गये विश्वासघात और अपमान का उन्होंने पूरा बदला चुका दिया। युद्ध में प्रदर्शित उनकी वीरता की प्रशंसा में जयपुर के महाराज सवाई पृथ्वीसिंह ने “खासा रुक्का’ भेजकर उन्हें बधाई दी और सम्मानित किया ? माण्डण युद्ध में शक्ति परीक्षण के पश्चात् दिल्ली सम्राट शाहआलम द्वितीय की नीति शेखावतों को प्रसन्न एवं वफादार बनाये रखने की रही। उसी के फलस्वरूप ठा. बाघसिंह खेतड़ी को कई खिताब देकर सम्मानित किया गया। अन्य अनेक रीयासतों के साथ सिंघाणा की टकसाल (ताम्बे के सिक्के ढालने का स्थान) का अधिकार भी उन्हें मिला|

जयपुर राज्य में फैली अराजकता और अव्यवस्था के उस दौरे में ठाकुर बाघसिंह खेतड़ीने भी जयपुर के साथ की अपनी वफादारी को तोड़ फेंका। उन्होंने दिल्ली दरबार में अपना सम्पर्क बढ़ाना शुरू कर दिया। अपना मामला उन वर्षों में उन्होंने दिल्ली सम्राट के खजाने में जमा कराया। सं. 1838 वि. में बबाई का परगना जयपुर द्वारा संरक्षित धूला के राजावत जागीरदार से उन्होंने छीन लिया। शाही सेनाधिकारी नजफकुली ने उनके उस कार्य को मान्यता प्रदान की और उन्हें बबाई का स्वामी मान लिया । खंडेला के दोनों राजाओं को छल से कैद करके जयपुर के सेनापति नन्दराम हल्दिया ने खंडेला और रैवासा में सैनिक छावनियां स्थापित कर रखी थी। ठा. बाघसिंह खेतड़ी ने दोनों स्थानों पर आक्रमण कर के सैनिक छावनियों को लूट लिया और जयपुर राज्य को मामला (कर) देना बन्द कर दिया। जयपुर राज्य के खिलाफ प्रबल विद्रोह करने वाले खंडेला वालों को खेतड़ी में सदैव आश्रय और सहायता मिलती रहती थी ।

अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में राजा पदवी से अलंकृत बाघसिंह की महत्वाकांक्षा-अलवर के प्रतापसिंह नरूका की भाँति खेतड़ी का स्वतंत्र राजा बन बैठने की थी । किन्तु भाग्य चक्र ने उनकी वह आकांक्षा सफल नहीं होने दी। यद्यपि अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में ठाकुर बाघसिंह खेतड़ी दिल्ली सम्राट के वफादार बने रहे किन्तु अपने स्वयं एवं स्वजातीय सम्मान की रक्षार्थ शाही सेना से युद्ध लड़ने से भी वे नहीं हिचके। सं. 1837 वि. में खाटू (श्यामजी) के युद्ध में मुर्तजाखां भड़ेच के विरुद्ध सीकर के राव देवीसिंह की मदद पर उन्होंने अपने पांच सौ सैनिक भेजे थे। सिरोही (नीम का थाना के पास) के समीप अपने मित्र नजफकुलीखाँ से भी शेखावतों के साथ मिलकर उन्होंने युद्ध लड़ा था । अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में राजा पदवी से सम्मानित बाघसिंह सं. 1857 वि. में परलोकवासी हुए। (खेतडी का इतिहास पृष्ट 52) राजा बाघसिंह की मृत्यु पर उनके एकमात्र पुत्र अभयसिंह खेतडी की गादी पर बिराजे ।

सन्दर्भ : “मांडण युद्ध” पुस्तक में ठाकुर सुरजनसिंहजी द्वारा लिखित लेख को छोटा कर प्रकाशित किया गया है |

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