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ठाकुर नाहरखान आसोप जो आज भी लोकदेवता के रूप में पूजे जाते हैं

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ठाकुर नाहरखान आसोप

ठाकुर नाहरखान आसोप : वीरवर कूंपाजी राठौड़ की वंश परम्परा में एक से बढ़कर एक कई वीरों ने जन्म लिया | कूंपाजी के वंशज कूंपावत राठौड़ कहलाये और आसोप इनका प्रमुख ठिकाना था, जो मारवाड़ रियासत में महत्त्वपूर्ण था | मारवाड़ की रक्षार्थ यहाँ के वीरों ने एक से बढ़कर एक बलिदान दिए | वीरों के बलिदान की इसी श्रृंखला में आसोप के ठाकुर नाहर खान का नाम मारवाड़ के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा है | नाहरखां का नाम मुकनदास था, इन्हें पृथ्वीसिंह के नाम से भी इतिहास में जाना जाता है | अपने पिता ठाकुर राजसिंहजी के निधन के बाद आप वि.सं. 1697 की पौष सुदी दूज को आसोप ठिकाने की गद्दी पर बैठे |

मुकनदासजी बड़े वीर वीर व पराक्रमी थे | वि.सं. 1698 में मुकनदासजी जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंहजी के साथ बादशाही दरबार में उपस्थित हुए | बादशाह शाहजहाँ ने जब मुकनदासजी का बलिष्ठ शरीर देखा और उनकी बहादुरी व पराक्रम के किस्से सुने तो मन ही मन उन्हें किसी तरह मारने का निश्चय किया, ताकि जोधपुर महाराजा जसवंतसिंहजी की ताकत कम हो सके | मुकनदासजी को मारने का मन में षड्यंत्र रचते हुए एक दिन बादशाह ने जसवंतसिंहजी से मुकनदासजी के बल की प्रशंसा करते हुए कहा कि –हम मुकनदासजी का बल देखना चाहते हैं अत: वह हमारे सामने जंगली शेर से मुकाबला करे |

यह सुन जोधपुर महाराजा असमंजस में पड़ गये, पर मुकनदासजी को मामले का पता चलते ही उन्होंने शेर से लड़ने की बात स्वीकार की | एक दिन मुकनदासजी व शेर के मध्य कुश्ती की आयोजन हुआ, मुकनदासजी ने यह कहते हुए अपने हथियार त्याग दिए कि शेर निहत्था है अत: उससे निहत्था ही लडूंगा और वे निहत्थे ही शेर से भीड़ गये और बात की बात में शेर को पछाड़ कर उसे चीर डाला | बादशाह बड़ा खुश हुआ और मुकनदासजी को नाहर खान की उपाधि दी | उस दिन से मुकनदासजी कूंपावत नाहरखान के नाम से प्रसिद्ध हुये | मुकनदासजी यानी नाहरखानजी ने जोधपुर महाराजा के साथ अफगानिस्तान तक कई युद्ध अभियानों में भाग लिया और वीरता प्रदर्शित की | महाराजा जसवंतसिंहजी का जीवन बचाने के मुकनदासजी द्वारा अपने प्राणों का बलिदान देने की भी एक रोचक कहानी इतिहास में पढने को मिलती है |

कूंपावत राठौड़ों के वृहद इतिहास के अनुसार महाराजा जसवंतसिंहजी पर प्रेत का आक्रमण हुआ, महाराजा बेहोश हो गये, तब तांत्रिकों ने बताया कि प्रेत महाराजा की बली लेगा | यदि महाराजा को बचाना है तो उन्हीं के टक्कर के किसी योद्धा या सामंत की बली देनी होगी | तब आसोप के ठा. नाहरखानजी सामने आये और महाराजा को बचाने के लिए खुद को प्रस्तुत किया | तांत्रिक ने अभिमंत्रित जल दिया, और जल पीते ही प्रेत ने नाहरखानजी की बली ले ली | महाराजा बच गये और नाहरखानजी का निधन हो गया |

अभिमंत्रित जल पीने से पहले नाहरखानजी ने अपने सेवकों से कहा था कि उनके मरने के बाद उनका मृत शरीर उनके गुरु शिवनाथजी के पास रजलानी गांव ले जाना | सेवकों ने यही किया, गुरु ने अपनी साधना शक्ति से नाहरखानजी को बारह वर्षों के लिए जीवित कर दिया | इतिहास के अनुसार नाहरखानजी की आयु ख़त्म हो चुकी थी अत: उन्हें जीवित करने के लिए गुरु शिवनाथजी ने अपनी आयु के आठ वर्ष और उनके एक शिष्य सुजाणनाथजी ने चार वर्ष प्रदान किये | इस घटना के बाद बारह वर्ष जीने के बाद नाहरखानजी ने अपना सब धन दान कर दिया | तब एक चारण आये और उन्होंने दान माँगा | ठाकुर साहब के पास अपने शरीर के अलावा कुछ था नहीं, सो चारण ने उनका शरीर ही मांग लिया, अब उन्होंने कटारी खाकर अपने परिजनों को यह कहते हुए देह त्याग दी कि अब मेरा शरीर चारण महाराज का हुआ |

गुरु महाराज शिवनाथजी के स्थान पर जहाँ ठाकुर नाहरखान जी की मृत देह रखी गई थी वहां उनकी स्मृति में एक स्मारक रूपी छतरी बनी है | यह छतरी हाथ से धक्का लगाने पर हिलती भी है | महाराज शिवनाथजी का स्थान आज आस-पास के लोगों की आस्था का केंद्र है | आसोप गांव में पूर्व राजपरिवार के कृषि फ़ार्म पर जहाँ ठाकुर नाहरखान जी का दाह संस्कार किया गया वहां उनका देवालय बना है, जहाँ स्थानीय निवासी उन्हें भौमियाजी महाराज के नाम से लोक देवता के रूप में पूजते हैं |

सन्दर्भ ग्रन्थ : १. कूंपावत राठौड़ों का वृहद् इतिहास, 2. आसोप का इतिहास 3. कूंपावत राठौड़ों का इतिहास, 4. आसोप का इतिहास एवं लोक संस्कृति

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