27.1 C
Rajasthan
Saturday, May 28, 2022

Buy now

spot_img

जौहर और सती प्रथा में ये है अंतर

राजस्थान की कांग्रेस सरकार द्वारा पाठ्य पुस्तक के कवर पेज से जौहर का चित्र हटाने के बाद इस मुद्दे पर घमासान मचा हुआ है | शिक्षा मंत्री गोविन्दसिंह डोटासरा ने जौहर को जहाँ सती प्रथा से जोड़ा वहीं जौहर को लेकर कई नेताओं के बयान आये जिनमें उनका इतिहास ज्ञान झलक जाता है कि हमारे नेताओं को जौहर के बारे में कितना ज्ञान है | ऐसे में हमारे लिए आवश्यक है हम जौहर और शाका के बारे में जाने साथ ही सती प्रथा से भी इसकी तुलना करें, क्योंकि शिक्षा मंत्री ने जौहर को सती प्रथा से जोड़कर एक बहुत बड़ी भ्रान्ति फैला दी है |

संसार की सभी सभ्य जातियां अपनी स्वतंत्रता की सुरक्षा एवं समृद्धि के लिए निरंतर बलिदान करती आई है | परस्पर युद्धों का श्रीगणेश इस आशंका से हुआ कि कोई स्वतंत्रता छीनने आ रहा है तो कोई उसे बचाने के लिए अग्रिम प्रयास कर रहा है | युद्धों की इसी कड़ी में राजस्थान में जौहर और शाकों की परम्परा शुरू हुई, जहाँ पराधीनता के बजाय मृत्यु का आलिंगन करते यह स्थिति आ जाती थी कि अब अधिक दिन तक शत्रु के घेरे के भीतर रह कर जीवित नहीं रहा जा सकेगा, तब ही जौहर व शाके किये जाते थे | महिलाएं कुलदेवी व देवताओं का पूजन कर, तुलसीदल के साथ गंगाजल पान कर, जलती हुई चिता में प्रवेश करके अपने शूरमाओं को निर्भय करती थीं कि नारी समाज की पवित्रता अब अग्नि के ताप से तपित होकर कीर्ति कुंदन बन गई है |

पुरुष इससे चिंता मुक्त हो जाते थे कि अब युद्ध के परिणाम का अनिष्ट उनके स्वजनों को ग्रसित नहीं कर सकेगा | और वे कसूंबा पानकर, केशरिया वस्त्र धारण कर, पगड़ी में तुलसीदल रख, गले में सालिगराम के गुटके बाँध कर, इस निश्चय के साथ रणक्षेत्र में उतर पड़ते थे कि या तो विजय होकर लौटेंगे या लड़ते लड़ते रणभूमि में चिरनिंद्रा का शयन करेंगे| राजस्थानी संस्कृति में स्त्रियों का यह कृत्य जौहर कहलाता था और पुरुषों का कृत्य शाका के नाम से विख्यात हुआ | आपको बता दें जौहर और शाका एक साथ होते थे यानी महिलाएं जौहर करती थी तो पुरुष शाका अवश्य करते थे, दोनों में एक एक अकेला कभी नहीं होता है यदि जौहर हुआ है तो शाका भी हुआ है |

अब बात करते हैं समय की | जैसा कि हमारे राजनेता अपने बयानों में जौहर कब होता था के बारे में अपने हिसाब से बयान जारी कर देते हैं ऐसे में आपको जौहर के समय की जानकारी भी जरुरी है | दरअसल जौहर का कोई समय निर्धारित नहीं था, सब कुछ परिस्थितियों के अनुरूप तय होता था | जब युद्ध में जीतने की कोई सम्भावना ही नहीं होती थी तब शाका से पहले जौहर क्रिया सम्पन्न होती थी और जहाँ युद्ध में विजय की सम्भावना होती थी वहां महिलाएं जौहर की तैयारी तो रखती थी पर पुरुषों द्वारा शाका करने के बाद युद्ध के परिणाम देखकर जौहर होता था, मतलब युद्ध जीत गए तो जौहर नहीं होता और हारने की सुचना मिलते ही जौहर क्रिया सम्पन्न हो जाती | जब दुश्मन जीत कर किले में प्रवेश करता तब उसे स्त्री धन के बदले राख का ढेर मिलता |

अब बात करते हैं सती प्रथा व जौहर में अंतर की | कोई भी महिला अपने पति की मृत्यु के बाद उसके शव के साथ चिता में बैठ कर अग्नि स्नान करती उसे सती होना कहा जाता है | पर जौहर में पति के शव के साथ अग्नि स्नान नहीं होता | शाका से पूर्व हुए जौहरों में स्त्रियों ने अपने पति की आँखों के आगे अग्नि स्नान किया है | जौहर आक्रान्ता से अपनी स्वतंत्रता, अस्मिता व सतीत्व बचाने के लिए किये जाते थे अत: जौहर व सती प्रथा को एक नहीं समझा जा सकता | राजस्थान के शिक्षा मंत्री ने दोनों के मध्य सम्बन्ध जोड़कर राजस्थान की संस्कृति व इतिहास पर एक बहुत बड़ी चोट की है जिसे राजस्थान का कोई भी स्वाभिमानी व इतिहास प्रेमी स्वीकार नहीं कर सकता |

Related Articles

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Stay Connected

0FansLike
3,333FollowersFollow
19,700SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img

Latest Articles