जिन्हें राजपूत अपना समझते हैं वे राजपूतों की पीठ पर यूँ करते हैं वार

जिन्हें राजपूत अपना समझते हैं वे राजपूतों की पीठ पर यूँ करते हैं वार

जिन्हें राजपूत अपना समझते हैं वे राजपूतों की पीठ पर यूँ करते हैं वार : 1947 में सत्ता हस्तांतरण के बाद राजपूत जाति राजनेताओं के निशाने पर सबसे ज्यादा रही है| राजनेताओं ने राजपूतों के खिलाफ आम जनता के मन में कटुता घोलने हेतु किस तरह दुष्प्रचार किया,  इसका एक उदाहरण हम इस लेख में प्रस्तुत करने जा रहे हैं – “दिसम्बर 2019 में पलसाना कस्बे में कांग्रेस नेता नारायणसिंह का अभिनन्दन समारोह था| कार्यक्रम में प्रदेश के मुख्यमंत्री, उप मुख्यमंत्री सहित दर्जनों कांग्रेस नेता थे| उसी आयोजन में भाजपा छोड़ कांग्रेस में शामिल हुए नेता घनश्याम तिवाड़ी भी शरीक हुए| सभी नेताओं ने नारायणसिंह जी की प्रशस्ति में काफी कुछ कहा पर राजपूत जाति पर कोई निशाना नहीं साधा|

वहीं घनश्याम तिवाड़ी ने चुपके से एक ऐसा सुर्रा छोड़ा जो समारोह में एकत्र हुए हर व्यक्ति के मन में राजपूतों के प्रति घृणा फ़ैलाने के लिए काफी था| उस आयोजन में तिवाड़ी ने कहा कि – “सामंतकाल में किसी को नाम के आगे सिंह लगाने अनुमति नहीं थी, इसलिए नारायणसिंह जी ने जिनका बचपन का नाम राम नारायण था, बदल कर नारायणसिंह रखा|” यहाँ तिवाड़ी का आशय था कि सामंत यानी राजपूत अपने अलावा किसी को नाम के आगे सिंह नहीं लगाने देते थे| जबकि उसी मंच पर नारायणसिंह जी से उम्र में ज्यादा बड़े जाट नेता व पूर्व विधायक रणमलसिंहजी भी बैठे थे, जिनका जन्म 1923 में हुआ था, जब सीकर में राव राजा कल्याणसिंह जी का शासन था|

यही नहीं, सीकर जिले में ही चौधरी जगनसिंहजी बाटड़ विधायक भी रहे हैं और आजादी के पहले से ही अपने नाम के आगे सिंह शब्द का इस्तेमाल करते थे| पूर्व विधायक रणमलसिंहजी के पिता के नाम के आगे भी सिंह शब्द जुड़ा था| जबकि उस काल सीकर में राव राजा कल्याणसिंह जी का शासन था | यदि तिवाड़ी के कथन में थोड़ी सी भी सच्चाई होती तो पूर्व विधायक रणमलसिंहजी व जगनसिंहजी बाटड़ के नाम के आगे सिंह नहीं होता| जबकि ये दोनों परिवार सीकर के राव राजा से प्रत्यक्ष जुड़े थे, उन्हें तो राव राजा ने सिंह लगाने से नहीं टोका| पर घनश्याम तिवाड़ी ने भरी सभा में एक ऐसा वक्तव्य देकर वहां उपस्थित जाटों के मन में राजपूतों के प्रति घृणा का भाव भर दिया| जबकि तिवाड़ी ने भाजपा टिकट पर जितने भी चुनाव लड़े है उनमें राजपूतों ने उन्हें अपना समझकर वोट दिए और उन्हें राजनैतिक ऊँचाइयों पर पहुँचाया| हाँ इसी कार्यक्रम में सचिन पायलट ने अपने भाषण में नाम के साथ सिंह का तात्पर्य समझाते हुए तिवाड़ी के दुष्प्रचार का प्रभाव कम किया|

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