जान – चढण को बखत (बारात रवाना होने का वक्त)

राजस्थान में 80- व् 90 के दशक तक बारातों का आनंद कुछ अलग तरह का होता था। उस समय बरातों का समय भी अलग था तो बाराती भी अलग श्रेणी के लोग होते थे। उस समय में बच्चों का बरातों में जाना एक तरह से वर्जित ही था। घर के मुखिया व बड़े, बुजुर्ग ही अमूमन बरातों में जाते थे। महिलाओं की उस समय बारात में जाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

जैसा की आजकल बारात के खाने पर विभिन्न तरह के पकवानों से लगी स्टालें लगायी जाती है वे उस समय नहीं होती थी, परन्तु मनुहार व् प्यार से परोसे गए “नुक्ती, नमकीन, लड्डू, पेठे, चक्की आदि मिठाई” में ही इससे कही अधिक आनंद आता था ।

आज भी बचपन में देखा “जान -चढ़ण रो बखत” उस समय का एक दृश्य मानस- पटल पर अंकित है जिसे मायड़ भाषा में उकेरने का प्रयास किया है ।
—जान -चढण को बखत —-

जद जान – बरातां रात न ही चढ्या करती ।
जानेत्यां न जान की त्यारी दिन में ही करनी पड़ती ।।

“ठाकरसाब जान म पधारो”, नाई बुलावो देतो ।
बड़ा – बुढा ने साथ लेज्याबा, को भाव सब में रहतो ।।

टाबर जान में कांई करसी , मुख्य या बात होती ।
मारवाड़ में रात ने जास्यां, पड़ गो दूर बहुत ही ।।

मोटर को हॉर्न सुन , टाबर झु-झुर रोता ।
कोई का छोटा भाई – भतीजा, कोई दादा का पोता ।।
सामान की सम्भ्लावनी देता, ध्यान राखज्यो थेला को ।
बिस्तर – चादर बांध दी है, खाणो-दाणो गेला को ।।

घरां की रुखाली खातर, रुखालो छोड र जाता ।
मोटर माय बैठ इष्ट देव को, जैकारो लगवाता ।।

जान -चढ़ी का गीत लुगायां, छतां पे रुल -रुल गाती ।
कुवे पर जा दरोगण, दोघड भर के ल्याती।।

भाई प्रसंगा -सगा अंदर में, ”बन्ना” छत पे सारा।
बोनट कनै बिन्द बैठतो, सारे भायला – प्यारा ।।

उण बखत को स्वाद, “गजू”, अब तो बिगड़ को सारों ।
न्यारी-न्यारी मोटर सबकी, न्यारो सब को ढारो ।।

न्यारो सब को ढारो, मनमानी अपणी चलावे ।
बुढा- बुजुर्गां नै छोड़ घरां न, बायाँ सागैं जावे ।।

लेखक : गजेन्द्र सिंह शेखावत

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