हठीलो राजस्थान-44, जलवायु पर दोहे

हठीलो राजस्थान-44, जलवायु पर दोहे

गरजत बरजत सोच दिल, लुक छिप दाव लड़ंत |
इण धरती पर आवतां, इन्दर डरपै अन्त ||२६२||

यहाँ (राजस्थान में) बादल लुकते छिपते ही कभी कभार बरसते है | मानों यहाँ आते हुए इंद्र को भी डर लग रहा है |

कांसी लीलो रंग करयो, नाड़ी तातो नीर |
बादल बासी रात रा, धरलै कामण धीर ||२६३||

नमी में कांसी के बर्तनों पर नील प्रकट होने लगी है , तालाबों का जल भी गर्म है व रात के बादल सुबह तक विद्यमान है | हे पत्नी ! धैर्य रखो, ये वर्षा के लक्षण है | अत: वर्षा अवश्य आएगी |

नाग चढ्यो तरु ऊपरै, सारस गण असमान |
दौड़े बादल पछिम दिस, बहसी जल घमसान ||२६४||

सर्प पेड़ पर चढ़ जाते है व सारस भी बार-बार उड़ते है | पश्चिम दिशा की और से बादल दौड़े आ रहे है | अत:जबरदस्त बारिश होगी |

बादल आया बरसता, चहुँ दिस मोटो चाव |
पंखी नाचै, नर हंसे, खेलण लागा दाव ||२६५||

प्रचुर जलवृष्टि करते बादलों को आया देखकर चतुर्दिक उल्लास छा गया है | पक्षी नाचने लगे है तथा मनुष्य हर्षित हो क्रीड़ा करने लगे है |

बरसै रिन्झिम बादली, हरसै भूतल जीव |
सरसै जंगल झाड़ सह, तरसै कामण पीव ||२६६||

जब बादली रिमझिम बरसाती है तो भूतल के सभी जीव हर्षित हो जाते है | जंगल के सभी पेड़ हरे-भरे हो जाते है तथा कमनियां प्रिय-मिलन के लिए व्याकुल हो उठती है |

पवन झकोलै बादली, बीजल बिच मुसकाय |
रजनी पर दो चीर वा, साँची बात बताय ||२६७||

पवन के झकझोरने से बादली के बीच बिजली मुस्कराने लगी है | एसा प्रतीत होता है मानो रात्री के परदे को चीरकर वह उसके मन की बात बता रही है |

लेखक : स्व. आयुवानसिंह शेखावत

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