जब खुद की कोहनी पर चोट लगे

किसी भी व्यक्ति को दर्द का अहसास तभी होता है जब उसकी खुद की कोहनी पर चोट लगती है, मतलब जो दर्द दूसरा सह रहा है वह उसे सहना पड़े तभी उसे अहसास होता है कि दर्द क्या होता ? हमारे देश में ही देख लीजिये- देश के विभिन्न हिस्सों में लाल किताब पढ़ क्रांति कर सत्ता हथियाने का ख़्वाब देखने वाले नक्सली आधुनिक हथियारों से लेश हो खुलेआम हिंसा का तांडव करते है जो उनके हिसाब से क्रांति के लिए जायज है| उनके ही क्यों किसी भी सत्ता पाने वाले की लालसा रखने वाले की नजर हिंसा जायज ही होती है पर जब यही हिंसक नक्सली सुरक्षा बलों की प्रतिहिंसा का शिकार होते है तो इनके समर्थकों को वही मानवाधिकार याद आते है जिनका खुला उलंघन ये नित्यप्रति करते है| कहने का मतलब जब ये खुद शिकार होते है तब इन्हें हिंसा का दर्द महसूस होता है पर खुद की हिंसा में जो लोगों को दर्द देते है वह नजर नहीं आता|

बंगाल में वामदल के काडर ने सत्ता पर पकड़ बनाये रखने के लिए वर्षों हिंसा व उत्पीड़न का सहारा लिया उनकी हिंसा के शिकार लोगों का दर्द किसी मानवाधिकारवादी व अपने आपको सेकुलर कहते थकते नहीं लोगों ने महसूस नहीं किया पर आज जब वही वामपंथी काडर तृणमूल कार्यकर्ताओं की प्रतिहिंसा का शिकार बन रहें है तो उन्हें दर्द महसूस हो रहा है वे इस प्रतिहिंसा से तिलमिला रहें है|

अब फांसी की सजा पाये भुल्लर को ही ले लीजिये- बम फोड़ते वक्त उसमें मारे जाने वालों के परिजनों को क्या दर्द होगा इस आतंकी ने महसूस नहीं किया पर अब जब अपनी गर्दन फांसी में फंदे में फंसती नजर आ रही है तब उससे होने वाले दर्द के अहसास से कांप रहा है|

पंजाब में खालिस्तान आन्दोलन आतंक के समय खालिस्तानी आतंकियों ने हजारों लोगों को मौत के घाट उतारा पर न तो उन्हें दर्द हुआ न उन सिखों को दर्द हुआ जो आतंकियों को खालिस्तान की चाहत में समर्थन व शरण देते थे| पर जब उसी आतंकी विचारधारा की करतूत से सिख सुरक्षा प्रहरियों ने इंदिरा गाँधी की हत्या की और बदले में दिल्ली में कांग्रेसियों ने जो सिख नरसंहार किया उसका दर्द दुनियां में बैठे हर उस सिख ने महसूस किया जिन्होंने पंजाब में खालिस्तानी आतंकियों के हाथों हुई हिन्दुओं की हत्याओं पर शायद ही दुःख हुआ हो| हाँ जब इन्हीं आतंकियों ने सिखों की इज्जत पर खेलना शुरू किया तो तब उन्हीं लोगों को दर्द का अहसास हुआ जो लोग पहले आतंकियों को सुरक्षा बलों से बचाने के लिए शरण देते थे पर जब खुद को चोट लगने लगी तब जाकर शरण देना छोड़ पुलिस का साथ दिया और नतीजा आतंक पर काबू |

कश्मीर से कश्मीरी पंडितों को आतंकियों ने मारना शुरू किया जिसकी वजह से पंडितों ने कश्मीर से पलायन किया उनका दर्द किसी कश्मीरी ने महसूस नहीं किया आज वे जगह जगह वर्षों से विस्थापित पड़े है पर कश्मीर की सरकार को उनका दर्द महसूस होना तो दूर सुना है उनके घर नीलाम करने की तैयारियां चल रही है पर एक अपने स्वधर्म आतंकी की फांसी पर कश्मीर के मुख्यमंत्री तक ने गहरा दर्द महसूस किया|

आजादी के बाद कांग्रेस के राज में अनगिनत हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए उनका दर्द कभी कांग्रेस ने महसूस नहीं किया न ही कभी अपनी प्रशासनिक विफलता मानी | हाँ चुनावों में एक दुसरे समुदाय का डर दिखाकर वोट बैंक की राजनीति खूब की| अपने राज में हुए दंगों का कभी इस पार्टी को अहसास नहीं हुआ क्योंकि दंगों में मारे जाने वाले ज्यादातर लोग कांग्रेस के वोट बैंक में शामिल नहीं थे| पर जिस गुजरात में अपने राज में १८० से ज्यादा हुए दंगों का दर्द महसूस नहीं करने वाली पार्टी को दुसरे के शासन में हुए एक दंगे का इतना दुःख है कि आजतक उसका प्रलाप जारी है|
कांग्रेस पार्टी ही क्यों गुजरात दंगों में मारे गए लोगों के दुःख से दुखी होने वाले लोगों को सिर्फ गोधरा में रेल में जले लोगों का दर्द नहीं उसके बाद मरे लोगों का दर्द है यही कारण है कि आजतक गुजरात दंगों का प्रलाप करने वाले कभी भी रेल के डिब्बे में जलाकर मारे गए लोगों की मौत पर नहीं बोलते| क्योंकि वे उनके अपने नहीं थे और दर्द तो तभी होता है जब किसी अपने को चोट पहुँचती है|

बात साफ़ है हमारे देश में हिंसा के प्रति भी सबका अपना अपना नजरिया है लोग उसी हिंसा को हिंसा समझते है जो अपनों के साथ होती है दूसरों के साथ हुई हिंसा उनकी नजर में हिंसा नहीं होती| जबकि हिंसा हिंसा ही है, किसी भी तरह व किसी भी पक्ष द्वारा की गयी हिंसा घृणित है मानवता के खिलाफ है जो सबको समान दर्द देकर जाती है बस महसूस करने की जरुरत है|
पंजाब में मारे गए लोगों के परिजनों को भी उतना ही दर्द महसूस हुआ था जितना दिल्ली में हुए सिख नरसंहार में मरे लोगों के परिजनों को हुआ है|
कश्मीर में सुरक्षा बालों के हाथों मारे गए आतंकियों या भटके हुए नौजवानों की मौत का जितना दर्द उनके परिजनों को महसूस हो रहा है उतना ही दर्द उन विस्थापित या फिर आतंकियों के हाथों मारे गए कश्मीरी पंडितों को भी महसूस हो रहा है जिन्होंने आतंक की वजह से अपने घर बार छोड़ दिए|
गुजरात दंगों में मारे गए लोगों के परिजनों को जो दर्द मिला है उतना ही दर्द गोधरा में रेल डिब्बे में जलाये गए लोगों के परिजनों को भी मिला है|

जब तक हिंसा के शिकार लोगों के दर्द को हम समान रूप से नहीं महसूस करेंगे तब तक ये हिंसा चलती ही रहेगी| हम एक दुसरे की हिंसा को कोसते हुए दोषारोपण करते रहेंगे पर इसे रोकने की कोई कोशिश ईमानदारी से नहीं करेंगे| जो थोड़े बहुत लोग ऐसी कोशिश करेंगे भी तो उन्हें राजनीति के सौदागर अपने फायदे के लिए करने नहीं देंगे|

पर जिस दिन हम हिंसा के शिकार हुए लोगों के दर्द को बिना किस जांत-पांत व धार्मिक आधार पर समान रूप से महसूस करने लगेंगे उस दिन ये आपसी हिंसक घटनाएँ स्वत: रुक जायेगी|

8 Responses to "जब खुद की कोहनी पर चोट लगे"

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