गौरक्षा के लिये मर मिटे थे ये मुसलमान

गौरक्षा के लिए किसी मुसलमान द्वारा प्राणों की आहुति देने की बात की जाय तो शायद ही कम लोग पचा पायेंगे | लेकिन इतिहास में मुसलमानों द्वारा गौरक्षा के लिए प्राणों के उत्सर्ग के उदाहरण मिल जाते हैं | रघुनाथसिंह कालीपहाड़ी द्वारा लिखित “शेखावाटी प्रदेश का राजनैतिक इतिहास” पढ़ते हुये मुझे चुरू जिले के आसलसर गांव में ऐसा ही एक उदाहरण पढने को मिला | घटना वि.सं. 1850 सावन सुदि 3 की है | आसलसर गांव में राठों ने गांव के गोधन को घेर लिया और लूट कर लेने जाने लगे | गांव के लोगों ने इसकी सूचना ठाकुर दीपसिंह शेखावत को दी |

ठाकुर दीपसिंह ने अपने साथ बैठे लोगों से गौरक्षा का आव्हान किया | उनके साथ उनके भाई खंगारसिंह, पृथ्वीसिंह तथा हिन्दूसिंह बड़गुजर (राजपूत), चेतन चौधरी व शिम्भू खां और साहिब खां कायमखानी बैठे थे | शिम्भू खां और साहिब खां कायमखानी चुरू जिले के भादरा के पास के थे और रात्री विश्राम के लिए इनके पास रुके हुये थे | ये सभी लोगों ठाकुर दीपसिंह के आव्हान पर गौरक्षा के लिए राठों (पशुधन लुटेरे) पर चढ़े | गांव के पश्चिम में थोड़ी दूर राठ गायों को ले जाते मिल गये | सो ये सभी लोग गायों को छुड़ाने हेतु उनसे भीड़ गये | राठों की संख्या ज्यादा थी | इस कारण ठाकुर दीपसिंह व दोनों कायमखानी मुसलमान शिम्भू खां, साहिब खां और हिन्दूसिंह बड़गुजर गौरक्षा के लिए युद्ध करते हुए काम आये |

गांव के श्मशान में देवली के रूप में इन गौ रक्षक योद्धाओं की स्मृति में स्मारक बने है, जो नयी पीढ़ी को उनका बलिदान याद दिलाते हैं |

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