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Monday, May 23, 2022

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गौरक्षा के लिए इस वीर ने किया था प्राणों का उत्सर्ग, लोकदेवता के रूप है मान्यता

सीकर के समीप मोरडूंगा ग्राम के बीचों बीच एक गौरक्षा के लिए शहीद होने वाले वीर का देवालय बना हुआ है। जहाँ भादवा सुदि द्वादशी को मेला लगता है। सैंकड़ों वर्षों से लगते आ रहे इस मेले व देवरे (देवालय) के पीछे इतिहास की एक कहानी छिपी है। इस कहानी में एक उद्भट वीर की शौर्यगाथा का इतिहास है। इस शौर्यगाथा के नायक ने गौरक्षा के लिए कुख्यात लुटेरों का मुकाबला करते हुए अपने प्राणों का उत्सर्ग किया था। आज उसी नायक को स्थानीय लोग लोक देवता के रूप में पूजते है और उसकी याद में बने देवालय पर हर वर्ष मेला भरता है।

यह देवालय है रतनसिंह बालापोता का (बालापोता कछवाह कुल की एक खांप है)। जयपुर जिले के बलखेण ग्राम में जन्में इस वीर को विपदा जन्म से ही विरासत में मिली थी। बाल्यकाल में माता-पिता दोनों ही नहीं रहे। सेवदड़ा ग्रामवासी इनकी मौसी ने इनका लालन-पालन किया। इनकी एक भुआ मोलासर के राठौड़ों में ब्याही थी। उसके चतरसिंह नाम का एक पुत्र था। चतरसिंह, रतनसिंह का अभिन्न सहयोगी था। जब रतनसिंह युवा हुए तो इनकी सगाई रायांगणां के मांगलिया क्षत्रियों के यहाँ की गई। विवाह की तिथि भी निश्चित कर दी गई। भुआ के बेटे चतरसिंह को विवाह में आमंत्रित करने के लिए निमन्त्रण भेजा गया और चतरसिंह निमंत्रण पाकर सेवदड़ा गांव आ गए।

रतनसिंह कुशल घुड़सवार थे। उनके मांसोसा (मौसाजी) ने रतनसिंह को कन्हैया नामक अच्छी नस्ल का एक घोड़ा प्रसन्नतापूर्वक भेंट किया था। सेवदड़ा के ठाकुरों और धाड़ेतियों (डाकुओं) के आपस में बैर था। उन्होंने मौका देखा कि सेवदड़ा के ठाकुर रतनसिंह की शादी की तैयारियों में व्यस्त है, सो अवसर का फायदा उठाकर क्यों ना सेवदड़ा गांव का पशुधन घेरा जाय। धाडे़ती चुपचाप आये और गांव के खेतों में चर रही गायों को घेर कर लिया। ग्वालों ने कोटड़ी (ठाकुर का आवास) पर आकर अपना पशुधन डाकुओं से बचाने की फरियाद की। हाथों में कंकण बंधे हुए, पीठी की हुई, बान बैठे हुए (शादी की रस्में) रतनसिंह ने ग्वालों की गुहार सुनी। अपने घोड़े की ओर देखा, घोड़ा हिनहिनाया। गौरक्षा  हेतु पर्यन करने के लिए रतनसिंह ने चरवादार को घोड़े पर पाखर (जीन) कसने का आदेश दिया।

रतनसिंह और चतरसिंह दोनों हाथों में भाले थामें, पीठ पर ढाल बांधे, कमर पर तलवार बाँध, अपने घोड़ों पर सवार हो, धाड़ेतियों के पीछे दौड़े। रतनसिंह ने धाड़ेतियों के समीप पहुंचकर उन्हें ललकारा- कायरों की भांति गायें घेरकर (लूटकर) कैसे ले जा रहे हो। क्या इस धरती का कोई धणी-धोरी नहीं है। आमना-सामना हुआ। खूब खड्ग चले। धाडे़ती मुकाबले में ठहर नहीं सके। एक भाई ने पशुधन को संभाला। दूसरे ने धाड़ेतियों के खिलाफ मोर्चा संभाला और पशुधन को लेकर गांव आने लगे। रतनसिंह, चतरसिंह दोनों पशुधन लेकर जब गांव की ओर आने लगे, तब रास्ते में एक बूढी औरत मिली। बुढ़िया ने कहा कि इनमें मेरा केरड़ा (गाय का बच्चा) तो आया ही नहीं। तब रतनसिंह, चतरसिंह दोनों वापस गए। सरवड़ी और पूरणपुरा गांव के बीच फिर दोनों पक्षों के मध्य मुकाबला हुआ। इस मुकाबले में मोलासरवासी चतरसिंह काम आये। रतनसिंह पास के गांव मावा तक धाड़ेतियों से लड़ते रहे। तभी एक धाड़वी के खड़्ग वार से रतनसिंह का मस्तक कटकर धरती पर गिर गया (जहाँ आज भी उनके स्मारक स्वरूप एक देवरी बनी है)। सिर कटने के बाद भी रतनसिंह की धड़ पशुओं को घेरकर गांव की ओर ला रही थी। मोरडूंगा गांव के पास सरवड़ी व पूरणपुरा गांव के कांकड़ के पास आते-जाते बालकों की दृष्टि मस्तक विहीन घुड़सवार पर पड़ी। बालकों ने उच्च स्वर से कहा- बिना मस्तक का शुरमां। इतना कहना था कि कमध (धड़) घोड़े से नीचे गिर पड़ा। घोड़ा वही खड़ा रहा, उसकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी।

लेखक : नरेंद्रसिंह, निभैड़ा

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