गुलाल : एक गैरजिम्मेदार फिल्म

पिछले कई दिनों से विदेशो से कई राजपूत युवाओं के इस फिल्म से सम्बंधित मेल आये व इसे देखकर इसके बारे में लिखने का अनुरोध भी किया | उसके बाद समीर जी की पोस्ट “जैसे दूर देश के टावर में गुलाल ” में इस फिल्म की समीक्षा पढने के बाद मुझे इस इस फिल्म को देखना जरुरी सा लगा वैसे में फिल्म कभी कभार ही देखता हूँ | फिल्म देखने के बाद मुझे तो यह एक घटिया और गैरजिम्मेदार फिल्म लगी | घटिया फिल्म बनाना निर्माता निर्देशक का विशेषाधिकार हो सकता है लेकिन मुझे इस फिल्म में अलग राजपुताना प्रदेश की मांग उठाते दिखाने पर सख्त ऐतराज है इस तरह की अलगाववादी अवधारणा फैलाने वाला यह कृत्य गैरजिम्मेदार है | मुझे समझ नहीं आ रहा कि इस फिल्म में स्वतंत्र राजपुताना की मांग उठाते दिखा कर फिल्म निर्माता निर्देशक समाज को क्या बताना चाहते है ? जब आज तक अलग राजपुताना की अवधारणा पर किसी ने सोचा तक नहीं | देश की आजादी के बाद राजस्थान की सभी देशी रियासतों ने अपना भारतीय संघ में विलय कर राष्ट्र की मुख्य धारा में जुड़ गए | आजादी के बाद राजस्थान के सभी पूर्व राजा और राजपूत हर वक्त देश हित में बलिदान होने को तत्पर है जिसका प्रमाण आजादी के बाद हुए तमाम युद्धों में शहीद हुए भारतीय सेना में शामिल राजपूत जाति के सैनिको की लम्बी सूची देखकर देखा जा सकता है | कितने ही राजपूत सैनिकों ने युद्धों में अद्वितीय वीरता का प्रदर्शन कर परमवीर चक्र,महावीर चक्र और अनेक शोर्य चक्र प्राप्त किये है | देशी रियासतों में सबसे धनी मानी जाने वाली रियासत जयपुर के पूर्व महाराजा भवानी सिंह जी ने भारतीय सेना में नौकरी की जिन्हें युद्ध में अद्वितीय वीरता प्रदर्शित करने पर भारतीय सेना ने महावीर चक्र देकर सम्मानित किया | राजपूतों द्वारा हर क्षेत्र में देशहित में कदम ताल मिलाते चलने के बावजूद इस फिल्म में राजपूतों को अलग राजपुताना की मांग करते दिखाया गया है जो एक गैर-जिम्मेदाराना कृत्य है | इस फिल्म के निर्माता निर्देशक ने यह कृत्य कर तमाम राजपूत जाति के लोगों की भावनाएं आहत की है जो भारत भूमि से बेहद प्यार करते है | इस फिल्म ने उन तमाम शहीद राजपूत सैनिकों की शहादत का अपमान किया है जिन्होंने भारत माता की रक्षा के लिए अपना जीवन बलिदान किया है |
फिल्म के निर्माता निर्देशक धन कमाने के चक्कर में कैसी भी काल्पनिक कहानी बना फिल्म बनाले लेकिन ये समझ से परे है कि ” सेंसर बोर्ड ” इस तरह अलगाववाद की अवधारणा फैलाने वाली फिल्मो को कैसे पास कर देता है ?
समीर जी ने इस फिल्म की समीक्षा करते कितना सटीक लिखा है कि
ऐसे देश में, जो खुद ही अभी विखंडित होने की मांग से आये दिन जूझता हो, कभी खालिस्तान, तो कभी गोरखालैण्ड तो कभी आजाद कश्मीर, इस तरह का एक और बीज बोना, आजाद राजपूताना, जिसकी अब तक सुगबुगाहट भी न हो, क्या संदेश देता है? क्या वजह आन पड़ी यह उकसाने की-समझ से परे ही रहा.

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24 Responses to "गुलाल : एक गैरजिम्मेदार फिल्म"

  1. डॉ. मनोज मिश्र   April 15, 2009 at 12:54 am

    सदविचार जी .

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  2. यहाँ वहाँ वैमनस्य के बीज खुद ही बोते रहना बिलकुल ठीक नहीं। आप से सहमति है।

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  3. ताऊ रामपुरिया   April 15, 2009 at 2:59 am

    हमने फ़िल्म तो नही देखी और शायद देख भी नही पायेंगे. पर आपकी बात को मानते हुये यही कहना चाहेंगे कि इन फ़ि्ल्मी ताऊओं का गणित सिर्फ़ पैसा कमाना होता है, इनको देश जाति और समाज से कुछ नही लेना देना होता है.

    पर चुंकि फ़िल्मों का दायरा बडा विस्तृत होता है और वो काफ़ी लोगों तक पहुंचती हैं तो इस बारे मे सेंसर को थोडी सतर्कता बर्तनी चाहिये .

    रामराम

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  4. dhiru singh {धीरू सिंह}   April 15, 2009 at 4:15 am

    एक बारबर शब्द होने से नाम बदल गया बिल्लू का . और राजपूतो की आन बान शान से सिनेमा मे अक्सर बलात्कार होता रहता है . क्योकि हम अपनी आन बान शान को भुला बैठे है . जोधा अकबर के समय भी ऐसा हुआ था .

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  5. संजय बेंगाणी   April 15, 2009 at 5:54 am

    फिल्म देखी पाँच मिनट, बस. अलग राजपुताना का विचार ही बकवास है. खामखा किसी कौम को देशद्रोही बताना गलत है. एक राजस्थानी के नाते दुख हुआ और फिल्म नहीं देखी.

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  6. महामंत्री - तस्लीम   April 15, 2009 at 6:01 am

    फिल्‍म के बारे में जानकारी देने का आभार।
    ऐसी फिल्‍मों की आलोचना आवश्‍यक है।
    ———–
    तस्‍लीम
    साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

    Reply
  7. हिंदुस्तान के अभिन्न प्रांत राजस्थान का नागरिक होने के नाते आपकी बात का शत-प्रतिशत समर्थन करता हूं..

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  8. Science Bloggers Association   April 15, 2009 at 12:08 pm

    सच बात को साझा करने के लिए आपके आभारी हैं हम।
    ———-
    तस्‍लीम
    साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

    Reply
  9. Dipti   April 15, 2009 at 12:15 pm

    फ़िल्म निर्माता ये बात बहुत अच्छे तरीक़े से जानते हैं कि फ़िल्मों का क्या प्रभाव होता है ख़ासकर आज के इस माहौल में। बावजूद इसके इस तरह की फ़िल्म बनाकर वो विवाद के लिए एक नए मुद्दे को जन्म देते रहते हैं। ऐसे मुद्दे पर फ़िल्म बनाकर या फिर किसी ऐसे मुद्दे को फ़िल्म में जोड़कर उन्हें मुफ़्त में प्रचार जो मिल जाता है।

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  10. manish   April 15, 2009 at 12:26 pm

    bade harsh ke saath kahna chahun ga ki jis prakar aap ne jatiy nishthaon se uper uthkar rashtriyata ko buland kiya hai uske liye koti-koti dhanywad manish chauhan ganjdundwara

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  11. दर्पण साह "दर्शन"   April 15, 2009 at 12:54 pm

    Gulal movie ke content ke bare main aur direction ke baare main to meri bhi yahi rai hai par….

    songs are Awesome…

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  12. नरेश सिह राठौङ   April 15, 2009 at 1:08 pm

    मै धीरू सिंह जी की बात से पूर्णतया सहमत हू । सच मे यह हमारे समाज के सामने एक विचारणीय मुद्दा है ।

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  13. ab inconvenienti   April 15, 2009 at 4:22 pm

    इसके निर्देशक अनुराग कश्यप खुद राजस्थानी राजपूत हैं. उनके परिवार ने इमरजेंसी के दौरान अपना उपनाम बदला था. उन्होंने राजपुताना और बुकी बना को एक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया है. क्या इस फिल्म में खालिस्तान, कश्मीर, नक्सल, तमिल टाइगर, राज ठाकरे की झलक नहीं मिलती?

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  14. विष्णु बैरागी   April 15, 2009 at 5:49 pm

    फिल्‍म का विचार अच्‍छा था किन्‍तु ‘ट्रीटमेण्‍ट’ उतना ही रद्दी। फिल्‍म इतनी अधिक प्रतीकात्‍मक बना दी गई कि पूरे समय तक बैठना भारी पड जाए। अलगाव वाली मानसिकता तो से तो सहमत हो पाना किसी के भी लिए सम्‍भव नहीं।
    किन्‍तु, फिल्‍म में ‘कविता’ को जिस तरह से प्रयुक्‍त किया ग्रया, वह बहुत ही कम फिल्‍मों में दिखाई दिया।
    ‘गुलाल’ के जरिए कविता को फिल्‍मों में जगह मिलनी शुरु होगी।

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  15. Anil   April 16, 2009 at 12:24 am

    भारत में जितने व्यक्ति हैं, उतने ही राज्य बनाये जायें तो ही कुछ उम्मीद है। वरना रोज़ किसी नये राज्य की माँग उठती ही रहती है। एक नज़र यहाँ भी देखें!

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  16. Udan Tashtari   April 16, 2009 at 4:21 pm

    बिल्कुल सही कहा और मेरी बात को समर्थन दे आपने मुझे एक हौसला दिया है. आपका बहुत आभार.

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  17. गौतम राजरिशी   April 16, 2009 at 5:57 pm

    सच कहा आपने…..
    भारतीय सेना में तो यकिनन राजपूतों के योगदान का कोई जोड़ नहीं है

    Reply
  18. मेरे विचार से फिल्म में कुछ गलत नहिं बताया गया है. भारत में विलय के बाद राजस्थान के प्रती भेद-भाव पुर्ण बर्ताव को बखुबी प्रदर्शीत किया गया है. कुछ गलत नहिं है…. बुकी बन्ना का भाषण अपने आप मे हकिकत है… अपनी मानसिकता को बदल कर अपने दिल से सोचों और फिर से उस भाषण को सुनो

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  19. Avi   July 7, 2010 at 8:11 am

    फिल्मो को फिल्म की तरह ही लिया जाना चाहिए| लोगों को दूसरों की लकीर मिटा कर खुद की लकीर बड़ी बताने की आदत हो चली है | यह सही है कि इतिहास में नहीं जिया जा सकता तो फिर उसी इतिहास से केवल स्याह पन्ने ही क्यों निकाले जाते हैं हमेशा, वो भी बिना प्रत्यक्ष प्रमाण ? पृथक राजपूताने की मांग इस फिल्म से पहले तो कभी नहीं सुनी | राजपूतों की देशभक्ति, मर्यादा एवं शान पर उंगली उठाने से पहले इतिहास के पृष्ठ उलट कर देख लें |

    Avinendra Singh

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  20. champu   November 7, 2010 at 9:15 am

    आज कल कई जातिवादी गाने भी चल चुक है जो की हिन्दू समाज के लिए और भी बुरी खबर है

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  21. HEMENDRA SINGH SHAKTAWAT   June 26, 2012 at 5:59 pm

    मेँ आप से सहमत हूँ ।

    Reply
  22. HEMENDRA SINGH SHAKTAWAT   June 26, 2012 at 6:01 pm

    मेँ आप से सहमत हू ।

    Reply
  23. Siddharth Singh Shekhawat   July 25, 2012 at 3:13 am

    गुलाल फिल्म का राजपूतों से कोई लेना देना नहीं था और न ही इसका मकसद राजपूतों कि कहानी बताना था! गुलाल में अनुराग कश्यप ने राजपूत चरित्रों को इस्तेमाल किया है एक अलग तरह का सन्देश देने के लिए कि किस तरह व्यक्ति नाम और शक्ति के लिए कैसे घटिया षडयंत्र रच देता है जिसमे वह अपनी बहिन तक को इस्तेमाल करता है!

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  24. एक हिसाब से सही भी है और गलत भी…..लेकिन मेरे को ये फिल्म अच्छी लगी।

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