क्या ये नव सामंतवाद नहीं ?

हमारे देश में सदियों से राजतन्त्र प्रणाली शासन प्रणाली चलती रही धीरे धीरे इस प्रणाली में संघ राज्य की शक्तियाँ क्षीण होती गयी और नतीजा छोटे छोटे स्वतंत्र राज्यों ने जन्म ले लिया, कई सारे स्वतंत्र राज्य होने, उन पर कई वंशानुगत अयोग्य शासकों के आसीन होने के चलते हमारी शासन प्रणाली में कई तरह के विकार उत्पन्न हो गए जो बाहरी आक्रान्ताओं खासकर मुगलों के आने बाद बढ़ते ही गये| मुगलों के आने से पहले हमारे यहाँ के शासक आम जनता से किसी तरह की दुरी नहीं रखते थे पर मुगलों के सम्पर्क में आने के बाद उनका अनुसरण करते हुए वे भी शानो-शौकत से रहने लगे, यहाँ के कई राजा मुगलों के सामंत बन गए तो अपना राज्य सुचारू रूप से चलाने को उन्होंने भी अपने अपने राज्यों में सामंतों की एक बड़ी श्रंखला पैदा कर दी|

ये सामंत ही राज्य संचालन में राजा व प्रजा के बीच की कड़ी बन गए, राजा भी शासन कार्यों व सैन्य सुरक्षा शक्ति आदि पर इन सामंतों पर आश्रित हो गये| मुगलों के शक्तिहीन होने व देश में अंग्रेजों के वर्चस्व बढ़ने के बाद इन राजाओं की स्थिति और भी दयनीय हो गयी उन्हें जहाँ शासन की नीतियों के लिए अंग्रेजों का मुंह ताकना पड़ता था वही प्रशासन चलाने व सुरक्षा आदि कार्यों के लिए सामंतों पर निर्भर रहना पड़ता था|

आजादी के आन्दोलन के समय जहाँ जहाँ अंग्रेजों का सीधा शासन नहीं होकर राजाओं के साथ संधियाँ थी वहां वहां (राजस्थान में) प्रजा को शासन में भागीदारी देने हेतु प्रजामंडल व प्रजा परिषदों का गठन हुआ, इन परिषदों में शामिल होने वाले लोग जो आजादी के बाद कथित स्वतंत्रता सेनानी कहलाये, उस समय वे चाहते थे कि राज्य की बागडौर उनके हाथों में आ जाये और जिम्मेदारी राजा की रहे मतलब आजादी नहीं सिर्फ शासन में उनकी भागीदारी चाहिये थी| इन प्रजामंडलों को शासन में भागीदारी मिलते ही इनका सीधा टकराव राज्य के सामंतों से हुआ जो अब तक उस व्यवस्था पर काबिज थे|

आजादी के बाद यही प्रजामंडलों वाली भीड़ कांग्रेस में घुस फर्जी स्वतंत्रता सेनानी बन गयी और कांग्रेस के नेतृत्व को झूंठी कहानियां घड़ सामंतों से दूर रखा साथ ही जनता में भी सामंतवाद को कोसते हुए, शोषण की कहानियां बना दुष्प्रचार कर बदनाम कर दिया कि आपके सबसे बड़े शोषक यही सामंत है|

आज वर्तमान किताबी ज्ञान हासिल की हुई पीढ़ी इन्हीं सामंतों को अत्याचारी, शोषक आदि मानती है जबकि वे बुजुर्ग जिन्होंने सामंतों को देखा, उनके सम्पर्क में रहे वे सामंतों की प्रशंसा करते नहीं थकते| हो सकता है कुछ सामंत दुराचारी रहे भी हों|
खैर….हमारी शासन प्रणाली में आये विकारों व सामंतवाद को कोसते हुये लोकतंत्र में कई दलों ने वोट बैंक बनाये और वे सत्ता की सीढियाँ चढ़ते आगे बढ़े| आज किसी दल का ऐसा कोई नेता नहीं जो सामंतवाद को नहीं कोसता जबकि आज जब सामंतवाद प्रणाली का कोई अस्तित्व ही नहीं बचा तो उन्हें कोसने की क्या आवश्यकता ?

लेकिन एक बात जरुर है हमारे राजनेता जो अक्सर सामंतवाद को पानी पी पीकर कोसते नहीं थकते, उन्होंने भी सत्ता मिलते ही एक नये सामंतवाद का उदय जरुर कर दिया| कितने ही ऐसे राजनैतिक घराने व बन गये जो अपनी अपनी पार्टियों के राजाओं की तरह ही दल के नेता का वारिश वंशानुगत तौर पर उस दल का वारिस होता है, दलों के क्षत्रप सामंत की पूरी भूमिका निभाते है और उनके चुनाव क्षेत्र भी दलों द्वारा वंशानुगत तौर पर आवंटित होने लगे है कुल मिलाकर एक नव सामंतवाद का प्रादुर्भाव हो चूका है| ये नए सामंत भी जनता का शोषण करने में कहीं पीछे नहीं है बल्कि इन वर्तमान सामंतों ने तो इस मामले में पूर्व सामंतों को ही पीछे छोड़ दिया है| बस फर्क यही है-

– पहले के सामंत राज्य को अपनी पैतृक सम्पत्ति मानकर उनकी रक्षा के लिए प्राणों की आहुतियाँ देने तक में पीछे नहीं रहते थे|
आज के सामंत राज्य की संपत्तियों को भ्रष्टाचार के माध्यम से लूटकर विदेशी बैंकों में जमा कराने में लगे है इस डर से कि पता नहीं बाद में मौका मिले या नहीं|

– पहले के सामंतों को अपनी सामंती व अपना राज्य बचाने या पाने के लिए सिर कटवा कर अपना व अपने स्वजनों का बलिदान देना पड़ता था|

आज के सामंत को अपनी सामंती बचाने के लिए सिर कटवाने की कोई जरुरत नहीं सिर्फ सिर गिनवाने से ही काम चल जाता है|

– उस समय के सामंत अपनी प्रजा को बिना किसी धार्मिक भेदभाव के अपनी समझते थे पर आज के सामंत जनता के सिर्फ उसी वर्ग को अपना समझते है जो उन्हें वोट देता है वे सिर्फ अपने वोट बैक वाले वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएं बनाते है|

– उस समय जनता पर कोई बुरा सामंत वंशानुगत तौर पर आसीन हो जाता था जो प्रजा का अपनी मनमर्जी शोषण कर सकता था पर आजकल जनता किसी बुरे व्यक्ति को जानते हुए भी जाति,धर्म,पार्टी लाइन आदि के वशीभूत खुद अपना शोषण करने व देश के संसाधनों को लूटकर स्विस बैंकों में जमा करने के लिए चुनकर नियुक्त कर देती है|

– उस समय का सामंत जीवन भर प्रजा के प्रति उतरदायी रहता था पर आज का सामंत कुछ वर्ष के लिए ही उतरदायी होता है चुनाव में हारने के बाद उसका उतरदायित्व किसी और के कंधे पर शिफ्ट हो जाता है|

– सामंती काल में भी किसी सामंत का राजा पक्ष लेता था उसी तरह आज भी किसी नव सामंत पर पार्टी आलाकमान का वरदहस्त होता है तो उसके भ्रष्टाचार व शोषण को जानते हुए भी जनता उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती|

– सामंतवाद को कोसने वाली पार्टियों व नेताओं को आज भी सामंतवाद को कोसने के अलावा पूर्व सामंतों से कोई परहेज नहीं जहाँ जिस चुनाव क्षेत्र में पूर्व सामंतों के नाम से सीट जीती जा सकती है उस सीट पर हर राजनैतिक दल की पहली पसंद पूर्व सामंत परिवार के सदस्य ही होते है|

मजा तो कई बार तब आता है जब यही पूर्व सामंत राजनीति में स्थापित होने के लिये खुद सामंतवाद को कोसते नजर आते है|
कुल मिलाकर हमारे देश के नेताओं व जनता द्वारा भरपूर कोशिश करने के बाद भी सामंतवाद ख़त्म नहीं हुआ बल्कि नए रूप में प्रतिपादित होकर हमारे सामने सीना तानकर खड़ा है और जनता बेबस होकर उसे बढ़ावा देने में लगी है|

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