कौन था सीकर का वीरभान Veerbhan ka Bas Sikar

सीकर का वीरभान : सीकर शेखावाटी का एक महत्त्वपूर्ण ठिकाना था | इस ठिकाने पर कछवाह वंश के राव तिरमलजी शेखावत के वंशजों का आजादी पूर्व शासन था | राव तिरमलजी के वंशज रावजी का शेखावत कहलाते हैं | सीकर से पूर्व राव तिरमलजी के वंशजों की राजधानी पहले कासली और बाद में दूजोद रही | सीकर जिसका पूर्व नाम वीरभान का बास था, खंडेला रियासत के अधीन था | राव तिरमलजी भी खंडेला से ही आये थे | दूजोद व खंडेला के शासकों के मध्य जो एक परिवार के थे, मध्य किसी बात को लेकर दुश्मनी थी | इसी दुश्मनी को मिटाने के बदले दूजोद वालों को वीरभान का बास मिला |

उस वक्त दूजोद पर राव दौलतसिंह का शासन था और खंडेला में राजा बहादुरसिंह थे | राजा बहादुर सिंह ने दोनों ठिकानों के मध्य सौहार्द करने के लिए हुए समझौते के तहत वीरभान का बास गांव जो दूजोद के नजदीक था, राव दौलतसिंह को दे दिया | बाद में राव दौलतसिंह ने दूजोद से यहाँ रहना शुरू किया और गढ़ की नींव रखी | बाद में राव दौलतसिंह के पुत्र राव शिवसिंह ने वीरभान का बास गांव जो इतिहास में श्रीकर के नाम से भी जाना जाता है, का सीकर नाम से विकास कर विस्तार किया |

ये सब बातें इतिहास में मिलती है पर सीकर का नाम वीरभान का बास क्यों था ? वह वीरभान कौन था, जिसके नाम से श्रीकर गांव वीरभान का बास पुकारा जाने लगा | ज्यादातर इतिहास इस विषय पर मौन है और यही छोटी छोटी बातें मनघडंत इतिहास घड़ने वालों को झूठा इतिहास लिखकर अपनी जाति का दावा करने का मौका देती है |

दरअसल वीरभान सतनामी पंथ के बड़े संत थे, सतनामी पंथ की स्थापना उनके काका उदयसिंह ने की थी और वीरभान व उनके भाई जोगीदास ने इस पंथ का प्रचार प्रसार कर आगे बढाया | नवरतन साध सतनामी  द्वारा लिखित पुस्तक “सतनामी पंथ के आधार स्तम्भ संत जोगीदास वीरभान” के अनुसार वीरभान निरबाण चौहान राजपूत थे और कासली से आकर वर्तमान सीकर बस गये | उनके नाम से उनका स्थान वीरभान का बास कहा जाने लगा | चूँकि वीरभान सतनामी पंथ के प्रसिद्ध संत थे, औरंगजेब के खिलाफ मार्च 1672 में नारनोल में सतनामी पंथ के अनुयायियों ने विद्रोह किया था, जिसका नेतृत्व वीरभान ने किया था |

जाहिर है औरंगजेब की सेना को परास्त करने व एक पंथ के बड़े संत होने के कारण वीरभान देशभर में प्रसिद्ध थे अत: उनके गांव को वीरभान का बास कहा जाने लगा |  नवरतन साध सतनामी ने अपनी पुस्तक में वीरभान की नाडोल (सिरोही) से कासली आने तक की वंशावली भी लिखी है |

इस तरह सीकर वीरभान निरबाण जो सतनामी पंथ के प्रसिद्ध संत थे के नाम पर “वीरभान का बास” नाम से जाना जाता था|

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