कैसे बचे ईमानदारी ?

रामसिंह अपनी कालेज की पढाई पूरी करने के बाद दिल्ली आ गया | उसके गांव में ज्यादातर बुजुर्ग भारतीय सेना के रिटायर्ड थे और गांव के ज्यातर युवा भी फ़ौज में थे जिनसे राम सिंह को हमेशा ईमानदारी पूर्वक कार्य करने की शिक्षा व प्रेरणा ही मिली थी | पारिवारिक संस्कारों में भी ईमानदारी महत्वपूर्ण थी |
दिल्ली आकर रामसिंह एक प्राइवेट कंपनी में कार्य करने लगा जहाँ रामसिंह को कंपनी के लिए कई तरह के कच्चे माल खरीदने का कार्य सौपा गया जिसे रामसिंह ने पूरी ईमानदारी व निष्ठा के साथ वर्षों तक किया | कंपनी के उत्पादन के लिए किसी भी तरह का कच्चा माल खरीदने में रामसिंह हमेशा इमानदार रहा | कभी किसी कच्चे माल के आपूर्तिकर्ता ने रामसिंह को लालच देने की कोशिश भी की तो रामसिंह ने उसे झिडक्ने के साथ आगे के लिए उससे कच्चा माल लेना ही बंद कर दिया | ऐसे ही ईमानदारी व निष्ठा पूर्वक रामसिंह अपना कर्तव्य सालों निभाता रहा लेकिन फिर भी कंपनी के मालिको की नजर में उसकी कोई अहमियत नहीं थे अत: उसकी कभी तरक्की भी नहीं हुई
| जबकि जो लोग बेईमान थे वे अक्सर उस कंपनी में तरक्की पाते रहे फिर भी रामसिंह कभी इस बात से भी विचलित नहीं हुआ |
एक दिन रामसिंह को अचानक किसी आपात कार्य की वजह से एक आपूर्तिकर्ता के दफ्तर जाना पड़ा ,अक्सर उस कम्पनी का प्रतिनिधि ही रामसिंह के पास आता रहता था इसलिए रामसिंह उसके यहाँ कभी कभार ही जाते थे | उस दिन वह प्रतिनिधि छुट्टी गया हुआ था इसलिए रामसिंह उस आपूतिकर्ता के दफ्तर खुद ही चले गए | कार्य सम्बन्धी चर्चा करने के बाद जब रामसिंह जाने के लिए उठे तभी उस आपूर्तिकर्ता ने रामसिंह को एक लिफाफा पकड़ाते हुए क्षमा याचना की कि इस बार उसके प्रतिनिधि के छुट्टी पर चले जाने के कारण यह हर बार की तरह यह लिफाफा आपको भेज नहीं सका |
“हर बार नहीं भेज सका ” सुनते ही रामसिंह ने चोंक कर आपूर्तिकर्ता से पूछा – क्या आप ऐसे कमीशन के लिफाफे हर महीने भेजते हो ? और ये कब से भेजते हो ?
इस पर आपूर्तिकर्ता ने बताया – सर ! जब से आपने हमें आर्डर देना शुरू किया है तभी से मै तो आपका जितना कमीशन बनता है वह हर महीने अपने प्रतिनिधि के साथ भेज रहा हूँ | क्या आपको कभी नहीं मिला क्या ?
रामसिंह – नहीं तो !
अब रामसिंह को समझते देर नहीं लगी कि मेरे नाम से इसका प्रतिनिधि वर्षों से हर माह इससे कमीशन की राशी लाकर खुद अपने ही पास रखता रहा | मै कितना भी ईमानदार रहूँ इसकी नजर में तो मै बेईमान ही हूँ | रामसिंह चुपचाप वह लिफाफा ले रवाना हो गया और रास्ते भर सोचता रहा पता नहीं इसकी तरह ही कितने आपूर्तिकर्ताओं की जेब से मेरे नाम से कमीशन का पैसा निकाल कर उनके प्रतिनिधि ही बीच में ही खा जाते है | इससे बढ़िया तो मै ही इस पैसे को रख ले लेता और उसे अपने गरीब व जरुरत मंद रिश्तेदारों व गांव के सार्वजनिक कार्यों में खर्च करता |
और उस दिन के बाद रामसिंह ने वो ईमानदारी का चौला उतार फैंका जो पारिवारिक संस्कारों व गांव के बुजुर्गो ने उसे पहनाया था जिसे उसने वर्षो बड़ी ईमानदारी के साथ पहने रखा | और उसके बाद रामसिंह ने सभी आपूर्तिकर्ताओं से सीधे बात कर कमीशन की राशी खुद मंगवाना शुरू कर दिया | और उस पैसे को सार्वजनिक कार्यों पर खर्च करने के अलावा अपने रिश्तेदारों,मित्रों ,अपने अधिनस्त कर्मचारियों पर दिल खोलकर खर्च करना शुरू कर दिया | अधिनस्त कर्मचारियों पर खुला पैसा खर्च करने के कारण वे कम्पनी में सबसे ज्यादा उसका कहा मानने लगे जो काम कर्मचारी दुसरे प्रबंधकों के कहने पर चार दिन में पूरा करते थे वही काम वे रामसिंह के कहने पर एक दिन में ही कर देते थे इससे कम्पनी के मालिको को भी रामसिंह सबसे ज्यादा सफल प्रबंधक नजर आने लगा और एक बाद एक कम्पनी के सभी कार्य उन्होंने रामसिंह को सुपुर्द कर उसे पूरी कम्पनी का प्रबंधक बना दिया |
आज टूटे स्कूटर पर चलने वाले रामसिंह के पास कम्पनी की दी हुई शानदार बड़ी सी गाड़ी है ,वह बस या रेल की जगह हवाई यात्रा करता है | तरक्की व कमीशन की सम्मिलित कमाई से उसके पास शानदार घर व अन्य संपत्तियां है | रिश्तेदारों ,मित्रों व अधिनस्त कर्मचारियों पर खुलकर खर्च करने की आदत के चलते सभी लोग रामसिंह के दीवाने है | गांव में सार्वजनिक कार्यों में खर्च करने से अब वह गांव का सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति है |
कई बार आपसी चर्चा में रामसिंह खुद कहता है कि ” जब ईमानदार रहे तब किसी ने कदर नहीं की , उन मालिकों ने भी नहीं जिनके लिए पूरी ईमानदारी व निष्ठा के साथ काम किया |
आज जब बेईमानी सीखी तब सभी वाह वाह कर रहे चाहे कम्पनी के मालिक हो या और लोग |”

डिस्क्लेमर – यह लेख सच्ची कहानी पर आधारित है बस पात्र का नाम बदल दिया गया |

“ताऊ गोल्डन पहेली ” पर ताऊ पहेली संपादक मंडल को ढेरों बधाइयों सहित शुभकामनाएँ – 50

15 Responses to "कैसे बचे ईमानदारी ?"

  1. Udan Tashtari   November 30, 2009 at 1:59 am

    ब ईमानदार रहे तब किसी ने कदर नहीं की , उन मालिकों ने भी नहीं जिनके लिए पूरी ईमानदारी व निष्ठा के साथ काम किया |
    आज जब बेईमानी सीखी तब सभी वाह वाह कर रहे चाहे कम्पनी के मालिक हो या और लोग |

    –आज इसी का जमना है भाई…बहुत उम्दा कथा.

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  2. Vivek Rastogi   November 30, 2009 at 2:37 am

    ईमानदारी आखिर कब तक जीवित रहती !!!

    आखिरकार सबको स्टेटस चाहिये भले ही वह धरती के झूठे धरातल पर हो…

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  3. ललित शर्मा   November 30, 2009 at 3:26 am

    ये भी एक इमानदारी ही है-पहले युं ही बेईमान हुए जा रहे थे, यही तो मैनेजमेंट है। बधाई

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  4. संगीता पुरी   November 30, 2009 at 4:12 am

    एक कंपनी में काम करनेवाले एक ईमानदार कर्मचारी ने अपनी कमजोर स्थिति को दिखाते हुए जब कंपनी के मालिक से अपनी बेटी के विवाह में मदद करने को कहा तो उन्‍होने उसे नौकरी से ही निकाल दिया , यह कहते हुए कि तुम अपने और अपने परिवार के लिए कुछ नहीं सोंच पाते तो हमारी कंपनी के लिए क्‍या सोंचोगे .. ऐसे होते हैं आज के मालिक ,उल्‍टे सीधे धंधे से ही सही , खुद भी कमाओ , और उनके फंड में भी वृद्धि करते रहो .. यह भी एक सच्‍ची घटना ही है !!

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  5. निर्मला कपिला   November 30, 2009 at 4:17 am

    अब सब के मायने बदल रहे हैं उल्टी गंगा बह रही है बेईमानी ही इमानदरी हओ मगर अफ्सूस ये है कि बेईमानी भी इमानदारी से नहीं होरही। शुभकामनायें रचना बहुत अच्छी है

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  6. मनोज कुमार   November 30, 2009 at 5:14 am

    यही सच है।

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  7. पी.सी.गोदियाल   November 30, 2009 at 5:28 am

    कलयुग इसी का तो नाम है, लेकिन मेरा दृष्टिकोण यह है कि भगवान् के घर देर जरूर है अंधेर नहीं अथ उन सज्जन को गलत राह न पकड़ते हुए अपने पथ अपर अडिग रहना चाहिए था

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  8. Dr. Jitendra Bagria   November 30, 2009 at 9:12 am

    bahoot khoob kaha sir ji !

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  9. ताऊ रामपुरिया   November 30, 2009 at 9:51 am

    बिल्कुल सही बात है. सब कुछ उल्टापुल्टा हो रहा है आजकल. पर गोदियाल जी की बात सही लग रही है.

    रामराम.

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  10. ज्ञानदत्त G.D. Pandey   November 30, 2009 at 4:06 pm

    ओह, मैं शायद सहमत न हो पाऊं। ईमानदार और दक्ष में कोई विरोधाभास नहीं दीखता मुझे।
    कुछ लोग ईमानदारी को चिरकुटई की स्तर तक डिफाइन करते हैं। मसलन कौटिल्य का उदाहरण दिया जाता है कि उन्होने सरकारी दिया बुझा कर अपना दिया जलाया उनसे मिलने आये व्यक्ति से वार्तालाप करते समय।
    खैर यहां टिप्पणी में वह चर्चा पूरी नहीं की जा सकती। मैं ईमानदारी का पक्ष लूंगा – पर एक लल्लू ईमानदार और दक्ष बेइमान में बेइमान को वरीयता दूंगा।

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  11. राज भाटिय़ा   November 30, 2009 at 4:26 pm

    ईमानदारी को इतनी जल्दी छोड दिया, मै भी सहमत नही हुं, क्योकि बेईमानी से कमाया पेसा एक दिन व्याज समेत निकलता है.
    धन्यवाद

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  12. RAJNISH PARIHAR   November 30, 2009 at 4:52 pm

    sachhai yahi hai…..ham sab jante hai…

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  13. जय बोलो बेईमान की।

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  14. चंदन कुमार झा   November 30, 2009 at 9:30 pm

    असमंजस में हूँ ।

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  15. नरेश सिह राठौङ   December 17, 2009 at 3:10 pm

    यथार्थ वादी कहानी है । यह परम सत्य है मै इस प्रकार के अनेक पात्रों को जानता हू ।

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