कैसे कह दूं

कैसे कह दूं

तुम आती हो जाती हो ,

तुम आती हो जाती हो

दिन हो या रात बस

हर पल चलती रहती हो

थक जाती होगी ना ?

आस मे रहती हो की

शायद मै कभी कह दू

तुम्हे की तुम आराम क्यों नहीं कर लेती

मै इतना भी नादाँ नहीं की तुम्हे ये कह दू

हा कह लो मुझे स्वार्थी ,

नहीं कहूँगा तुम्हे रुकने को

तब तक जब तक

मेरी हर ख्वाहिश पूरी ना हो जाती है

अब तुम ही कहो केसे कह दू मै तुम्हे

रुकने को

केसे कह दू की तुम थम जावो

आखिर सांसे हो तुम मेरी

11 Responses to "कैसे कह दूं"

  1. bilkul, ye n hongi to ham bhi to n honge..

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  2. Udan Tashtari   April 25, 2011 at 11:52 pm

    कैसे कोई भी कह दे….

    बेहतरीन.

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  3. sandhya   April 26, 2011 at 6:47 am

    हमेशा की तरह वाह – वाह कहना ही पड़ रहा है आप गायब हो जाती हैं मुझे इस बात की नाराजगी है .

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  4. नरेश सिह राठौड़   April 26, 2011 at 12:02 pm

    काफी दिनों बाद आपकी ये पोस्ट दिखाई दी है | सुन्दर और सच्ची बात कही है |

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  5. Ratan Singh Shekhawat   April 26, 2011 at 3:40 pm

    बढ़िया रचना | लिखने में नियमितता बनाएं रखें |

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  6. राज भाटिय़ा   April 26, 2011 at 6:02 pm

    बहुत सुंदर रचना, धन्यवाद

    Reply
  7. बहुत खूबसूरत …

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  8. H.K.L. Sachdeva   April 27, 2011 at 9:25 am

    बहुत सुंदर रचना है|

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  9. Er. सत्यम शिवम   April 27, 2011 at 9:37 am

    बहुत सुंदर रचना

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  10. प्रवीण पाण्डेय   April 29, 2011 at 8:18 am

    बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति।

    Reply

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