किया ! पर करना नहीं जाना !!

किया ! पर करना नहीं जाना !!

एक राजा को एक रात सपना आया कि- उसके सोने के थाल में सोने के कटोरे में परोसी खीर में कौवे ने चौंच मार दी| दूसरे दिन सुबह ही राजा ने अपने मंत्रियों आदि सभी को बुलाकर रात को आया अपना सपना सुना सपने का अर्थ पुछा| पर राजा के दरबार में कोई भी व्यक्ति इस सपने का अर्थ नहीं बता सका| इस बात से राजा बहुत दुखी होकर बोला कि- “क्या मेरी राजसभा में कोई भी व्यक्ति इतना सबल नहीं है कि एक साधारण से सपने का अर्थ बता सके? क्या यहाँ सभी मुर्ख है ? तभी एक बूढ़े व्यक्ति ने राजा से हाथ जोड़कर कहा -“महाराज सपने का अर्थ तो मैं समझ चुका हूँ पर आपको बता नहीं सकता| यदि मैंने आपको बताया तो आप मेरी जीभ काट देंगे या मुझे मृत्यु दंड दे देंगे|”

राजा ने कहा – ” हे वृद्ध सज्जन आप मुझे मेरे सपने का अर्थ बताये आपको मैं कुछ नहीं कहूँगा चाहे आप इसका कैसा भी अर्थ क्यों नहीं बताएं|” वृद्ध ने राजा को अकेले में अर्थ बताने का अनुरोध किया जिसे राजा ने मान लिया और वृद्ध को एकांत में ले गया ताकि वह उसे सपने का सही अर्थ बता सके| बूढ़े व्यक्ति ने राजा को अकेले में बताया कि- “सोने के कटोरे में परोसी खीर में कौवे द्वारा चौंच मारने का मतलब आपकी कोई रानी आपके किसी नौकर के साथ कोई चूक कर रही है पर आपकी कौनसी रानी ये गडबड कर रही है इसका मै नहीं बता सकता इसके लिए आपको पहरा लगवाना पड़ेगा और देर रात में जिस रानी के महल में दिया जल उठे समझ लीजिए वही चूक कर रही है|” राजा ने उसी रात रानियों के महल में गस्त लगवा दी और खूद भी चुपके से गस्त लगाने लगा| अचानक आधी रात को राजा ने देखा कि एक रानी के कक्ष में दिया जल उठा और राजा ने आगे देखा कि रानी एक पहरेदार से बात करते करते उसे अपने कक्ष में ले गयी बस फिर क्या था राजा को यकीन हो गया कि यही रानी उसके साथ बेवफाई कर रही थी यही सपने का राज था|

सुबह होते ही राजा ने दरबार लगाया और उस रानी को दरबार में बुला लिया और सबके सामने रात्री घटना का जिक्र करते हुए रानी से कहा कि- “आज से तू मेरी रानी नहीं है| तुम्हें जो व्यक्ति अच्छा लगे उसका हाथ थाम ले मेरी तरफ से तुझे पूरी इजाजत है|” रानी ये हुक्म सुनकर एकदम सकपका गयी| राजा गुस्से में तना बैठा था सो ऐसी परिस्थितियों में रानी कुछ भी कह नहीं पा रही थी| और वहां उपस्थित लोगों में से वह किसी जानती भी नहीं थी सो पास ही खड़े एक पहरेदार के साथ जाकर खड़ी हो गयी|
राजा ने हुक्म दिया कि- “इन्हें ले जाओ और इनका काला मुंह कर, इनके बाल काटकर इन्हें चौराहे पर बाँध दो, आने जाने वाले इन पर थूकेंगे यही इनकी सजा है|”

दोनों को चौराहे पर बांधते ही बहुत भीड़ इकट्ठी हो गयी| जितने मुंह उतनी उनके बारे में बातें होने लगी| राजा ने चौराहे पर लिपिक बैठा दिया कि “लोग इनके बारे में जो बाते करें वे उनके नाम सहित लिख लें| सो लोगों ने जितनी बातें की लिपिक लिखते गए| राज्य के प्रधान के तीन बेटियां थी उन्होंने भी जब इस प्रकरण के बारे सुना तो वे भी देखने आई| उन्होंने देखा दोनों पर लोग थूक रहे थे,मक्खियाँ उनके ऊपर भिनभिना रही थी, खून से लथपथ दोनों बंधे पड़े थे|

प्रधान की बड़ी बेटी बोली- ” करमों का फल है|” मझली बेटी बोली- ” जैसी करी वैसी भरी|” सबसे छोटी बोली- “इसने किया पर इसको करना नहीं आया, जब किया ही तो पूरा करके बताना चाहिए था|” लिपिकों ने ये बाते भी लिख ली| शाम को राजा जब ये सब पढ़ रहा था तो प्रधान की सबसे छोटी बेटी की टिप्पणी पढते ही राजा की नजर उस पर अटक गयी| उसने लिपिकों से पुछा कि- “ये किसने कहा ?” लिपिकों ने डरते डरते बताया कि- “महाराज ये आपके प्रधान जी की सबसे छोटी बेटी ने कहा था|” राजा ने तुरंत प्रधान को बुलाकर कहा कि- “कल ही आप अपनी छोटी बेटी का विवाह मेरे साथ करो ताकि वह करके बता सके जैसी उसने टिप्पणी की थी|”

प्रधान बहुत परेशान हुआ पर कर भी क्या सकता था? उसने घर जाकर अपनी बेटियों से सारी बात बताई| छोटी बेटी बोली- ” पिताजी आप चिंता ना करें| आप कल ही मेरी शादी राजा से करवा दें| यदि राजा को कुछ करके ना बताया तो मैं भी आपकी बेटी नहीं!” दूसरे ही दिन राजा व प्रधान की छोटी बेटी का विवाह संपन्न हो गया| राजा ने विवाह होते ही उसे जेल की एक कोठरी में बंद कर उसका दरवाजा भी ईंटों से चुनवा दिया और ऊपर एक छोटी सी जगह छुड़वा दी ताकि डंडे पर बांधकर खाना पानी कोठरी के अंदर दिया जा सके| और जेल की अँधेरी कोठरी में डालते वक्त राजा ने कह दिया – अब करके बताना तूं क्या कर सकती है?’

शादी से पहले ही तीनों बहनों ने आपस में सलाह कर ली थी सो उसी अनुसार दोनों बहनों ने प्रधान को बताकर उनसे जेल की उस कोठरी के अंदर तक एक सुरंग खुदवा डाली| सुरंग खुदते ही प्रधान की बेटी तो अपने घर आ गयी और वहां एक दासी को बिठा दिया जो पहरेदारों द्वारा डंडे पर बांधकर पहुँचाया जाने वाला खाना ले ले और खा कर वहां सोती रहे| प्रधान की बेटी ने एक तपस्वी का रूप बनाया गांव के बाहर जंगल के पास अपनी धुनी रमाई| उसे देखते ही लोग उमड़ पड़े| बाबाजी किसी को भभूत दे और कह दे कि- जा घोल के पी जा रोग मुक्त हो जायेगा| तो किसी पर निर्मल बाबा की तरह कृपा बरसा दे| लोगों ने भभूत ले जाकर पीने के लिए जैसे ही पानी में घोली तो पानी में सोने के दाने तैरने लगे| इस चमत्कार की चर्चा आनन फानन में पुरे राज्य में फ़ैल गयी और बात राजा की कानों में भी पहुँच गयी|

राजा ने इस बारे में प्रधान को पुछा तो उसने भी इस बात को सच बताया सो राजा शाम होते ही भेष बदलकर उस तपस्वी के पास जा पहुंचा| जैसे राजा तपस्वी के आगे पहुंचा और प्रणाम किया, तपस्वी आँखें बंद किये धुना रमाये बैठा था और बिना आँखें खोले बोला -“आयुष्मान रहो राजन!” इतना सुनते ही राजा को भरोसा हो गया कि बाबा जी वाकई करामाती है बिना आँख खोले ही मुझे पहचान गए| राजा को जाते समय बाबा ने भभूत दी बोला घोलकर पी लेना और कल फिर आना| राजा ने भभूत घोला तो पानी पर सोने के दाने तैरने लगे| राजा को तो ये देखकर बाबा पर पूरा भरोसा हो गया कि बाबा चमत्कारी है| दूसरे दिन तपस्वी बाबा ने अपने भक्तों से कह दिया कि अब आज से यहाँ कोई ना आये यदि कोई आया तो बहुत अनिष्ट हो जायेगा| इसलिए उस दिन के बाद कोई भक्त नहीं आया|

पर शाम होते ही राजा तो पहुँच ही गया| तपस्वी बाबा ने राजा को एक जड़ी देते हुए बोला- “ये जड़ी खा लेना, कभी बूढा नहीं होगा, हमेशा जवान रहेगा|” राजा ने बहुत खुशी से जड़ी खा ली व चलने लगा तो बाबा ने अपना धुनें में किया गर्म चिमटा उठाया और राजा के पिछवाड़े चार पांच ठोकदी| बोला- “कहाँ जा रहा है इसे खाना इतना आसान नहीं, यहीं बैठ और धुनें में लकड़ियाँ देता रह मैं दूसरी जड़ी लेने जंगल में जा रहा हूँ तीन दिन लगेंगे| वह जड़ी खायेगा तभी ये काम करेगी वरना इस एक जड़ी से तो तेरे कलेजे में जलन हो जायेगी|” यह कहकर तपस्वी बाबा तो चला गया| राजा बैठा बैठा धुनें में लकड़ियाँ देता रहा तभी एक रमझम करती, सोलह श्रृंगार किये हुए, हाथ में खाने का एक थाल लिए सुन्दर स्त्री आई जिसका रूप देख राजा उसे देखते ही रह गया|

वह बोली- ” मैं तपस्वी बाबा की शिष्या हूँ बाबा जंगल में जड़ी लेने गए है और मुझे आपकी सेवा करने हेतु कह गए है|” राजा को खाना खिला वह रूपवती स्त्री भी रात राजा के पास रुक गयी| दूसरे दिन भी वह राजा के लिए खाना लायी और रात राजा के साथ ही रुक गयी| राजा तो उसके रूप लावण्य पर पहले ही मर मिटा था| तीसरे दिन वह स्त्री फिर आई और बोली- ‘राजा जी आज तपस्वी बाबा आयेंगे| फिर अब हमारा मिलना हो या नहीं हो आप अपनी कोई निशानी तो दे दीजिए|” राजा में उस रूपवती को अपनी अंगूठी, कटार व अपना दुसाला दे दिया| स्त्री चली गयी थोड़ी देर में बाबा जड़ी लेकर आये और राजा को देते हुए जाने की इजाजत दे दी|

इस घटना को नौ महीने बीत गए एक दिन अचानक उस काल कोठरी पर तैनात पहरेदारों ने कोठरी से रोते हुए बच्चे की आवाज सुनी| उन्होंने डरते डरते यह खबर जाकर राजा को सुनाई| राजा सुनते ही हाथ में नंगी तलवार ले दौड़ा दौड़ा आया, कोठरी के दरवाजे पर लगी ईंटे हटवाई और कोठरी में घुसा| आगे प्रधान की बेटी ने अपना बेटे को राजा का दिया दुसाला ओढा, पास में कटार रख और हाथ में राजा की अंगूठी पहनाकर सुला रखा था| राजा ने देखते ही अपनी पत्नी के ऊपर तलवार तानी और बोला- “बता, ये पुत्र कहाँ से व कैसे आया ?

“बेटे के पास जाकर पूछ लीजिए, बेटा खूद ही आपको जबाब दे देगा|” राजा ने बेटे की तरफ देखा पर उसे अपनी निशानियां याद ही नहीं और बेटा बोलता कैसे ? सो राजा ने फिर तलवार तानते हुए कहा- “बता नहीं खोपड़ी काट दूँगा|” रानी बोली- ” आपका हिया फूट गया या आँखे फूटी गयी है ? दीखता नहीं बच्चे ने अपना बाप का दुसाला ओढ़ रखा है पास में अपनी बाप की कटार रखी है और हाथ में बाप की अंगूठी पहनी है| जरा ध्यान से देखिये| राजा ने ध्यान से देखा- “ये सब तो मेरे है|” पर क्रोध में बोला- ” ले आई होगी कहीं से उठाकर|’

रानी बोली- ” ये तो हो सकता है मैं ले आई होवुं कहीं से पर पिछवाड़े पर जो गर्म गर्म चिमटे की चार पांच मारी थी वो याद है या नहीं! करनी इसे कहते है! जो कर के बताई है आपको !! इतना सुनते ही राजा बहुत शर्मिंदा हुआ| साथ ही उसे अपनी रानी पर भी बहुत गर्व हुआ| आखिर राजा उसे अपने बेटे सहित महलों में ले आया और खुशी खुशी उसके साथ राज्य करते हुए बाकी जिंदगी गुजारी|

डा.लक्ष्मीकुमारी चुण्डावत की कहानी का हिंदी अनुवाद

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