काश उन मामलों को मै ऐसे निपटाता !

काश उन मामलों को मै ऐसे निपटाता !

आज राम सिंह को कारखाने के प्रबंधक पद से सेवा मुक्त हुए पूरा महीना बीत गया लेकिन पद पर रहते जो लोग उसके आगे पीछे घुमा करते थे वे आजतक मिलने भी नहीं आये जिन कारखाना मालिकों के फायदे के लिए राम सिंह दूसरो का बुरा करने तक में नहीं चूका उन मालिकों का भी कभी कोई फोन तक राम सिंह के पास नहीं आया | घर में अकेला बैठा राम सिंह अब अतीत में कारखाने में लिए गए अपने निर्णयों का विश्लेषण करने लगा | उस हर एक मामले के द्रश्य अब राम सिंह की दिखाई देने लगे जिनमे निर्णय करते वक्त राम सिंह ने मानवीय पक्ष दरकिनार करते हुए सिर्फ कारखाने का पक्ष देखा | आज राम सिंह को अपने द्वारा किये गए गए गलत निर्णयों का वीभत्स चेहरा नजर आने से वह अन्दर तक हिल चूका है और सोचता है कि उन मामलों में मानवीय पक्ष देखकर भी तो मै कोई निर्णय कर सकता था जैसे;-

१- कारखाने में काम करने वाली एक गर्भवती महिला प्रबन्धक राम सिंह के पास गर्भावस्था अवकाश लेने आती है लेकिन राम सिंह उससे कहता कि छुट्टी नहीं मिलेगी तुम्हारी जगह काम कौन करेगा ? इसलिए मै तुम्हे नौकरी से हटा कर तुम्हारी जगह किसी और की नियुक्ति कर देता हूँ | और राम सिंह उसे नौकरी से निकल देता है | महिला राम सिंह को बुरा भला कहकर कोसती हुई , बद-दुआएं देती , रोती हुई अपने घर जाती है |

उस घटना को याद कर आज राम सिंह सोचता है काश उस मामले को मैंने कुछ इस तरह निपटाया होता –

जैसे ही वह गर्भवती महिला राम सिंह के कक्ष में गर्भावस्था अवकाश का आवेदन लेकर प्रवेश करने के साथ अभिवादन करती है | और राम सिंह से अपनी छुट्टी की बात करती है |

राम सिंह – अच्छा आप आराम से छुट्टी कीजिए और आपके साथ काम करने वाली किसी सहकर्मी को अपना कार्य समझा दीजिए उसे आपका कार्य करने के बदले कम्पनी ओवर टाइम दे देगी जिससे उसकी भी कुछ आय बढ़ जायेगी और आपके अवकाश की वजह से कारखाने का कोई काम भी नहीं अटकेगा | और कोई दिक्कत हो तो मुझे बताइगा |

महिला राम सिंह को धन्यवाद देती हुई ख़ुशी ख़ुशी अपने को लौटती है |

२- कारखाने में मशीन पर काम करने वाले बनवारी का हाथ दुर्घटनावश मशीन में फंस गया जिसे डाक्टर ने ओपरेशन कर काट दिया था आज अस्पताल से छुट्टी होने के बाद बनवारी वापस कारखाने में काम पर लौटा है लेकिन राम सिंह ने यह सोचकर कि बनवारी एक हाथ कैसे मशीन चलाएगा उसकी तो अब कार्य क्षमता कम हो चुकी सो बनवारी को अपने कक्ष में बुलाकर कहता है

राम सिंह – देख बनवारी ! अब एक हाथ से तू मशीन तो चला नहीं सकता इसलिए तू कारखाने में किस काम का ? मैंने तेरी जगह दूसरा आदमी भर्ती कर लिया और तेरा हिसाब बनाने के लिए बोल दिया इसलिए ऑफिस में बाबू के पास जा और अपना हिसाब लेकर अपने घर चलता बन |

राम सिंह की बात सुनकर बनवारी रोंर लगता है ,राम सिंह की मिन्नते करता है गिड़गिडाता कि उसके बाल बच्चे बहुत छोटे है और हाथ काटने की वजह से उसे कही और जगह काम नहीं मिलेगा इसलिए उसे नौकरी से न निकला जाए लेकिन राम सिंह पर बनवारी के रोने पीटने का कोई असर नहीं पड़ता | और बनवारी राम सिंह को बद-दुआएं देता रोता हुआ अपने घर को रवाना होता है |

आज राम सिंह उस घटना को याद करने पर अपनी गलती का अहसास होता है और वह सोचता है काश बनवारी के मामले को मैंने इस तरह निपटाया होता –

अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद बनवारी कारखाने काम पर लौटता है सबसे पहले वह प्रबन्धक राम सिंह से मिलने उसके कक्ष में प्रवेश कर राम सिंह को अभिवादन करता है |

राम सिंह – अरे आओ आओ बनवारी ! बैठो और बताओ अब तुम्हारी तबियत कैसी है | भई तुम्हारा दुर्घटना में हाथ जाता रहा इसका मुझे बहुत अफ़सोस है तुम्हारी दुर्घटना के बाद मै कारखाने में कुछ और भी ऐसे उपाय करवा रहा हूँ ताकि इस तरह की दुर्घटना रोकी जा सके और तुम्हारी तरह किसी और श्रमिक को ये सब नहीं भुगतना पड़े खैर — अब तुम मशीन पर तो काम कर नहीं पावोगे इसलिए मैंने तुम्हारे काम पर अन्य श्रमिक को लगा दिया है और तुम्हारे लायक दूसरा काम तलाश लिया जो तुम एक हाथ से भी आसानी से कर सकते है | इससे कारखाने का कार्य भी प्रभावित नहीं होगा और तुम्हे भी कोई तकलीफ नहीं होगी | अब जावो और अपना नया कार्यभार संभालो | कोई दिक्कत परेशानी हो तो बेझिझक मुझे बताना |

और बनवारी खुश होकर राम सिंह को हार्दिक धन्यवाद देता हुआ उसके कक्ष से बाहर निकल अपने नए कार्य पर ख़ुशी ख़ुशी जुट जाता है |

ऐसे ही मामलों में लिए अनेक निर्णय आज पूर्व कारखाना प्रबन्धक राम सिंह की आँखों में घूम रहे है और उनके बारे में सोच सोच कर वह बैचेन हो उठता है पर अब बैचेन होने के सिवा कर भी तो क्या सकता है आखिर वो समय तो निकल चूका जब वो मानवता के लिए कुछ कर सकता है |

12 Responses to "काश उन मामलों को मै ऐसे निपटाता !"

  1. रंजन   October 31, 2009 at 1:01 pm

    that's called management with a human face.. good lessons..

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  2. टफ लीडर और ह्यूमेन लीडर में कोई विरोधाभास नहीं है। जो ऐसा सोचते हैं कि मात्र कसाई बन कर ही काम लिया जा सकता है, समय उन्हे माफ नहीं करता।
    लेकिन आप से लीडरशिप की अपेक्षा हो और आप भेड़पना दिखायें, तब भी समय आप को माफ नहीं करता! 🙂

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  3. ललित शर्मा   October 31, 2009 at 1:18 pm

    बातन हाथी पाईये-बातन हाथी पाँव
    आपने एक अच्छे विषय को पे्श किया,
    रामसिंग प्रबंधक जरूर था लेकिन उसके पास डिप्लोमेसी नही थी
    इसलिए फ़ेल हो गया,प्रबधन मे डिप्लोमेसी अत्यावश्यक है।

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  4. RAJNISH PARIHAR   October 31, 2009 at 2:54 pm

    राम सिंह ने जो किया,वो अब सूद सहित वापिस मिलेगा!प्रकृति में देर है पर अंधेर नहीं….ये नियम हर जगह लागू होता है वो भी इमानदारी से!मैंने कितने ही ऐसे केस देखे है…

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  5. परमजीत बाली   October 31, 2009 at 4:31 pm

    बढिया पोस्ट लिखी है।ज्ञानदत्त जी की बात से सहमत।

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  6. Mishra Pankaj   October 31, 2009 at 4:35 pm

    सही कहा है आपने समय रहते चेतना चाहिए

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  7. विनोद कुमार पांडेय   October 31, 2009 at 5:03 pm

    सही बात है ऐसे ही निपटाना चाहिए परंतु राम सिंह जी के लिए अब सोचने से कुछ फ़ायदा नही क्योंकि अब तो बहुत देर हो गयी..हाँ और लोग इस बात से एक सीख ले सकते हैं…बढ़िया चर्चा..धन्यवाद

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  8. विवेक सिंह   October 31, 2009 at 5:16 pm

    प्रेरक कहानी है ।

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  9. ताऊ रामपुरिया   October 31, 2009 at 6:05 pm

    बहुत ही सटीक कहानी है. समय रहते फ़ैसले लेने का अपना महत्व होता है.

    रामराम.

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  10. राज भाटिय़ा   October 31, 2009 at 6:18 pm

    आप के इस लेख से बाकी के राम सिंह सबक सीख ले तो बहुत अच्छी बात है, बौत सुंदर बात कही आप ने इस कहानी के मध्यम से

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  11. ज्ञानदास जी का ज्ञान बढ़िया रहा।

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  12. Rajput   September 29, 2012 at 10:17 am

    अमूमन आज हर जगह ऐसा ही देखने को मिलता है . ये ठीक है की कंपनी या कारखाने को प्रोफिट होना मगर उसके लिए

    मानवीय मूल्यों को ताक पर रखना न्याय-चित नहीं है. कंपनी या कारखाना उसमे काम करने वालों से ही कंपनी या कारखाना बनता है .

    अगर उसकी नीवं का ही ख्याल नहीं रखा तो फिर कंगुरा कहाँ सुरक्षित रहेगा. इंसान की वय्व्हारिक होना बहुत जरुरी है.,

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