कछवाहों का आमेर पर आधिपत्य : कछवाहा राजवंश का प्रारम्भिक इतिहास -1

कछवाहों का आमेर पर आधिपत्य  : कछवाहा राजवंश का प्रारम्भिक इतिहास -1

पिछले से आगे…

ज्ञात इतिहास के आधार पर आमेर में सर्वप्रथम सुसावत मीणों का आधिपत्य था। आमेर के आसपास दो-चार कोस के फासले छोटी-छोटी 52 बस्तियां थी, जिनमें मीणों का राज्य था। प्रत्येक मीणा राज्य के पास अपनी गढ़िया थी। आमेर इनकी प्रधान राजधानी (केन्द्रीय शक्ति) थी।30 मीणा जागाओं की बहियों के अनुसार सुन्दरलाल के पुत्र राव भरत ने संवत 221 में आमेर पर अधिकार कर मीणा राज्य की नींव रखी और मीणा वंश की पीढ़ियों ने 872 वर्षो तक राज्य किया।

ई. सन् 1036 (वि.स. 1093) के लगभग तक दुल्हेराय ने दौसा, माँच-रामगढ़, खोह, झोटवाड़ा तथा गैटोर को अपने कब्जे में किया तथा मीणों से शांति एवं सुरक्षा स्थापित करने के लिए एक दुर्ग का निर्माण किया और इसका नाम रामगढ़ रखा। दुल्हेराय के पश्चात् उसका पुत्र कांकिलदेव गद्दी पर बैठा, जिसका नाम कुछ वंशावलियों में मेघल या मेदल भी मिलता है। इसी कांकिलदेव ने सुसावत मीणा शासक राव भक्तो से आमेर को जीतकर अपनी राजधानी बनाया।31 परन्तु कर्नल टॉड के अनुसार कांकिल के पुत्र मैदल ने आमेर जीता था, जो कि पूर्णतया गलत है। कांकिल के पश्चात् क्रमशः हणुतदेव तथा जान्हड़देव राजगद्दी पर बैठे। जान्हड़देव ने ही ढूंढ़ाड़ से मीणों का आतंक समाप्त कर कछवाहों का आमेर पर अधिकार सुदृढ़ किया। इसके बाद क्रमशः पंज्जवन देव (पृथ्वीराज तृतीय का समकालीन सामन्त एवं उसका बहनोई), मलयसी, बिंजलदेव, राजदेव, किल्हणदेव, कुंतलदेव, जुणसी व उदयकरण, नरसिंह, उदयकरण एवं चन्द्रसेन ने आमेर पर राज्य किया। राजा चन्द्रसेन की मृत्यु के बाद इनके पुत्र पृथ्वीसिंह आमेर की गद्दी पर 17 जनवरी 1503 ई. को बैठे और 1527 ई. तक शासन किया। पृथ्वीराज के समय ही 12 कोटड़ियाँ स्थापित हुई थी। इनके समय में आमेर राजवंश का महत्व बढ़ गया था। पृथ्वीराज के पूर्वज आमेर के पूर्व शासन शासन नाथमत के अनुयायी थे। पृथ्वीराज के ज्येष्ठ पुत्र के उत्तराधिकार के वंशानुगत अधिकार का उल्लंघन कर पूरणमल 20 नवम्बर 1527 को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। पूरणमल के पश्चात् 1534-1537 ई. तक क्रमशः भीम व रत्न सिंह गद्दी पर बैठे।

आन्तरिक विद्रोहों के उपरान्त 27 जून, 1548 ई. में आमेर की गद्दी पर पृथ्वीराज तृतीय के ही पुत्र भारमल बैठे। भारमल विपत्तियों से घिरा हुआ था। एक तरफ इस्लाम की तोपों से युक्त ताकत, दूसरा अजमेर की दरगाह जाने का रास्ता भी आगरा से सांगानेर होते था। अतः इसी रास्ते आततायियों का आना-जाना परेशानी उत्पन्न कर रहे थे और ये लूट-खसोट व धार्मिक स्थानों को खण्डित कर रहे थे तथा तीसरा स्वयं के राज्य में भी पूरणमल के बेटे-पोते भारमल को तंग कर सत्ताच्युत करने का षड़यंत्र कर रहे थे। भारमल ने एक-एक करके सारी समस्याओं को बुद्धिमानी से दूर किया। भारमल ने मुगल बादशाह अकबर के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर राजनैतिक दूरदर्शिता का परिचय दिया और आमेर के कछवाहा शासकों की मुगलों से मित्रता स्थापित हुयी। इससे मुगल आक्रमण से छुटकारा मिला। दूसरी तरफ मुगलों से सम्बन्ध स्थापित करके, भारमल ने आमेर के पूर्व मीणा शासकों को भी विश्वास में लेना आरम्भ किया।32

भारमल की मृत्यु के बाद उनका पुत्र भगवन्तदास 1574-1589 ई. ने आमेर की गद्दी संभाली। भगवन्तदास की मृत्यु के बाद उनका पुत्र मानसिंह 1589 ई. में आमेर के शासक बने। इनके कार्यकाल में आमेर एक महत्वपूर्ण एवं गौरवपूर्ण राज्य में रूप में विख्यात हुआ। मानसिंह ने लगभग 24 वर्ष तक राज्य किया और लगभग 55 वर्ष तक मुगल दरबार में अपनी सेवाऐं देकर मुगलों का सहयोग किया। अकबर द्वारा इन्हें 7000 मनसब व फर्जन्दें का खिताब दिया गया और अकबर के नवरत्नों में इनकी गणना की जाती थी।

क्रमशः…………….

लेखक : भारत आर्य
शोधार्थी,  इतिहास एवं संस्कृति विभाग
राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर

सन्दर्भ :
1. कर्नल टॉड, ऐनल्स एण्ड एण्टीक्वीटीज ऑफ राजस्थान, भाग – 2, पृ. 281-282
2. टी.सी. हैण्डेले, कैम्ब्रीज हिस्ट्री ऑफ इण्डिया, जिल्द 3, पृ. 534
3. यशोदा मीणा, मीणा जनजाति का इतिहास, पृ. 50-56

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