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Tuesday, May 24, 2022

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कछवाहा राजपूत राजवंश का प्रारम्भिक इतिहास – भाग -1

इतिहास मानव जीवन में नई स्फूर्ति उत्पन्न करता है, सोये हुओं को जगाता है और कायरों में वीरत्व पैदा करता है। भूली-बिसरी त्रुटियों को उजागर करके उनमें नवीनता का संचार करता है। इसी प्रकार राजस्थान का इतिहास भी चिरकाल से उज्ज्वल और गौरवमय रहा है तथा वीर प्रसूता भूमि की अस्मिता गौरवशाली इतिहास अदम्य साहस एवं शौर्य की साक्षी है तथा यह अतीत से ही वीर, उदार तथा न्यायप्रिय रही है। यहाँ वीरता की अपनी निराली परम्परायें रही हैं, जिनके पीछे उत्कृष्ट आदर्शों एवं जीवन मूल्यों की प्रेरणा रही है, जिन्होंने राजपूत जाति को एक उच्च सांस्कृतिक पीठिका पर प्रतिष्ठित कर दिया है। त्याग और उत्सर्गमूलक इन वीरोचित परम्पराओं के प्रेरक आदर्शों में मातृभूमि प्रेम, स्वतंत्रता, स्वामिभक्ति, स्वाभिमान, शरणागत-वत्सलता, वचन-निर्वाह, स्वधर्म-निष्ठा तथा नारी के शील एवं सतीत्व की रक्षा आदि प्रमुख हैं। जिनके लिए इस धरती के बेटों ने बड़े त्याग को भी तुच्छ समझा है। राजस्थान का इतिहास वस्तुतः उपर्युक्त ऐसे ही आदर्शों की रक्षार्थ उत्सर्ग होने वाले वीरों का अमिट आख्यान है।1

राजपूतों की आवासीय स्थली होने के कारण ही कर्नल टॉड ने इस प्रदेश को राजस्थान (राजपूतों का रहने का स्थान) नाम दिया। वैसे राजपूत कोई नवीन कौम नहीं बल्कि हम इन्हें अतीत के क्षत्रियों का परिमार्जित रूप कह सकते हैं। दूसरे शब्दों में ऐसे भी कहा जा सकता है कि जिन क्षत्रियों के हाथों में राजसत्ता आ गई थी अथवा जिनका सम्बन्ध शासन से जुड़ गया था, कालान्तर में वे लोग ही राजपुत्र अथवा राजपूत कहलाने लग गये थे। वर्तमान में यह वर्ग एक कौम के रूप में विख्यात है।2

स्वतंत्रता पूर्व राजस्थान में 19 रियासतें (अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली, कोटा, बूँदी, झालावाड़, टोंक, किशनगढ़, बाँसवाड़ा, डूँगरपुर, शाहपुरा, प्रतापगढ़, मेवाड़, जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, सिरोही) थी और यहाँ पर देशी राजाओं और रजवाड़ों का राज था तथा इसे राजपुताना कहा जाता था। इन्हीं रियासतों में से जयपुर भी एक अति महत्वपूर्ण रियासत थी, जो कि 1727 ई. से पूर्व आमेर के नाम से जानी जाती थी।

क्रमशः…………….

लेखक : भारत आर्य , शोधार्थी,  इतिहास एवं संस्कृति विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर

संदर्भ सूची:- संदर्भ सूची:- 1. राघवेन्द्र मनोहर सिंह, राजस्थान के रजवाड़ों का सांस्कृतिक वैभव, पृ. 1 ; 2. दामोदरलाल गर्ग, जयपुर राज्य का इतिहास, पृ. 3, 72. दामोदर लाल गर्ग, जयपुर राज्य का इतिहास, पृ. 6

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