औरत होने का अहसास

औरत होने का अहसास


बचपन से देखा है माँ को घर के कामों में पीसता हुआ

सुबह से शाम वो बिना किसी मजदूरी के मजदूरों सा काम करती थी

फिर भी खुश हमेशा खुश , उनके काम का अंतिम चरण यही सुन के समाप्त होता था

” तुम करती क्या हो दिन भर घर मे ?”

माँ ने हिंदी में मास्टर डिग्री ली थी और डाक्टरेट भी

फिर भी उनका घर में बैठना मुझे समझ नहीं आया

बस यही सब सुनते देखते फैसला किया था मैंने …

की मै कभी शादी नहीं करुँगी ,

अपनी मर्जी से जिउंगी

जो जी में आएगा वो ही करुँगी

जो पहनने का मन करेगा वो पहनूंगी

जंहा जाने का दिल करेगा वहा जाउंगी

मर्जी से जीना हे मुझे

बस जिद या फैसला कुछ भी कह लो

नहीं की शादी मैने ,घरवालो ने लाख समझाया

पर नहीं ,सब हार गए .

मै अपनी जिंदगी मै हार वो मुकाम पाती चली गई जिसकी मुझे ख्वाहिश थी

पैसा रुतबा सब कुछ ,मस्त जिंदगी थी ,न कोई रोकने वाला न कोई टोकने वाला

इसी खुमारी मै न जाने कब ३० दशक पार हो गए

माँ अभी भी मेरे पास बैठ के समझाती हे

पर मैने कह दिया की मुझे किसी का गुलाम नहीं बनना हे

आप की तरह मै किसी की गुलामी नहीं कर सकती

खूब जिया मैने जिंदगी को और ४० के पार कब चली गई पता ही नहीं चला

अब माँ भी नहीं रही

अब मेरे पास भी कुछ करने को नहीं

न जाने क्या बाकि रह गया कि सब कुछ बेमानी लगता है

कुछ इसे अहसास जो मै नहीं जी पाई
जैसे कि :-

माथे से सरकते पल्लू को सँभालने का अहसास

उनसे रूठने और उनके मनाने के अंदाज का अहसास

उनके घर देर से लौटने पर होने वाली बेचेनी का अहसास

व्रत त्यौहार पर श्रंगार का अहसास

प्रसव पीड़ा का अहसास

रातो को गिले बिस्तर मे सोने का अहसास

नन्हे कदमो का मेरे आँगन मे डगमगाने का अहसास

किशोर होते कदमो के फिसलने के डर का अहसास

बच्चो की शिकायत आने पे झुकने का अहसास ,और उनके कुछ पाने पे अकड़ने का अहसास

इसे सजे घर में बिखरे खिलोनो का अहसास

इस बेशकीमती फर्नीचर के पीछे छुपे नन्हे कदमो का अहसास

सब कुछ तो छुट गया ……..फिर क्या जिया मैने ?

सबसे बड़ा तो एक औरत होने का अहसास ही खो दिया मैने

ओ माँ अब पता चला तुम कितनी महंगी मजदुर थी
कौन देता तुम्हे मजदूरी ?

जिसका कोई मोल नहीं तो कोई केसे चुकाता तुम्हारा मोल

तुम्हारी वो मुस्कुराहट
ओ माँ अब अहसास हुआ तुम क्यों मुस्कुरा लेती थी

काश मैने तुम्हारी बात मान ली होती 🙁

केशर क्यारी….उषा राठौड़

16 Responses to "औरत होने का अहसास"

  1. Udan Tashtari   June 29, 2011 at 10:04 pm

    बहुत भावनात्मक….

    Reply
  2. Ratan Singh Shekhawat   June 30, 2011 at 1:28 am

    आपने औरत होने के अहसास की भावनात्मक प्रस्तुती के साथ ही पारिवारिक संस्था के महत्व को बखूबी बयान किया है |

    Reply
  3. मनोज कुमार   June 30, 2011 at 2:58 am

    मन के अहसासों की सुंदर भावाभिव्यक्ति।

    Reply
  4. आज आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है …..

    बटुए में , सपनों की रानी …आज के कुछ खास चिट्ठे …आपकी नज़र .
    ____________________________________

    Reply
  5. उषा जी ,

    अंतिम पंक्तियों ने इस रचना को बहुत खास बना दिया है ..

    ओ माँ अब पता चला तुम कितनी महंगी मजदुर थी
    कौन देता तुम्हे मजदूरी ?

    जिसका कोई मोल नहीं तो कोई केसे चुकाता तुम्हारा मोल

    तुम्हारी वो मुस्कुराहट
    ओ माँ अब अहसास हुआ तुम क्यों मुस्कुरा लेती थी

    काश मैने तुम्हारी बात मान ली होती 🙁

    बहुत गहन भावाभिव्यक्ति

    Reply
  6. upendra shukla   June 30, 2011 at 9:58 am

    bahut sundar abhivyakti
    "samrat bundelkhand"

    Reply
  7. प्रवीण पाण्डेय   June 30, 2011 at 1:47 pm

    सच है, यह अनुभव एकाकी है।

    Reply
  8. नरेश सिह राठौड़   June 30, 2011 at 2:15 pm

    आज की भागदौड भरी जिंदगी का एक पहलू ये भी है |

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  9. सुशील बाकलीवाल   June 30, 2011 at 2:27 pm

    अब पछताए होत क्या…?

    Reply
  10. aapko pahli baar padha aur bahut acchha laga apko padhna.

    vo kehte hain na purush aur nari me yahi fark hota hai. purush kitna bhi nari ki tarah mahaan banNe ki koshish kare nahi ban sakta….nari ki tarah vo mamta,kshama,karuna,daya,komalta aur sehensheelta kabhi nahi laa sakta…isiliye chaahe aaj hamara samaj purush pradhan samaj hai lekin nari ki jo mehetta hai vo apni jagah hamesha rahi hai aur rahegi.

    Reply
  11. डॉ. मनोज मिश्र   June 30, 2011 at 4:03 pm

    बेहतरीन अभिव्यक्ति.आभार.

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  12. राज भाटिय़ा   June 30, 2011 at 6:42 pm

    वाह काश उन बच्चियो को समय से यह बात समझ मे आ जाये, वो जिसे गुलामी समझती हे, वो गुलामी नही एक प्यार होता हे……
    बहुत खुब सुरत लगी आप की यह भाव पुर्ण रचना, बहुत अलग हट के

    Reply
  13. Uncle   July 1, 2011 at 1:28 am

    बेहतरीन अभिव्यक्ति

    Reply
  14. sandhya   July 1, 2011 at 3:44 am

    उषा जी बहुत दिनों बाद आप मिली पर जब भी मिलती हैं सारे शिकवा शिकायत धरी की धरी रह जाती हैं मुझे भी अपने से ऐसी ही कुछ शिकायत थी पर अब तो आनंद आ गया . आप जल्दी जल्दी मिला कीजिये . धन्यवाद

    Reply
  15. SULTAN RATHORE " JASRASAR"   July 4, 2011 at 11:22 am

    aaj ki nai phidi ke ek bahut kathin parsan ka uttar aapne badi sarta se de diya. jo rasta chaho chun sakte ho jo marji ho chun lo.

    thanks .
    sultan singh jasrasar

    Reply
  16. bharat   September 1, 2012 at 6:31 pm

    …..मन को कचोटता हुआ अहसास….उम्दा लेखनी…

    Reply

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