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Wednesday, June 29, 2022

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औरत होने का अहसास


बचपन से देखा है माँ को घर के कामों में पीसता हुआ

सुबह से शाम वो बिना किसी मजदूरी के मजदूरों सा काम करती थी

फिर भी खुश हमेशा खुश , उनके काम का अंतिम चरण यही सुन के समाप्त होता था

” तुम करती क्या हो दिन भर घर मे ?”

माँ ने हिंदी में मास्टर डिग्री ली थी और डाक्टरेट भी

फिर भी उनका घर में बैठना मुझे समझ नहीं आया

बस यही सब सुनते देखते फैसला किया था मैंने …

की मै कभी शादी नहीं करुँगी ,

अपनी मर्जी से जिउंगी

जो जी में आएगा वो ही करुँगी

जो पहनने का मन करेगा वो पहनूंगी

जंहा जाने का दिल करेगा वहा जाउंगी

मर्जी से जीना हे मुझे

बस जिद या फैसला कुछ भी कह लो

नहीं की शादी मैने ,घरवालो ने लाख समझाया

पर नहीं ,सब हार गए .

मै अपनी जिंदगी मै हार वो मुकाम पाती चली गई जिसकी मुझे ख्वाहिश थी

पैसा रुतबा सब कुछ ,मस्त जिंदगी थी ,न कोई रोकने वाला न कोई टोकने वाला

इसी खुमारी मै न जाने कब ३० दशक पार हो गए

माँ अभी भी मेरे पास बैठ के समझाती हे

पर मैने कह दिया की मुझे किसी का गुलाम नहीं बनना हे

आप की तरह मै किसी की गुलामी नहीं कर सकती

खूब जिया मैने जिंदगी को और ४० के पार कब चली गई पता ही नहीं चला

अब माँ भी नहीं रही

अब मेरे पास भी कुछ करने को नहीं

न जाने क्या बाकि रह गया कि सब कुछ बेमानी लगता है

कुछ इसे अहसास जो मै नहीं जी पाई
जैसे कि :-

माथे से सरकते पल्लू को सँभालने का अहसास

उनसे रूठने और उनके मनाने के अंदाज का अहसास

उनके घर देर से लौटने पर होने वाली बेचेनी का अहसास

व्रत त्यौहार पर श्रंगार का अहसास

प्रसव पीड़ा का अहसास

रातो को गिले बिस्तर मे सोने का अहसास

नन्हे कदमो का मेरे आँगन मे डगमगाने का अहसास

किशोर होते कदमो के फिसलने के डर का अहसास

बच्चो की शिकायत आने पे झुकने का अहसास ,और उनके कुछ पाने पे अकड़ने का अहसास

इसे सजे घर में बिखरे खिलोनो का अहसास

इस बेशकीमती फर्नीचर के पीछे छुपे नन्हे कदमो का अहसास

सब कुछ तो छुट गया ……..फिर क्या जिया मैने ?

सबसे बड़ा तो एक औरत होने का अहसास ही खो दिया मैने

ओ माँ अब पता चला तुम कितनी महंगी मजदुर थी
कौन देता तुम्हे मजदूरी ?

जिसका कोई मोल नहीं तो कोई केसे चुकाता तुम्हारा मोल

तुम्हारी वो मुस्कुराहट
ओ माँ अब अहसास हुआ तुम क्यों मुस्कुरा लेती थी

काश मैने तुम्हारी बात मान ली होती 🙁

केशर क्यारी….उषा राठौड़

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16 COMMENTS

  1. आपने औरत होने के अहसास की भावनात्मक प्रस्तुती के साथ ही पारिवारिक संस्था के महत्व को बखूबी बयान किया है |

  2. उषा जी ,

    अंतिम पंक्तियों ने इस रचना को बहुत खास बना दिया है ..

    ओ माँ अब पता चला तुम कितनी महंगी मजदुर थी
    कौन देता तुम्हे मजदूरी ?

    जिसका कोई मोल नहीं तो कोई केसे चुकाता तुम्हारा मोल

    तुम्हारी वो मुस्कुराहट
    ओ माँ अब अहसास हुआ तुम क्यों मुस्कुरा लेती थी

    काश मैने तुम्हारी बात मान ली होती 🙁

    बहुत गहन भावाभिव्यक्ति

  3. aapko pahli baar padha aur bahut acchha laga apko padhna.

    vo kehte hain na purush aur nari me yahi fark hota hai. purush kitna bhi nari ki tarah mahaan banNe ki koshish kare nahi ban sakta….nari ki tarah vo mamta,kshama,karuna,daya,komalta aur sehensheelta kabhi nahi laa sakta…isiliye chaahe aaj hamara samaj purush pradhan samaj hai lekin nari ki jo mehetta hai vo apni jagah hamesha rahi hai aur rahegi.

  4. वाह काश उन बच्चियो को समय से यह बात समझ मे आ जाये, वो जिसे गुलामी समझती हे, वो गुलामी नही एक प्यार होता हे……
    बहुत खुब सुरत लगी आप की यह भाव पुर्ण रचना, बहुत अलग हट के

  5. उषा जी बहुत दिनों बाद आप मिली पर जब भी मिलती हैं सारे शिकवा शिकायत धरी की धरी रह जाती हैं मुझे भी अपने से ऐसी ही कुछ शिकायत थी पर अब तो आनंद आ गया . आप जल्दी जल्दी मिला कीजिये . धन्यवाद

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