औरंगजेब की तलवार जो न कर सकी …

औरंगजेब की तलवार जो न कर सकी …

भारत के अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज को परास्त कर राजपूत शासन का पतन करने के समय से ही राजपूत शासकों का मुस्लिम शासकों के साथ संघर्ष अंग्रेजों के आने तक निर्बाध रूप से चलता रहा| मुगलों से संधियाँ करने के बाद भी विभिन्न राजपूत राजा अपने स्वाभिमान की रक्षा व स्वतंत्रता के लिए समय समय पर अपनी अपनी अल्प शक्तियों के सहारे ही संघर्ष करते रहे| राजस्थान में विभिन्न राजपूत राज्यों में हुए जौहर और शाका इसके प्रमाण है कि मुगलों से संधियाँ होने के बावजूद राजपूत शासकों ने अपने स्वाभिमान और सम्मान से कभी समझौता नहीं किया था| यदि किया होता तो ये जौहर शाके इतिहास में दर्ज नहीं होते|

हिन्दू राजाओं व मुस्लिम शासकों के मध्य आपसी लड़ाइयों की एक लम्बी खुनी श्रंखला के बाद भी हिन्दू-मुस्लिमों के बीच साम्प्रदायिक आधार पर कभी कोई झगड़ा नहीं हुआ, न कोई साम्प्रदायिक आधार पर दोनों समुदायों के बीच मन-मुटाव या विद्वेष ही था| जितने युद्ध हुए वे सभी साम्राज्यवादी नीति, आपसी राजनैतिक मामलों व झगड़ों के चलते हुए| यही कारण था कि हल्दी घाटी के युद्ध में अकबर के साथ युद्ध में महाराणा प्रताप की हिन्दू सेना का सेनापति हाकिम खान सूर जो एक अफगानी मुस्लिम पठान था तो मुस्लिम बादशाह अकबर की सेना का संचालन एक हिन्दू राजकुमार मानसिंह के हाथ में था|

यही नहीं और भी ऐसे बहुत से उदाहरण है जहाँ हिन्दू राजाओं और मुस्लिम शासकों के बीच झगड़े का कारण मुस्लिम व्यक्तियों को हिन्दू राजाओं द्वारा शरण देकर उनकी रक्षा करना था| इतिहास में ऐसे कई युद्धों का वर्णन है जो सिर्फ मुस्लिमों को शरण देने की बात पर हुए| जिनके कुछ उदाहरण निम्न है-

१- भारत में मुस्लिम सत्ता स्थापित करने वाले शहाबुद्दीन गौरी के आक्रमण का कारण ही इतिहास में खोजेंगे तो पायेंगे गौरी की धन लिप्सा के साथ साथ इन युद्धों का कारण पृथ्वीराज द्वारा गौरी के एक विद्रोही मुस्लिम को शरण देना था| पंडित चंद्रशेखर पाठक की “पृथ्वीराज” नामक इतिहास पुस्तक के अनुसार – पृथ्वीराज ने शिकार खेलने के लिए नागौर के पास वन में डेरा डाल रखा था तब वहां गौरी का एक चचेरा भाई “मीर हुसैन” चित्ररेखा नाम की एक वेश्या के साथ आया| यह वेश्या सुन्दरता के साथ अति गुणवती थी, वीणा बजाने व गायन में वह पारंगत थी| गौरी ने उसकी सुंदरता के अलावा उसके गुण नहीं देखे पर मीर हुसैन उसे उसके गुणों के चलते चाहने लगा अत: वह उसे साथ लेकर गजनी से भाग आया| नागौर के पास शिकार खेल रहे पृथ्वीराज से जब मीर हुसैन में सब कुछ बता शरण मांगी तब उस उदारमना हिन्दू सम्राट ने अपने सामंतों से सलाह मशविरा किया और शरणागत की रक्षा का क्षत्रिय धर्म निभाते हुए उसे शरण तो दी ही साथ ही उसे अपने दरबार में अपने दाहिनी और बैठाने का सम्मान भी बख्शा, यही नहीं पृथ्वीराज ने मीर हुसैन को हांसी व हिसार के परगने भी जागीर में दिये|

इन सब की सूचना धर्मयान कायस्थ और माधोभट्ट के जरिये गौरी तक पहुंची तब गौरी ने संदेशवाहक भेजकर मीर हुसैन व चित्ररेखा को उनके हवाले करने का संदेश भेजा जिसे पृथ्वीराज व उसके सामंतों में शरणागत की रक्षा का अपना धर्म समझते हुए ठुकरा दिया|
चंदरबरदाई के अनुसार पृथ्वीराज- गौरी के आपसी बैर का मुख्य कारण यही था|

२- रणथंभोर के इतिहास प्रसिद्ध वीर योद्धा हम्मीरदेव चौहान व अल्लाउद्दीन खिलजी के मध्य जो युद्ध युवा उसके पीछे भी हम्मीरदेव द्वारा अल्लाउद्दीन के बागी मुस्लिम सेनानायक मुहम्मद शाह को शरण देना मुख्य कारण था| हम्मीरदेव द्वारा अल्लाउद्दीन की सेना के बागी मुहम्मद शाह को शरण देने के बाद अल्लाउद्दीन ने हम्मीरदेव के पास दूत भेजकर अपने इन बागियों को उसे सुपुर्द करने का अनुरोध किया था, जिसे शरणागत की रक्षा करने का क्षत्रिय का कर्तव्य व धर्म समझ हम्मीरदेव ने ठुकरा दिया| नतीजा इतिहास में आपके सामने है एक मुस्लिम शरणागत की जान बचाने हेतु हम्मीरदेव को अपना राज्य, अपना परिवार, अपनी जान की कीमत देकर चुकाना पड़ा| यदि उस काल में उसके मन में थोड़ा सा भी सांप्रदायिक विद्वेष होता तो शायद वह एक मुस्लिम के लिए इतनी बड़ी कीमत नहीं चुकाता|

३- मेड़ता का शासक जयमल मेड़तिया जिसकी वीरता इतिहास में सवर्णों अक्षरों में अंकित है, एक ऐसा वीर जिसने युद्ध में शाही सेना के खिलाफ अकबर के मानस पटल पर अपनी वीरता की ऐसी अमिट छाप छोड़ी कि उसकी वीरता से प्रभावित हो अकबर ने अपने उस विरोधी को सम्मान देने हेतु हाथी पर उसकी बहुत बड़ी प्रतिमा बनवाई थी| जिसका कई विदेशी पर्यटकों ने औरंगजेब के समय तक देखने का अपनी पुस्तकों में जिक्र किया है|

चितौड़ पर अकबर के इस आक्रमण का कारण भी अकबर के एक बागी मुस्लिम सेनापति सर्फुद्दीन को जयमल द्वारा मेड़ता में शरण देना था| जयमल व जोधपुर के शक्तिशाली शासक राव मालदेव के बीच वैमनस्य था, हालाँकि जयमल ने अपनी और से संधि करने की भरपूर कोशिशें की पर उस से दस गुना बड़ी सेना रखने वाले मालदेव ने उसकी एक नहीं सुनी| और मेड़ता पर कई बार आक्रमण कर जयमल से मेड़ता छीन लिया था| उसके बाद जयमल को अकबर की सहायता से ही मेड़ता का राज्य वापस मिला| अकबर ने जब जयमल की सहायतार्थ जो सेना भेजी उसका सेनापति सर्फुद्दीन था| मेड़ता वापस मिलने के बाद जयमल के सर्फुद्दीन से व्यक्तिगत संबध बन गए अत: जब सर्फुद्दीन ने अकबर से बगावत की तब जयमल में उसे शरण दे दी है व अकबर की चेतावनी के बाद भी उसने अपनी शरण में आये सर्फुद्दीन को वापस नहीं सौंपा|

नतीजा अकबर की विशाल सेना ने मेड़ता पर आक्रमण कर जयमल को निकाल दिया| मेड़ता छूटने के बाद जयमल चितौड़ चले गए जहाँ मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह ने उन्हें बदनोर की जागीर देकर सम्मान पूर्वक अपने पास रख लिया जो अकबर को बुरा लगा और जयमल को सम्मान देने की सजा का दंड देने अकबर ने खुद सेना ले चितौड़ पर आक्रमण कर दिया| इस युद्ध में जयमल अकबर की सेना से वीरतापूर्वक लड़ता हुआ मारा गया और अकबर की चितौड़ पर विजय हुई| यही नहीं नागौर से सर्फुद्दीन को सुरक्षित मेड़ता लाने के प्रयासों में जयमल के पुत्र कुंवर सार्दुल को रास्ते में शाही सेना की टुकड़ी से भिडंत होने पर अपनी जान गंवानी पड़ी थी|

इस तरह एक मुस्लिम को शरण देने के चलते जयमल को मेड़ता के राज्य सहित अपनी प्राणों की आहुति देनी पड़ी और चितौड़ के महाराणा उदयसिंह ने चितौड़ का राज्य खोया वहीँ चितौड़ की जनता को कत्लेआम का सामना करना पड़ा| सिर्फ एक मुस्लिम शरणागत की रक्षा के लिए|

उपरोक्त उदाहरणों से साफ़ है कि उस काल में भले ही मुग़ल शासकों ने हिन्दुओं के साथ कितना भी धार्मिक भेदभाव किया हो फिर भी दोनों ही तरफ के लोगों में धार्मिक तौर पर कोई मतभेद व विद्वेष नहीं था| इतिहासकार डा.रामप्रसाद दाधीच अपनी पुस्तक “महाराजा मानसिंह (जोधपुर) व्यक्तित्व एवं कृतित्व में लिखते है –“ साम्प्रदायिकता की दृष्टि से समाज में शांति व्याप्त थी| हिन्दू-मुसलमानों में कोई प्रत्यक्ष संघर्ष नहीं था| जातीय दृष्टि से भी यों तो शांति ही थी किन्तु राज्य सत्ता के मोह के कारण मारवाड़ में भंडारी, सिंघवी, मेहता, कायस्थ, ब्राह्मण आदि में परस्पर ईर्ष्या और द्वेष का तनाव रहता था|” लेखक के अनुसार साफ़ जाहिर है कि मुस्लिम व राजपूत शासकों के बीच संघर्ष के बावजूद आम जनता के दोनों वर्गों में साम्प्रदायिक आधार पर कोई वैमनस्य नहीं था|

औरंगजेब जैसे धर्मांध शासक की तलवार जो नहीं कर सकी वह हमारे देश की आजादी के समय धार्मिक आधार पर देश के बंटवारे व उसके बाद छद्म धर्मनिरपेक्ष राजनेताओं ने वोट बैंक बनाने के चक्कर में बिना तलवार के ही कर दिखाया|
जिसे दोनों धर्मों में मौजूद कट्टरपंथी पंडावादी ताकतें अपने अपने स्वार्थों के चलते आपसी अविश्वास की खाई को चोड़ा कर बढाने में लगी है, जो निश्चित ही चिंतनीय और देश की एकता, अखंडता के लिए घातक है|

3 Responses to "औरंगजेब की तलवार जो न कर सकी …"

  1. Rawatsinh Chauhan   November 13, 2013 at 12:46 pm

    khub khub dhanyavad aapka bahut sundar lekh he

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  2. Gajendra singh Shekhawat   November 13, 2013 at 2:36 pm

    आज के परिपेक्ष में बिलकुल सटीक निशाना लगाया है लेख के माध्यम से । निश्चित ही साम्प्रदायिकता ,क्षेत्रवाद ,जातिवाद को छदम धर्मनिरपेक्ष राजनेताओं ने बिना तलवार के ही कर दिखाया

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  3. ताऊ रामपुरिया   November 14, 2013 at 9:16 am

    बहुत सामयिक लगा आलेख.

    रामराम.

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