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Tuesday, June 28, 2022

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ऐसे फैलती है इतिहास संबंधी भ्रांतियां

वर्ष 1895, पंजाब में जन्में दीवान जरमनी दास कपूरथला और पटियाला रियासतों में लगभग 50 वर्ष तक मिनिस्टर व दीवान पद पर रहे| इस पद पर रहते हुए जरमनी दास इन रियासतों की रानियों व महाराजाओं के प्रेम और रोमांस के निजी देश-विदेश के दौरों में साथ रहे और उनकी रंगीन जिन्दगी को उन्होंने करीब से देखा| इन पूर्व रियासतों के रनिवासों के अन्तरंग तथा गुप्त से गुप्त रहस्यों को उन्होंने अपनी निजी जानकारी तथा अनुभवों के आधार पर कलम बद्ध कर “महारानी” नामक पुस्तक लिखी, जिसे हिंदी पाकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित किया गया है| पुस्तक में लेखक ने महाराजाओं के भोग-विलासपूर्ण जिन्दगी के किस्सों के साथ ही अपने पति महाराजाओं द्वारा अवहेलित महारानियों द्वारा अपनी यौन-पिपासा शांत करने के लिए किये जाने वाले उपायों का रोचक चित्रण किया है|
जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है पुस्तक में लिखी कहानियां लेखक ने अपनी निजी जानकारी व अनुभवों के आधार पर लिखी है जिनको उन्होंने अपनी आँखों से देखा है या उन घटनाओं में वे खुद सांझेदार रहे है साथ ही उन महारानियों या महाराजाओं के भोग-विलास के लिए उन्होंने इंतजाम किये है, सो उन्हें किसी भी तरह से गलत व झूंठ ठहराना कतई उचित नहीं है, उनके लिखे तथ्यों पर सिर्फ उन्हीं लोगों को हक़ है जिनके बारे में लेखक ने इस पुस्तक में लिखा है|

पर इसी पुस्तक के पृष्ठ स. १३६ पर राजस्थान की रानियों के उच्च चरित्र व ऊँचे नैतिक मूल्यों व ऊँची भावनाओं की तारीफ़ करते हुए “सती तथा जौहर” प्रकरण पर चर्चा करते हुए जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह का बीच युद्ध से लौटने पर उनकी रानी द्वारा किले के दरवाजे नहीं खोलने की घटना का जिक्र किया| ऐतिहासिक तौर पर उन्होंने इस घटना का जिक्र करके कोई गलती नहीं की पर विद्वान लेखक ने इस घटना को लिखते हुए ऐतिहासिक तथ्यों के साथ सरासर अन्याय कर डाला| उन्होंने लिखा –

“महाराजा जसवंतसिंह राठौर अपने तीस हजार राजपूत वीरों को लेकर फ़्रांसिसी सेनाओं के साथ युद्ध करने गया था| यद्यपि राजपूतों ने पूरी-पूरी बहादुरी दिखाई और जहाँ तक उनका वश चला, वे लड़े भी परन्तु आखिर में हुआ यह कि शत्रु-सेनाओं ने हर और से घेरा डाल लिया| इस घेराव से बचने के लिए महाराजा जसवंतसिंह राठौर अपने बचे बीस हजार राजपूतों को लेकर सूर्य निकलने से पहले ही अपनी राजधानी वापस पहुँच गया| महाराजा की पत्नी उदयपुर के महाराजा राणा की पुत्री थी| जब उसने देखा कि महाराजा युद्ध-क्षेत्र से पीठ दिखाकर लौटा है, तो उसने आदेश दे दिया कि- महल के द्वार बंद कर दिए जाएं|
उन्हीं दिनों बर्नियर नामक फ़्रांसिसी यात्री-लेखक भी वहां मौजूद थे| बर्नियर के कथनानुसार महारानी ने महल के द्वार बंद करने का आदेश जिस क्रोध में भरकर दिया था, उसका वर्णन करना कठिन है| महारानी के चेहरे पर जो भाव उस वक्त व्यक्त हो रहे थे उसे देखकर बर्नियर को निश्चित रूप से यही लगा होगा जो उसने लिखा :”महाराणा राणा की पुत्री अपने पति महाराजा जसवंतसिंह को युद्ध हारकर लौटते देखना भी नहीं चाहती थी, क्योंकि वह समझती थी कि ऐसा व्यक्ति न तो उसका पति होने के योग्य है और न ही राणा का दामाद होने के|”

विद्वान लेखक ने इस घटना को जिस तरह से उस काल की राजपूत वीरांगनाओं के नैतिक और वीरोचित मूल्यों को दर्शाने हेतु इस घटना का जिक्र किया उस पर उसकी मंशा पर किसी भी तरह का शक नहीं किया जा सकता| उसकी भावनाएं एक तरह से इन वीरांगनाओं को सच्ची श्रद्धांजली ही है पर लेखक ने इस घटना में जो ऐतिहासिक तथ्य दिए वे बिल्कुल कपोल कल्पित है| सही ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार उपरोक्त घटना इस प्रकार घटी है :-

“महाराज जसवंत सिंह जिस तरह से वीर पुरूष थे ठीक उसी तरह उनकी हाड़ी रानी जो बूंदी के शासक शत्रुशाल हाड़ा की पुत्री थी भी अपनी आन-बाण की पक्की थी | १६५७ ई. में शाहजहाँ के बीमार पड़ने पर उसके पुत्रों ने दिल्ली की बादशाहत के लिए विद्रोह कर दिया अतः उनमे एक पुत्र औरंगजेब का विद्रोह दबाने हेतु शाजहाँ ने जसवंत सिंह को मुग़ल सेनापति कासिम खां सहित भेजा | उज्जेन से १५ मील दूर धनपत के मैदान में भयंकर युद्ध हुआ लेकिन धूर्त और कूटनीति में माहिर औरंगजेब की कूटनीति के चलते मुग़ल सेना के सेनापति कासिम खां सहित १५ अन्य मुग़ल अमीर भी औरंगजेब से मिल गए | अतः राजपूत सरदारों ने शाही सेना के मुस्लिम अफसरों के औरंगजेब से मिलने व मराठा सैनिको के भी भाग जाने के मध्य नजर युद्ध की भयंकरता व परिस्थितियों को देखकर ज्यादा घायल हो चुके महाराज जसवंत सिंह जी को न चाहते हुए भी जबरजस्ती घोडे पर बिठा ६०० राजपूत सैनिकों के साथ जोधपुर रवाना कर दिया और उनके स्थान पर रतलाम नरेश रतन सिंह को अपना नायक नियुक्त कर औरंगजेब के साथ युद्ध कर सभी ने वीर गति प्राप्त की |इस युद्ध में औरग्जेब की विजय हुयी |

महाराजा जसवंत सिंह जी के जोधपुर पहुँचने की ख़बर जब किलेदारों ने महारानी जसवंतदे को दे महाराज के स्वागत की तैयारियों का अनुरोध किया लेकिन महारानी ने किलेदारों को किले के दरवाजे बंद करने के आदेश दे जसवंत सिंह को कहला भेजा कि युद्ध से हारकर जीवित आए राजा के लिए किले में कोई जगह नही होती साथ अपनी सास राजमाता से कहा कि आपके पुत्र ने यदि युद्ध में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त किया होता तो मुझे गर्व होता और में अपने आप को धन्य समझती | लेकिन आपके पुत्र ने तो पुरे राठौड़ वंश के साथ-साथ मेरे हाड़ा वंश को भी कलंकित कर दिया | आख़िर महाराजा द्वारा रानी को विश्वास दिलाने के बाद कि मै युद्ध से कायर की तरह भाग कर नही आया बल्कि मै तो सैन्य-संसाधन जुटाने आया हूँ तब रानी ने किले के दरवाजे खुलवाये | लेकिन तब भी रानी ने महाराजा को चाँदी के बर्तनों की बजाय लकड़ी के बर्तनों में खाना परोसा और महाराजा द्वारा कारण पूछने पर रानी ने व्यंग्य किया कि – कहीं बर्तनों के टकराने की आवाज को आप तलवारों की खनखनाहट समझ डर न जाए इसलिए आपको लकड़ी के बर्तनों में खाना परोसा गया है | रानी के आन-बान युक्त व्यंग्य बाण रूपी शब्द सुनकर महाराज को अपनी रानी पर बड़ा गर्व हुआ|”

इस तरह सही ऐतिहासिक तथ्यों को देखा जाय तो लेखक ने पूरी घटना के ऐतिहासिक तथ्यों को कपोलकल्पित बना लिखा डाला क्योंकि महाराजा जसवंतसिंह का युद्ध फ़्रांसिसी सेना से नहीं औरंगजेब के साथ हुआ था और यह युद्ध उज्जेन के पास हुआ था जहाँ से रातों रात जोधपुर पहुंचना मुनासिब नहीं था| लेखक ने लिखा बीस हजार सैनिको के साथ जसवंतसिंह वापस आये जबकि इतिहासकारों के अनुसार सिर्फ ६०० सैनिक युद्ध में बचे थे| जिस रानी को राणा की पुत्री लिखा गया वह बूंदी के शासक शत्रुशाल हाड़ा की पुत्री थी जिसका नाम जसवंतदे था|

दीवान जरमनी दास की तरह ही बहुत से लेखक बिना किसी दुर्भावना के पर बिना सही ऐतिहासिक तथ्य जाने व शोध किये गलत तथ्यों को लेकर लिख देते है और फिर इनका लिखा पढ़ लोग आगे उद्धरण देते लिखते रहते है जब तीन चार बार कोई झूंठ लिख दिया जाता है तब लोग उसे ही सच्च मनाने लग जाते है जैसे जोधा-अकबर मामले में ऐसे किसी लेखक की गलत जानकारी पढ़ मुगले आजम, अनारकली फिल्म बन गयी अब फिल्मकारों को सही तथ्य बताने के बावजूद वे यह जानते हुए कि वे जो कर रहे है वह गलत है पर जो नाम मुगले आजम व अनारकली में प्रिसद्ध हो गया उसे छोड़ना नहीं चाहते और इस तरह ऐसे चलताऊ लेखकों के कारण इतिहास विकृत हो जाता है, और तरह तरह की ऐतिहासिक भ्रांतियां फैलती है|
जोधा-अकबर सीरियल पर बालाजी टेलीफिल्म्स के साथ चर्चा में अभिनेता जितेन्द्र के साथ आये उसके स्क्रिप्ट राईटर ड़ा. बोधित्सव ने कुछ ऐसे ही टुच्चे लेखकों की मुगले आजम और अनारकली फिल्म आने के बाद उसने प्रेरित होकर लिखी पुस्तकें दिखाते हुए कहा कि- उसने तो इन पुस्तकों के आधार पर कहानी लिखी है|

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4 COMMENTS

  1. 🙂 जिसका जैसा मन किया , कहानी बना दी और छाप दी। बहुत सही विवेचना की आपने ।

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