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Monday, May 23, 2022

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एक स्त्री की मान रक्षा के लिए, इस योद्धा ने किये थे ग्यारह युद्ध

क्या आप सोच सकते है कि कोई शासक किसी स्त्री की मान रक्षा के लिए एक नहीं ग्यारह युद्ध कर सकता है| यही नहीं ये युद्ध भी उस योद्धा को अपने निकट रिश्तेदारों से करने पड़े और आखिर उस योद्धा को अपने प्राणों का बलिदान देना पड़ा| जी हाँ ! बात कर रहे है राव शेखाजी की| राव शेखाजी ने ही एक स्त्री की मान रक्षा के लिए अपने ही निकट सम्बन्धियों से ११ लड़ाईयां लड़ी और अपने प्राणों का बलिदान दिया| इतिहास में दर्ज यह कहानी कुछ इस प्रकार है-

Shekhawati और Shekhawat वंश के प्रवर्तक महाराव शेखाजी अपने सहयोगियों के साथ अपनी गादी पर बैठे थे कि उनके दरबार में एक विधवा स्त्री ने प्रवेश किया , विधवा ने अपनी ओढ़नी के पल्लू में थोडी सी मिट्टी बाँध रखी थी जिसे उसने आते ही महाराव शेखा जी के चरणों में डाल कर शेखाजी के ही निकट सम्बन्धी झुन्थर के गौड़ राजपूतों Gaur Rajputs द्वारा उस पर किया गया जुल्म व उनके हाथों अपने पति के मारे जाने की मार्मिक कहानी सुना उन उद्दंड गौडों को सजा देकर अपने सम्मान की रक्षा करने की अपील की| झुंथर शेखावाटी के दांता ठिकाने से ६ मील पुर्वोतरी कोण में था| वहां का शासक कोलवराज गौड़ बड़ा घमंडी, उद्दंड और राहबेधी राजपूत था वह अपने नगर के समीप ही एक तालाब खुदवा रहा था जिसका नाम कोलालाब तालाब रखा गया था| कोलवराज गौड़ ने तालाब के खुदाई कार्य को गति देने के लिए नियम बना रखा था कि तालाब के पास के रास्ते से जो भी राहगीर गुजरेगा उसे चार टोकरी मिट्टी खोदकर निकालनी होगी| एक बार एक कछवाह राजपूत अपनी ससुराल से अपनी नव वधु को लेकर तालाब के पास से गुजर रहा था| कोलवराज गौड़ के आदमियों ने उसे भी मिट्टी निकालने हेतु बाध्य किया, जिस पर उसने अपनी व अपनी पत्नी के हिस्से की चार-चार टोकरियाँ मिट्टी खोद कर सहर्ष निकाल दी| लेकिन कोलवराज गौड़ के आदमियों ने उसकी पत्नी से भी जबरदस्ती मिट्टी निकलवाना चाहा और निकट आकर बहली (डोली) का पर्दा उठाने लगे| यह सब देख उस राजपूत का खून खौल उठा और उसने अपनी पत्नी की और बढ़ने वालों का सिर काट दिया व शेष गौडों से वीरता पूर्वक लड़ता हुआ खुद भी मारा गया| उसकी विधवा हो गई पत्नी ने अपने बहलवानो की सहायता से अपने पति का वहीं कोलोलाब तालाब पर दाह संस्कार कर तालाब की कुछ मिट्टी अपनी ओढ़नी के पल्लू से बाँध महाराव शेखा जी के पास उसका अपमान करने व पति की हत्या करने वाले दुष्टो को सजा दिलवाने के लिए चली आई |

झुंथर के गौड़ शेखाजी के निकट रिश्तेदार थे किन्तु उनकी उद्दंडता व उच्च्श्र्न्ख्ला जब मर्यादा की सीमा लाँघ गयी| उन्होंने एक स्त्री जाति की मान-मर्यादा का विचार न कर एक स्त्री से जबरन रथ से उतारकर उससे बेगार लेना चाहा| उसके पति द्वारा विरोध करने पर अपने संख्या बल के जोर से उसे मौत के घाट उतार दिया| इन सब बातों को सुनकर Rao Shekhaji का धैर्य जाता रहा| अन्याय के खिलाफ उनकी भुजाएं फड़क उठी| उन्होंने तय कर लिया कि बेशक झुंथर के गौड़ उनके रिश्तेदार है पर एक स्त्री कि मान रक्षा के लिए क्षत्रिय आदर्शों का पालन करते हुए वे झुंथर पर आक्रमण कर आततायी कोलवराज गौड़ को अवश्य दंड देंगे |

और उन्होंने बिना समय गवाएं अपने 300 विश्वसनीय सैनिको के साथ झुंथर पर हमला कर कोलवराज गौड़ को मार गिराया और उसका मस्तक काट कर अपनी राजधानी अमरसर पहुँच उस विधवा के पास भेज उसे दिया हुआ अपना वचन पूरा किया |कोलराज का कटा सिर शेखाजी की आज्ञा से अमरसर गढ़ के सदर द्वार पर लटका दिया गया| ऐसा करने का उद्देश्य उद्दंड और आततायी लोगो में भय पैदा करना था ताकि भविष्य में ऐसा अनैतिक कार्य करने का कोई दुस्साहस ना करे|

शेखाजी के इस कार्य की गौडाटी में जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई| गौड़ राजपूतों ने इसे अपना जातीय अपमान समझा और अनेक मनचले गौड़ योद्धाओं ने अमरसर पहुँच अपने मृत सरदार का कटा मस्तक लाने के लिए साहसिक प्रयत्न किये लेकिन वे असफल रहे| बदले की आग में गौडों ने शेखाजी के कई गांवों में लूटपाट की| जिससे शेखाजी व गौडो के मध्य लगातार पांच साल तक संघर्ष चलता रहा| इन पांच सालों में गौडो व शेखाजी के मध्य ग्यारह युद्ध हुए आखिर सभी गौड़ राजपूतों ने घाटवा नामक स्थान पर इक्कठा होकर शेखाजी को निर्णायक युद्ध के लिए ललकारा|

आखिर वि.स.1545 बैशाख शुक्ल तृतीया गुरुवार को घाटवा में शेखाजी व गौडो के मध्य भयंकर युद्ध हुआ जिसमे शेखाजी ने विजय तो प्राप्त करली लेकिन युद्ध में गहरे घाव लगने के वजह से वे वीर गति को प्राप्त हुए | इस प्रकार एक स्त्री की मान रक्षा के लिए महाराव शेखाजी ने पांच साल अपने ही सम्बन्धियों से संघर्ष करते हुए अपना बलिदान दे दिया |

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14 COMMENTS

  1. स्त्रियों की रक्षा के लिए वीरों के खून से सनी है इस राज्य की धरती मगर स्त्री की मान रक्षा के लिए प्राण गंवाना तो अब इतिहास की पुस्तकों में ही संजोया जायेगा ..अखबारों की हेड लाइंस रोज इसी बात की पुष्टि करती हैं..!!

  2. मुझे लगता है कि अपने सभी नेताओं के लिये चुनाव से पहले इतिहास की परीक्षा पास करना अनिवार्य होना चाहिये तभी उन्हें अन्तर समझ आयेगा कि वो क्या कर रहे हैं खुद अबलाओं की इज्जत लूट रहे हैं बहुत बडिया कथा आभार्

  3. राजस्थान की गौरवमई परम्परा में राजपूती इतिहास के अनेक पृष्ठ
    शौर्य , त्याग, बलिदान और न्याय गाथाओं से भरे पड़े हैं कि बरबस ही
    मन में आदर भाव उत्पन्न हो जाता है………..

    महाराव शेखाजी और शेखावाटी की यह गाथा भी अमर रहेगी……..

    जानकारी हम तक पहुंचाने के लिए साधुवाद……………

  4. एक महिला के अपमान का बदला लेने के शायद और भी कुछ तरीक़ें हो सकते थे। शायद इतनी हिंसा ज़रूरी नहीं थी। फिर भी ये हो चुका हैं। इस इतिहास से प्रेरणा मिलती है बहादुर बननी की लेकिन, ये सीखना भी ज़रूरी है कि हर बात पर यूँ ऊग्र होना ज़रूरी नहीं।

  5. अच्छा जानकारीपूर्ण आलेख है । परन्तु इस बात से असहमत नहीं हुआ जा सकता कि राजपूत लड़ाइया अक्सर छोटी बातों और अहं के कारण होती थी । इनमे अनावश्यक उर्जा नष्ट होती थी । बाहर के आक्रमणकारी इस छोटे अहं को फूट में बदल कर कमजोरी बना देते थे और फिर एक एक कर इन रियासतों को परास्त कर अपना राज स्थापित कर लेते थे ।राजपूत योद्धा अपनी वचनबद्धता के कारण हारने के बाद उन्ही आक्रमणकारियों के सेनानी बन जाते थे और फिर उनकी सेवा को धर्म मान लेते थे इसलिये गुलामी से निकलने की कभी गम्भीर कोशिश इतिहास में नहीं मिलती । हां छोटे छोटे वीरता के किस्से बहुत मिलते हैं । मगर ऐतिहासिक आकलन बड़े उद्देश्यों के आधार पर ही हो सकता है, छोटी छोटी बाते मन को समझाने के लिए ही काम आती हैं ।

    मैं इस समाज का अंग होने के नाते पूरे सोच विचार से यह मुद्दा रख रहा हूं । आप की टिप्पड़ी चाहूंगा और इस पर बहस भी ।

    http://www.mireechika.blogspot.com

  6. सवाल ये नही है कि इस 'छोटी सी'(???)बात के लिए इने वर्ष तक युद्ध हुए या जन-धन की क्षति हुई.सवाल एक नवविवाहिता के सम्मन कि,राजकीय अत्याचार की और उसने जो खोया उसकी है.
    आज तो आँखों के सामने किसी बच्चे/स्त्री के साथ भरी बस मे बदतमीजी की जाती है हम सब देखते रहते हैं क्योंकि वो हमारी बहन याँ बेटी नही.यदि हम इसके विरुद्ध तुरंत एक्शन ले तो क्या हिम्मत है कि ऐसी कोई घटना हमारे समाज मे हो.
    मैं तो उस जज्बे को सलाम करती हूं.बाद मे क्या होगा,कितनी बर्बादी होगी सोचने वाले……….कुछ नही कर सकते.अपन तो इस पार याँ उस पार विचारधारा वाले है.जनम से ब्राहमण कर्म से असल राजपूतानी.
    चाहें तो मेरे ब्लोगmoon-uddhv.blogspot.com पर एक घटना 'काकीसा' जरूर पढ़ें.

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