एक श्रमिक विवाद

दिल्ली के ओखला औधोगिक क्षेत्र में स्थित एक परिधान निर्यात फैक्ट्री में उत्पादन के लिए जगह कम थी| सो उत्पादन बढाने के लिए फैक्ट्री मालिक ने औधोगिक क्षेत्र के आस-पास अलग-अलग जगह लेकर उनमें उत्पादन के लिए मशीनें लगा रखी थी जिन्हें सरकारी नीतियां बदलने के बाद सरकारी आदेश के कारण उन्हें बंद करना पड़ा| फैक्ट्री मालिक ने उत्पादन कम ना हो और एक जगह सभी कार्य हो सके इसके लिए दिल्ली के पास ही नोयडा में अपनी जरुरत के मुताबिक जगह लेकर उसमें अपना कारखाना स्थापित कर लिया| जो सरकारी नियमों के पालन के लिए तो जरुरी था ही साथ ही निर्यात के लिए विदेशों से माल के आदेश लेने के लिए ग्राहकों की शर्तों को पुरा करने के लिए भी जरुरी था|

नोयडा में कारखाना लगने के बाद एक आध साल मालिकों ने ओखला स्थित अपने कारखाने में ऑफिस व स्टोर बनाये रखा और नोयडा कारखाने में उत्पादन जारी रखा| पर इस कार्यप्रणाली में उत्पाद की गुणवत्ता और कार्य सँभालने में तो दिक्कत थी ही साथ ही ओखला से स्टोर (गोदाम) से नोयडा तक कच्चा माल ढोने का खर्च भी उठाना पड़ता था| सो फैक्ट्री मालिकों ने पुरा कार्य नोयडा ले जाने के लिए पहले चरण में स्टोर का तबादला करने का कार्य शुरू किया|

स्टोर को नोयडा शिफ्ट करने की बात का पता चलते ही स्टोर के श्रमिकों को लगा कि- “उनकी यहाँ अब तक की नौकरी ब्रेक कर वहां नए सिरे से नौकरी पर रखा जायेगा|”

स्टोर श्रमिक मालिक से मिले और अपनी दुविधा व आशंका बताई| मालिक ने तुरंत कहा- “किसी की नौकरी ब्रेक नहीं की जायेगी| फिर भी किसी को लगता है कि उसे अब तक का कुछ नहीं मिलेगा तो अब तक की गई नौकरी का हिसाब ले ले और नोयडा नए सिरे से नौकरी कर ले| हम हर तरह से तैयार है|”

पर श्रमिकों को कुछ ऐसे लोगों ने भड़का दिया जो खुद नोयडा नहीं जाना चाहते थे और सोचते थे कि श्रमिकों की आड़ में उन्हें भी कुछ ज्यादा मिल जायेगा सो उन्होंने श्रमिकों के मन यह बात बिठा दी कि-“वहां जाने पर ये मालिक तुम्हें कुछ नहीं देगा इसलिए अब तक का यहीं ले लो|” हालाँकि मालिक ये सब देने के लिए तैयार था पर भड़काने वालों ने श्रमिकों को ऐसी क़ानूनी राय दी कि वे तीन से भी ज्यादा गुना मांगने लगे|

तीन गुना से ज्यादा मांगने पर मालिक ने एक ही बात कही कि- “अपने किसी वकील के माध्यम से या खुद कोई श्रमिक इस तरह के कानून की किताब उसे पढवा दे यदि कानून कहता है तो वह देने को तैयार है साथ ही मालिक ने यह भी कहा कि- यह कानून पढ़ने के बाद अपनी और से ज्यादा भी दे देगा|”

पर श्रमिकों को समझ नहीं आया| उन श्रमिकों में कुछ ऐसे भी पुराने श्रमिक थे जिन्हें मालिक अपना खास समझता था और सीधा संवाद ही नहीं रखता था बल्कि कई बार वह उन श्रमिकों की सलाह मैनेजरों के विपरीत भी मानता था यही नहीं कई बार मालिक ने मैनेजरों के फैसले भी उन श्रमिकों के कहने पर बदलें| बावजूद इसके मालिक व श्रमिकों में समझोता नहीं हो रहा था| क्षेत्र की श्रमिक यूनियन भी आग में घी डालने की कोशिश कर रही थी ताकि श्रमिक नेताओं की पूछ हो और समझोता कराने के बहाने कारखाना मालिक से कुछ धन मिल जाये|

आखिर श्रमिकों ने स्टोर पर ताला ठोक काम रोकने का निर्णय किया जिसकी सूचना उन्हीं श्रमिकों में से एक श्रमिक ने प्रबंधन तक पहुंचा दी| दूसरे दिन श्रमिक एक स्थानीय राजनेता व श्रमिक यूनियन का संरक्षण लेकर फैक्ट्री पर ताला ठोकने पहुंचे तब तक मालिक ने भी उनके नेता से बड़े नेता का संरक्षण हासिल कर सुरक्षा के लिए लठैत बिठा दिए|

आखिर परिस्थिति अपने अनुकूल ना देख श्रमिकों ने फैक्ट्री के स्टाफ के कुछ समझदार कर्मचारियों के माध्यम से समझोता करने की पेशकश मालिक तक पहुंचाई| मालिक ने तुरंत कुछ श्रमिकों को बुलाया और कहा- “तुम मेरे लिए औलाद जैसे हो, गलती कर ली कोई बात नहीं, मेरे मन में तुम लोगों के प्रति कोई दुराव नहीं, इसलिए जावो लेखाधिकारी से अब तक का अपना हिसाब बनवा लो, सरकारी नियम से तुम्हें वर्ष के पीछे १५ दिनों की ग्रेचुवटी मिलनी चाहिये थी पर मैं तुन्हें दुगुनी यानी पुरे ३० दिन की दूँगा साथ ही एक माह का वेतन बतौर नोटिस| हालाँकि मैं तुम्हें आगे नौकरी भी दे रहा हूँ इसलिए नोटिस वेतन देना मेरे लिए जरुरी नहीं पर फिर भी तुम मेरे बच्चों जैसे हो, इस फैक्ट्री को आगे बढाने में तुम्हारा भी सक्रीय योगदान रहा है|”

और फिर एक श्रमिक एक एक कर अपने उस समय तक के कार्यकाल का हिसाब बनवा कर लेते गये, ज्यादातर श्रमिकों को अपनी गलती का अहसास हुआ और वे मालिक के पास क्षमा मांगने गये, मालिक ने भी क्षमा करते हुए उन्हें नोयडा फैक्ट्री में जाकर काम करने का निर्देश दिया|

आज भी उनमें से ज्यादातर श्रमिक उस फैक्ट्री में काम रहें है| पर उन्होंने एक संवेदनशील दिल के मालिक के दिल में वो संवेदना गायब करदी जो पहले हुआ करती थी| अब मालिक श्रमिकों को सुविधाएँ तो देता है पर सिर्फ सरकारी कानूनों के अनुसार जितनी जरुरत है उतनी ही| अपनी फैक्ट्री में श्रमिक ठेकेदार का प्रवेश वर्जित रखने वाला फैक्ट्री मालिक आज उस श्रमिक विवाद से मिले सबक के बाद अब स्थायी श्रमिक न रख ठेकेदार के मार्फ़त ही श्रमिक रखता है, जिनसे कभी किसी श्रमिक विवाद की संभावना कोई आशंका नहीं|

नोट :- इस कहानी के सभी पात्रों यथा मालिक, श्रमिक व उन्हें भड़काने वालों से सीधे संपर्क में रहा हूँ | विवाद के पहले भी, विवाद के समय भी और विवाद के बाद भी, विवाद करने वाले कई श्रमिक अब भी यदा कदा मिल जाते है और वह घटना याद कर शर्मिंदा भी होते है|
उस वक्त कौन क्या सोच रहा था ? किसने क्या किया ? सब मेरे सामने हुआ है|

5 Responses to "एक श्रमिक विवाद"

  1. बिलकुल ऐसा हो सकता है। लेकिन ऐसा तभी होता है जब इस तरह के कारखाना मालिक/प्रबंधन और श्रमिकों के मध्य इन मामलों पर पारदर्शिता नहीं होती है। एक तो जब तक सब सही चलता रहता है मालिक श्रमिकों के संगठित होने से चिंतित रहता है और संगठन बनने को हतोत्साहित करता है। दूसरी ओर श्रमिक भी यही समझते हैं कि उन्हों ने संगठित होने का प्रयास किया तो उन की नौकरी खतरे में पड़ जाएगी। लेकिन जब इस तरह की समस्याएँ आती हैं तो मजदूर और मालिकों के बीच का विश्वास खंडित हो जाता है दोनों एक दूसरे पर विश्वास नहीं करते। तब मजदूर टुच्चे नेताओं के चक्कर में पड़ जाते हैं। ये नेता खुद भी कुछ नहीं समझते, उन्हें केवल अपना स्वार्थ दिखता है। इस के लिए जरूरी है कि मालिकों को अपने उद्योग में एक सही और उचित ट्रेड यूनियन का निर्माण करने में सहयोग करना चाहिए और उस से तालमेल रखना चाहिए। जरूरी नहीं कि यह ट्रेड यूनियन किन्ही बाहरी संगठनों से सम्बद्ध हो। जहाँ तक वर्ग संघर्ष का प्रश्न है। इस तरह की परिस्थितियों का वर्ग संघर्ष से कोई लेना देना नहीं होता। अपितु भारत के वर्ग संघर्ष के वर्तमान दौर में इस स्तर तक के पूंजीपति तो श्रमिजीवियों के मित्र के रूप में रेखांकित किए गए हैं। वास्तविकता तो यह है कि इस स्तर का पूंजीपति भी वर्तमान व्यवस्था के शोषण का शिकार होता है वह और उस के कामगार दोनों का शत्रु भी एक ही है। लेकिन वर्तमान व्यवस्था इन्हें साथ भी नहीं आने देती। उस का भला इन छोटे पूंजीपतियों को अपने साथ लगाए रखने में है।

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  2. द्विवेदी जी से सहमत. भारत में हर लेवल पर वर्ग संघर्ष दिखाई देता है और हर व्यक्ति शोषक है और शोषण का शिकार भी, टाप पर बैठे कुछ प्रतिशत लोगों को छोड़कर.

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  3. मालिक और मजदूर दोनों को एक दुसरे की संवेदनाओं को समझना चाहिए,,,,ऐसा न होने पर यही स्थित निर्मित हो जाती है बाद में पछताना पड़ता है ….

    Recent post: रंग गुलाल है यारो,

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  4. प्रवीण पाण्डेय   March 9, 2013 at 1:03 pm

    दूध का जला छाछ भी फूँक फूँक पीता है।

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  5. ताऊ रामपुरिया   March 9, 2013 at 4:31 pm

    बिना एक दूसरे को समझे अक्सर यही होता है.

    रामराम.

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