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Thursday, August 11, 2022

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एक राजकुमारी का आत्मबलिदान

वि.सं.1865 (ई.सन. 1799) में मेवाड़ के महाराणा भीमसिंह की राजकुमारी कृष्णाकुमारी का सगाई सम्बन्ध जोधपुर के महाराजा भीमसिंह के साथ हुआ था| किन्तु वि.सं.1860 (ई.सं.1803) में जोधपुर के महाराजा भीमसिंह का निधन होने की दशा में राजकुमारी का सम्बन्ध जयपुर के महाराजा जगतसिंह के साथ तय किया गया| उसी समय राजस्थान में आतंक का पर्याय बने लूटेरे दौलतराव सिंधिया ने इस सम्बन्ध में महाराजा जगतसिंह को नीचा दिखाने हेतु अडंगा डाल दिया कि यदि यह विवाह हुआ तो वह मेवाड़ में लूटमार मचा देगा| दौलतराव सिंधिया महाराजा जगतसिंह से धन से ना मिलने के चलते चिढ़ा हुआ था| मेवाड़ के महाराणा द्वारा सिंधिया की बात ना मानने के बाद सिंधिया ने मेवाड़ पर आक्रमण किया, उदयपुर के निकट घाटी में दोनों सेनाओं के मध्य युद्ध हुआ और महाराणा को मज़बूरी में सिंधिया की बात माननी पड़ी|

उधर जोधपुर में महाराजा भीमसिंह के निधन के बाद जोधपुर की गद्दी पर बैठे महाराजा मानसिंह ने भी राजकुमारी कृष्णाकुमारी का विवाह जयपुर महाराजा से होना राठौड़ वंश की तौहीन माना| महाराजा मानसिंह का मानना था कि एक बार सगाई का नारियल जोधपुर आ गया तो राजकुमारी का विवाह जोधपुर ही होना चाहिए| उन्होंने महाराजा भीमसिंह के देहांत के बाद राजकुमारी से विवाह के लिए खुद को प्रस्तुत किया| यही नहीं जोधपुर नरेश मानसिंह ने बिना परिणामों की चिंता किये मेवाड़ पर दबाव बनाने की नियत से मेवाड़ की ओर सेना सहित कूच किया| यह खबर मिलते ही जयपुर नरेश जगतसिंह ने भी मानसिंह को रोकने के लिए अपनी सेना सहित कूच किया| बीकानेर के महाराजा सूरत सिंह और भाड़े पर सैनिक उपलब्ध कराने वाला लूटेरा नबाब अमीरखां पिण्डारी भी जयपुर की सहातार्थ आये| परबतसर के पास दोनों सेनाओं के मध्य युद्ध हुआ| राठौड़ों में आपसी फूट थी, सो महाराजा मानसिंह से असंतुष्ट राठौड़ सामंत जयपुर की सेना में मिल गए जिसकी वजह से महाराजा मानसिंह को युद्ध के मैदान से भागकर जोधपुर किले में शरण लेनी पड़ी|

जयपुर की सेना ने जोधपुर किले को जा घेरा, इसी बीच नबाब अमीरखां पिण्डारी को जोधपुर के महाराजा ने ज्यादा धन देकर अपनी ओर मिला लिया, फलस्वरूप महाराजा जगतसिंह को जोधपुर से घेरा उठाना पड़ा| इस बीच नबाब अमीरखां ने इस विवाह विवाद से भविष्य में होने वाले युद्धों की आशंका के चलते जोधपुर महाराजा मानसिंह को सलाह दी कि क्यों ना उदयपुर की राजकुमारी को मरवा दिया जाय ताकि भविष्य में जयपुर-जोधपुर के मध्य के प्रतिष्ठा के नाम पर युद्ध होने की आशंका ख़त्म की जा सके| जोधपुर के महाराजा ने अमीरखां की बात मानते हुए इसका दायित्व भी अमीरखां को ही सौंप कर उसे उदयपुर के लिए रवाना किया|

अमीरखां ने उदयपुर पहुँच अपनी सेना में मेवाड़ के महाराणा की तरफ से नियुक्त वकील अजीतसिंह चुण्डावत के माध्यम से महाराणा को सन्देश भेजा कि- “या तो महाराणा राजकुमारी का विवाह का जोधपुर के महाराजा मानसिंह से कर दें या फिर राजकुमारी को मरवा डाले|” सन्देश के साथ अमीरखां की धमकी भी थी कि “उसकी बात ना मानने की दशा में वह मेवाड़ को अपनी लूटपाट से बर्बाद कर देगा|” मेवाड़ के महाराणा पहले से ही मराठों की लूटपाट और उपद्रव से तंग थे, उनके काल में मेवाड़ की शक्ति भी क्षीण हो चुकी थी, फिर अजीतसिंह चुण्डावत जैसे गद्दार ने अमीरखां का डर दिखाकर महाराणा की मनोदशा को ओर निर्बल कर दिया, सो लाचारी में मेवाड़ के महाराणा ने राज्य हित ने अपनी राजकुमारी का बलिदान देने का निश्चय कर, उसे जहर मिला शरबत पीने के लिए भिजवा दिया| जिसे राजकुमारी ने राज्य हित में आत्म-बलिदान समझ प्रसन्नतापूर्वक पीकर अपनी इहलीला समाप्त कर ली| राजकुमारी की माता महाराणी चावड़ी को यह पता चला कि उसकी पुत्री को जहर का प्याला भिजवा गया है, तो वह दुःख से विह्हल हो विलाप करने लगी तब राजकुमारी ने विषपान से पहले अपनी माता को दिलासा देते कहा- “माता ! आप क्यों विलाप कर रही है? आपकी पुत्री मौत से नहीं डरती| फिर राजकन्याओं व राजकुमारों का जन्म भी तो अपनी प्रजा व राज्य हित में आत्म-बलिदान के लिए ही होता है ना ! यह मेरे पिता का अनुग्रह है कि अब तक मैं जीवित हूँ| प्राणोत्सर्ग द्वारा अपने पूज्य पिता के कष्ट दूर कर राज्य व प्रजा की रक्षा में अपने जीवन को सफल एवं सार्थक बनाने का मौका आज मुझे मिला है, जिसे मैं हाथ से कतई जाने नहीं दूंगी|”

अपनी माता को यह कहकर राजकुमारी कृष्णाकुमारी ने प्रसन्नतापूर्वक श्रावण वदि 5 वि.सं. 1867 (21 जुलाई 1810) को विषपान के माध्यम में आत्म-बलिदान देकर तीनों राज्यों के बीच उसके विवाह को लेकर हुए विवाद का पटाक्षेप कर दिया|

राजकुमारी के आत्मबलिदान के बाद उसकी माता महाराणी चावडी ने अन्न-जल छोड़ दिया तदुपरांत कुछ समय बाद उनकी भी दुखद मौत हो गई| इन दोनों मौतों के षड्यंत्र में अमीरखां का साथ देना वाले पापी, गद्दार अजीतसिंह चुण्डावत को उसके कुकृत्य पर संग्रामसिंह शक्तावत ने लताड़ते हुए, सिसोदिया कुल पर उसे कलंक बताते हुए श्राप दिया था कि उसका भी वंश नष्ट हो जायेगा और वो शीघ्र मृत्यु को प्राप्त को प्राप्त होगा| संग्रामसिंह का श्राप महीने भर में ही सच हो गया, पापी अजीतसिंह चुण्डावत की पत्नी व दो पुत्र एक माह के भीतर ही मर गए, उनकी मृत्यु के बाद अजीतसिंह पाप के प्रायश्चित के लिए विक्षिप्त सा राम नाम जपता हुआ एक मंदिर से दूसरे मंदिर में चक्कर लगाते हुए मर गया|

सन्दर्भ : 1. उदयपुर राज्य का इतिहास, लेखक गौरीशंकर हीराचंद ओझा
2. महाराजा मानसिंह जोधपुर, लेखक डा. रामप्रसाद दाधीच
3.जयपुर राज्य का इतिहास, लेखक चंद्रमणि सिंह

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5 COMMENTS

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