एक मुलाकात शेरसिंह ‘साफा’ के साथ

एक मुलाकात शेरसिंह ‘साफा’ के साथ
पिछले जोधपुर प्रवास के दौरान पहले ही निश्चित कर लिया था कि इस बार शेरसिंह जी राठौड़ ‘साफा’ से जरुर मिलकर आना है | शेरसिंह राठौड़ जोधपुर व देश विदेश में शेरसिंह साफा के नाम से मशहूर है देश के लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में शेरसिंह जी की साफा (पगड़ी) बाँधने की कला का जिक्र हो चूका है ,राजस्थान के हर कोने में आपको शादी समारोह हो,चुनाव हो या कोई अन्य समारोह आपको शेरसिंह द्वारा बाँधा साफा किसी न किसी के मस्तक पर जरुर दिख जायेगा | राजस्थान में चुनाव प्रचार के दौरान एक दुसरे को सम्मानित करने हेतु साफों की इतनी अधिक मांग होती है कि शेरसिंहजी व अन्य साफा व्यवसायी उस मांग की पूर्ति तक नहीं कर पाते |
एक तरफ शेरसिंह राठौड़ ने साफा बांधने से परहेज कर राजस्थान की इस पारम्परिक पहचान से दूर होती पीढ़ी को न केवल इस परम्परा से वापस जोड़कर सांस्कृतिक विरासत को बचाने का काम किया है वहीँ साफा बांधने की इस कला को एक ऐसा व्यवसायिक रूप दिया है कि आज पुरे प्रदेश में सैंकड़ों युवक इस कला को व्यवसाय के रूप में अपनाकर अपनी रोजी रोटी कमा रहे है | मैंने अपनी इस छोटीसी मुलाकात में शेरसिंह जी से यही जानने की कोशिश की कि कैसे उन्होंने इस कला को व्यवसायिक रूप दिया | पेश है उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश –
आपने साफा बांधने की ये कला कब और किससे सीखी ?

शेरसिंहजी – मेरी माताजी बहुत बढ़िया साफा बांधना जानती थी सो आस पास के गांवों के लोग शादियों के समय दुल्हे के लिए उनसे साफा बंधवाने आते थे , मैंने भी बचपन में ही अपनी माता जी से ये कला सीखी और उसके बाद मैं भी जोधपुर आने के बाद हर रोज लोगों के लिए दस बीस साफा बांध दिया करता था पर ये सारा कार्य सिर्फ समाज सेवा तक ही सिमित था |

लेकिन आपने साफा बांधने की इस कला को समाज सेवा के रूप में करते हुए इसे व्यवसायिक रूप कैसे दिया ? और ये आपके दिमाग में कैसे उपजा कि इस आम कला को जो गांवों में बहुतसे लोग जानते को व्यवसाय में बदला जा सकता है |
शेरसिंह जी – हाँ जिस समय मैंने इस व्यवसाय के रूप में लिया उस वक्त दूसरा तो क्या मैं भी नहीं सोच सकता था कि साफा बांधने के भी रूपये मिल सकते है पर ये सब अनायास ही हो गया
कैसे ?
शेरसिंहजी- बात १९८६ की है मैं अपने एक वणिक दोस्त के साथ भोपाल गया था जहाँ हमारी जेब कट गई और हमारे पास जोधपुर वापस आने के लिए किराये के पैसे तक नहीं थे , हम इसी चिंता में कि पैसे का इंतजाम कैसे किया जाये सोच ही रहे थे हमें एक विवाह पांडाल दिखाई दिया और हमने देखा कि लोग अपने व दुल्हे के लिए साफा बंधवाने के लिए परेशान हो घूम रहे थे | मेरा साथी चूँकि वणिक पुत्र था सो तुरंत उसके व्यवसायिक दिमाग ने उन बारातियों की जरुरत समझ ली वह मुझे बाहर छोड़कर विवाह पांडाल में गया और उन्हें कहा कि जोधपुर से एक साफा बांधने वाले यहाँ आये हुए है कुछ फीस लगेगी और मैं उन्हें आपके लिए उपलब्ध करा सकता हूँ , बारातियों से वह सौदा कर मेरे पास आया और यह कहकर अन्दर ले गया कि आप सिर्फ साफा बांधना , फीस की बात मैं करूँगा |

खैर मैंने उनके कुछ साफे बांधे और मेरे मित्र ने उनसे पांच रुपये लेकर जैसे ही मेरे हाथ में दिए तो मैं तो भौचंका रह गया और मित्र से कहने लगा कि ये साफा बांधने की फीस है या कहीं तुमने मुझे ही तो गिरवी नहीं रख दिया ? पांच हजार रूपये मिलने के बाद मेरे वणिक मित्र की वणिक बुद्धि दौड़ने लगी और उसने वहां दो चार दिन और रुकने के कार्यक्रम बना डाला और एक होटल में रुक कर एक अख़बार में विज्ञापन दे डाला कि जोधपुर के प्रसिद्ध साफा बांधने वाले यहाँ आये हुए जिन्हें जरुरत हो इस होटल में आकर मिलें | चूँकि उस समय सदियों का सीजन था और उस विज्ञापन से तीन दिन में ही हमने ३९०००/रु.कमा लिए , उन्ही में से मैंने ३००००/रु. के साफे खरीदकर उन्हें बांध कर नेशनल हेंडलूम को सप्लाई करने का काम शुरू कर इस कला को व्यसायिक रूप देना शुरू किया जो उतरोतर बढ़ता ही गया और इस कला और इस व्यवसाय ने मुझे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति दिला दी |
इसका सारा श्रेय मेरे उस वणिक मित्र को जाता है |
सुना है जोधपुर में हुई लीज हर्ले व अरुण नायर की चर्चित शादी में भी अरुण नायर के लिए साफा आपने ही बाँधा था |
शेरसिंहजी – जी हाँ ! मैंने उस दिन जयपुर में था और वहीँ रतन टाटा जी के एक रिश्तेदार उद्योगपति व इंडिया टुडे वालों का फोन आया कि आपको अरुण नायर के लिए साफा बांधने आना है पर मैंने जयपुर में होने की वजह बता आने में असमर्थता जताई कि इतने कम समय में मेरा जयपुर से जोधपुर पहुंचना नामुमकिन है पर उन्होंने कहा कि ये आप उन पर छोड़ दें आप तो बस हाँ कीजिए और सांगानेर हवाई अड्डा पहुँचिये , मेरे सांगानेर हवाई अड्डा पहुँचते ही वहां एक चार्टड प्लेन इंतजार कर रहा था जो मुझे लेकर तुरंत जोधपुर के लिए उड़ चला और मैंने अरुण नायर के लिए साफा बांधा जिसे पहनते ही नायर ने मुझे ३१०००/रु. दिए |

शादियों व चुनावों की सीजन में जब साफों की मांग बेतहासा बढ़ जाती है तब आप इतने साफे कैसे बाँध पाते है ?
शेरसिंहजी – मेरी दुकान व गोदाम के पास ही राजपूत छात्रावास है जहाँ चौपासनी स्कूल से आये छात्रों को थोड़ा बहुत साफा बांधना आता है क्योंकि चौपासनी स्कूल के छात्रों को स्कूल में साफा बांधना सिखाया जाता है और उन छात्रों व अन्य उत्सुक छात्रों को मैं साफा बांधने की ट्रेनिंग देता रहता हूँ सो सीजन में जब मांग ज्यादा बढ़ जाती है तब मैं उन छात्रों की सेवाएँ लेता हूँ | मैं एक छात्र को एक साफा बांधने के दस रूपये देता हूँ और एक छात्र एक दिन में १५०-२०० साफा बांधकर १५०० से २००० रु. तक कमा लेता है इससे उसके महीने भर का जेब खर्च आ जाता है और मैं बाजार में साफों की मांग पूरी कर पाता हूँ |

शाम का वक्त था मुझे भी सोजती गेट पर स्थित राजस्थानी ग्रंथागार जाना था और शेरसिंहजी को अपनी दुकान बढ़ाकर घर | सो हमने एक दुसरे से दुबारा जल्द मिलने का वादा कर विदा ली | और थोड़ी ही देर में हम राजस्थानी ग्रंथागार पहुँच गए जहाँ हमेशा की तरह इस बार इतिहासकार व साहित्यकार डा.विक्रम सिंह जी राठौड़ से भी मुलाकात हो गई जब उन्हें पता चला कि १९ दिसम्बर को मुझे महामहिम राष्ट्रपति के जन्म दिन समारोह में भाग लेना तो उन्होंने अपनी लिखी एक पुस्तक “राजपूत नारियां” और एक और पुस्तक “भारत के राष्ट्रपति ” की प्रतियाँ महामहिम को उपहार स्वरुप देने के लिए दी |

13 Responses to "एक मुलाकात शेरसिंह ‘साफा’ के साथ"

  1. ललित शर्मा   December 24, 2010 at 1:21 pm

    भाई जी मजा आ गया शेरसिंह "साफ़ा" जी से मुलाकात करके।
    मैने तो जोधपुर से रेड़ीमेड साफ़े ला रखे हैं होली दीवाली उसे ही आजमा लेते हैं।
    जयपुरी साफ़ा कभी कभी बांध लिया जाता है।

    बढिया जानकारी के लिए आभार

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  2. arganikbhagyoday   December 24, 2010 at 1:52 pm

    बढिया जानकारी के लिए आभार!

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  3. हम तो मुरैठा बांधकर ही काम चला लेते हैं…

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  4. dhiru singh {धीरू सिंह}   December 24, 2010 at 2:50 pm

    हमारे यहा भी एक वकील साहब है जो शानदार पगडी बानते है . उनके द्वारा बान्धी गई पगडी का फोटो मैने अपने ब्लाग मे लगया है

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  5. प्रवीण पाण्डेय   December 24, 2010 at 2:59 pm

    बड़ा दमदार लगता है साफा।

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  6. राज भाटिय़ा   December 24, 2010 at 4:44 pm

    वाह जी वाह बहुत सुंदर काम हिंग लगे ना फ़िटकरी रंग भी चोखा..
    धन्यवाद

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  7. नरेश सिह राठौड़   December 25, 2010 at 2:21 pm

    शेर सिंह जी के उज्ज्वल भविष्य की कामना के साथ साथ आपको धन्यवाद इस जानकारी हेतु |

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  8. वाणी गीत   December 25, 2010 at 11:57 pm

    अपनी परम्परा को कायम रखना और उससे कमाई भी …
    रोचक !

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  9. उपेन्द्र ' उपेन '   December 26, 2010 at 4:39 am

    शेर सिंह जी से यह मुलाकात काफी अच्छी रही………. राजस्थानी पगड़ी मुझे भी प्रिय है. जोधपुर के अपने चार साले के प्रवास के दौरान एक जोधपुर के ही राजस्थानी दोस्त से हमने भी सीखी थी मगर अब शायद नहीं बांध पायेगे……….. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति.
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  10. ग्रेट! मुझे तो अपना चपरासी याद आता है उदयपुर का। बुढापे में भी अपने काम व्यवहार में कड़क और शानदार राजपूती साफा पहने बिला नागा।
    आपके ब्लॉग पर राजस्थान की अपनी यादें ताजा हो जाती हैं।

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  11. arganikbhagyoday   December 31, 2010 at 6:46 am

    नव वर्ष के आगमन पर आपको पुरे परिवार सहित बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएँ |

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  12. padmsingh   January 5, 2011 at 3:02 am

    बहुत बढ़िया …. इसी लिए तो कहा है महाजनो येन गतः स पन्थाः … वणिक पुत्र का साथ क्या खूब रंग लाया …. शेर सिंह जी से मिलवाने का शुक्रिया

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  13. sultan   January 7, 2011 at 4:49 am

    kya khub hai

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