एक बेवफा की याद में :कमलेश चौहान

ए दोस्तो जिंदगी के हादसे कुछ इस तरह् से गुजरे
हर बार दर्द के दरिया मै तिनके की तरह बह गये

वो क्यों बिछड़ गया ईसकी हमें कोई सोच नाही
गिला तो जिंदगी से है जो हज़ारो लम्हो मै बॅट गयी

होगी कोई उसकी मजबूरी जो वो हुमसे बिछड़ गया
होगा शायद मुझी मै कोई दोष जो इस कदर रूठ गया

पहले पहल यू उसने अपनी नजरों मै छुपा लिया
बिठाकर हमें आसमां पे फिर ज़मीन पे गिरा दिया

गिरते है लोग हज़ारो मंज़िलो से हर रोज
कटते है दिल और जिगर खंज़रो से हर रोज

तो क्या हुआ वक्त की तलवार से कटा हमारा सम्मान
लो सुन लो हारी हुई जिंदगी का पैग़ाम

हम तो आसमान से गिरकर खाक ही मै मिल गये
अजीब दास्तान यह हुई तुम हमारी ऩज़रो से ही गिर गये

यह पेगाम उनके लिए है जो नज़रे चुरा कर बदल जाते है और सोचते है कि वो दुनिया भर मै सबसे होशयार है !
यह कविता Los Angeles, CA से कमलेश चौहान ने ज्ञान दर्पण पर प्रकाशित करने हेतु भेजी |

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