इस महिला ने मारवाड़ की सेना को पीछे हटने पर कर दिया था मजबूर

इस महिला ने मारवाड़ की सेना को पीछे हटने पर कर दिया था मजबूर

राजस्थान में चारण कवियों ने हर घटना पर अपनी कलम चलाई और गीतों, सोरठों, दोहों, छप्प्यों के माध्यम से उस घटना का इतिहास संजोने का महत्त्वपूर्ण काम किया| अक्सर आधुनिक विद्वान उनकी रचनाओं में किये वर्णन को अतिश्योक्ति मानते है, उनका यह दावा कुछ हद तक सही भी हो सकता है फिर यदि हम उन रचनाओं में वर्णित अतिश्योक्ति वर्णन को छोड़ भी दे तब भी चारण कवियों की रचनाओं में वर्णित इतिहास को नकारा नहीं जा सकता| तत्कालीन मारवाड़ राज्य के एक कवि लक्ष्मीदान ने अपने एक गीत के माध्यम से मारवाड़ के नांणा ठिकाने की एक क्षत्राणी के वीरतापूर्वक किये कार्य को उजागर कर उसे इतिहास के पन्नों पर दर्ज किया| यदि इस घटना का वर्णन कवि नहीं करता तो इतिहास में भारतीय नारी शक्ति के इस वीर रूप से शायद ही हमारा परिचय होता|

मारवाड़ राज्य के मुसाहिब आला और मारवाड़ के कई महाराजाओं के संरक्षक रहे सर प्रताप ने एक आदेश जारी कर नांणा ठिकाने के कुछ गांव बेड़ा ठिकाने में मिला दिए थे| उनके इस आदेश का तत्कालीन नांणा ठिकाने के ठाकुर ने विरोध किया तो सर प्रताप ने उन्हें दबाने के लिए जोधपुर से सेना भेज दी| ठिकाने के ठाकुर व कुंवर राज्य की शक्तिशाली सेना का मुकाबला करने में समर्थ नहीं थे, सो अपनी गिरफ्तारी से बचने के लिए उन्होंने अपना किला छोड़ दिया| लेकिन कुंवरानी अगरकुंवरी को उनका इस तरह किला छोड़ना रास नहीं आया और वे स्वयं तलवार लेकर मारवाड़ राज्य की सेना के सन्मुख आ डटी| कुंवरानी के कड़े प्रतिरोध के कारण आखिर राज्य की फ़ौज को वहां से हटना पड़ा| इस तरह मारवाड़ की शक्तिशाली फ़ौज का साहसपूर्वक सामना कर उस वीर क्षत्राणी ने अपने साहस, शौर्य और वीरता का परिचय दिया|

कुंवरानी की वीरता का तत्कालीन कवि लक्ष्मीदान ने एक गीत के माध्यम से इस तरह वर्णन किया-

हुवौ कूच चिमनेस यूं अदब राखै हुकम, भड़ां काचां कितां प्राण भागा।
देख फौजां डंमर दुरंग छोड़े दिए, जोधहर न छांडी दुरंग जागां।।

फौज निज आव घर राड़ लेवण फबी, छकाया गोळियां घाल छेटी।
मात राखी फतै लड़ी चढ़ मोरचां, बाप घर देखियो समर बेटी।।

करण अखियात कुळ चाल भूले किसूं, थेट सूं चौगाण विरद थावै।
उभै पख उजळी रांण घर उजाळग, जकी गढ़ छोड़ किण रीत जावै।।

अघट बळ देख भेचक भगा आदमी, सुसर पिव भगा गा सुभट सगरी।
जुध समै कायरां प्राण मुड़िया जठै, उठै पग रोपिया कमध अगरी।।

तोल तरवारियां कह्यो समरथ तणी, धूंकलां करण जर सबर धारो।
पालटै नोज भुरजाळ ऊभां पगां, मरूं पण न द्यूं भुरजाल म्हारो।।

संक मन धरुं तो साख मिटे सूरमाँ, खलां दळ विभाडूं जोस खाथे।
काट लागै मने कोट खाली कियां, मरे रण खेत रहूं कोट माथै।

सन्दर्भ : ड़ा. नारायणसिंह भाटी द्वारा लिखित पुस्तक “प्राचीन डिंगल गीत साहित्य” पृष्ठ- 107

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