एक कवि ने अपने नौकर को अमर किया

अमरता शरीर से नही अच्छे कर्म से प्राप्त होती है आज कितने ही देश भक्त वीरों का नाम मातृभूमि के लिए बलिदान करने से अमर है कितने ही शासक, जननायक,वैज्ञानिक,साधू महात्मा और अच्छे इन्सान अपने अच्छे कार्यों के लिए जाने जाते है वे मर कर भी अमर है, लेकिन अमरता प्राप्त करने लिए जरुरी नही कि कोई बहुत बड़ा कार्य ही किया जाए यदि कोई छोटा आदमी भी अपना कर्तव्य ईमानदारी से निभा अमर हो सकता है भरोसा नही तो उदहारण आपके सामने है |
राजिया नामक एक व्यक्ति राजस्थान के मशहूर कवि कृपाराम जी सेवक था एक बार कवि के बीमार पड़ने पर सेवक राजिया ने उनकी खूब सेवा सुश्रुषा की | इस सेवा कवि बहुत प्रसन्न हुए | कहते है राजिया के कोई संतान नही होने के कारण राजिया बहुत दुखी रहता था कि मरने के बाद उसका कोई नाम लेने वाला भी नही होगा | अतः उसके इसी दुःख को दूर करने हेतु अपनी सेवा से खुश कवि ने कहा वह अपनी कविता द्वारा ही उसे अमर कर देंगे | और उसके बाद कवि ने राजिया को संबोधित कर “नीति ” के सोरठे रचने शुरू कर दिए | जिनकी संख्या लगभग १४० थी अभी भी १२३ के लगभग सौरठे (दोहे) मौजूद है |
और उन सार गर्भित सौरठों के भावों, कारीगरी और कीर्ति से प्रभावित हो जोधपुर के तत्कालीन विद्वान् महाराजा मान सिंह जी ने उस राजिया को देखने हेतु आदर सहित अपने दरबार में बुलाया और उसके भाग्य की तारीफ करते हुए ख़ुद सौरठा बना भरे दरबार में सुनाया —-

सोनै री सांजांह जड़िया नग-कण सूं जिके |
किनौ कवराजांह , राजां मालम राजिया ||
अर्थात हे राजिया ! सोने के आभूषणों में रत्नों के जड़ाव की तरह ये सौरठे रच कर कविराजा ने तुझे राजाओं तक में प्रख्यात कर दिया |
कुचामन ठिकाने के जसुरी गांव में सन १८२५ के आस पास जन्मे राजिया को कवि ने अपने दोहों के माध्यम वास्तव में इतना प्रख्यात कर दिया की आज भी लोग राजिया का नाम तो जानते है पर कवि कृपाराम जी को बहुत कम लोग ही जानते है | मैंने अपनी स्कूल शिक्षा के दौरान हिन्दी की पुस्तक में राजिया के दोहे नामक शीर्षक से पाठ पढ़ा था उस समय राजिया के दोहे पढ़कर राजिया का नाम तो जानता था पर कवि कृपाराम जी के बारे में बहुत बाद में जानने लगा | आज भी राजस्थान में जन मानस की जबान पर राजिया के दोहे सुने जा सकते है |
(अगले लेख में कवि कृपाराम जी के बारे में व उनके लिखे कुछ नीति सम्बन्धी सौरठे राजिया को संबोधित करते हुए )

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