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Wednesday, June 29, 2022

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ऊँचे पहाड़ों पर बने किलों में पानी आपूर्ति का रहस्य

राजस्थान में प्राचीनकाल से ही पानी की कमी रही है | फिर भी राजस्थान के निवासी सदियों से अपनी मेहनत और सुझबुझ से इस कमी से पार पाते आये हैं | दरअसल राजस्थान में बारिश बहुत कम होती है और जो होती भी है तो यहाँ के रेगिस्तान की मिटटी बारिश के पानी को तुरंत सोख जाती है यही कारण है कि प्रदेश की ज्यादातर नदियाँ व पोखर वर्षाकाल के बाद सूखे नजर आते है | जब राजस्थान की धरती में ही पानी की कमी है तो पहाड़ की चोटियों पर तो पानी की सोच भी नहीं सकते |

चूँकि राजस्थान के ज्यादातर किले ऊँची पहाड़ियों पर बने है, ऐसे में सोचिये इन किलों में पानी की कैसी समस्या रही होगी और इस समस्या का निदान किलों में रहने वालों ने कैसे किया होगा | आज के इस वीडियो में हम किलों में पानी की निर्बाद आपूर्ति के उस रहस्य व तकनीक पर चर्चा करेंगे जिसके माध्यम से पहाड़ों की ऊँची चोटियों पर बने किलों में पानी की आपूर्ति होती थी |

प्रदेश के ऐसे बहुत से किले हैं जो विशाल है जैसे कुम्भलगढ़, चितौडगढ़, रणथम्भोर, जालौर आदि आदि | ऐसे किले बहुत बड़े पहाड़ी क्षेत्र को घेरे हुए हैं और इन पहाड़ों में उपलब्ध प्राकृतिक या बनाये गये जलाशयों से पानी की आपूर्ति कर ली जाती थी | चितौडगढ़ में तो गौमुख से लगातार बारह महीने पानी निकलकर जलाशय में गिरता रहता है | पर कई छोटे किले ऐसे हैं जो पहाड़ियों की चोटियों पर बने हैं और उनमें प्राकृतिक जलाशय नहीं के बराबर है | अत: इन किलों में पानी की आपूर्ति एक बड़ी चुनौती थी | खासकर युद्धकालीन समय में | क्योंकि युद्धों में इन किलों को दुश्मन सेना वर्षों तक घेरे रखती थी अत: जल आपूर्ति में किले को आत्मनिर्भर रहना अति आवश्यक था |

कहा जाता है ना कि आवश्यकता अविष्कार की जननी है, इन किलों में भी पानी की आपूर्ति की समस्या को दूर करने के लिए तत्कालीन कारीगरों व विशेषज्ञों ने तकनीक खोजी और इस समस्या से निजात पाया | इस वीडियो में कुचामन किले में पानी की आपूर्ति का रहस्य व तकनीक आपको हम दिखा रहे हैं कि कैसे किले में रहने वाले निवासियों के लिए यहाँ पानी की व्यवस्था की जाती थी | आपको बता दें कुचामन क्षेत्र में नमक की झील होने के कारण भूजल भी पीने योग्य नहीं है अत: ऊँची पहाड़ी पर बने किले में भूजल ले जाने के लिए दिमाग लगाना ही बेकार है |

आस पास के क्षेत्र का भूजल पीने योग्य ना होने और पहाड़ी पर कोई बड़ा जलाशय नहीं होने के चलते, यहाँ के शासकों ने किले में जल आपूर्ति के लिए वर्षाजल को संचय करने पर सबसे ज्यादा जोर दिया और किले में बड़े बड़े हौज बनवाये जिनमें किले की छतों, दालानों में बहने वाले वर्षा जल को संचय कर पानी की आपूर्ति की जा सके | किले के सबसे उपरी भाग में आप यह बंद हौद देख सकते हैं, इसे अंधेरिया हौज कहते हैं यह काफी बड़ा है इस हौज में छत व आँगन में बहने वाला वर्षा जल सहेजा जाता था | आँगन में बनी इन नालियों को देखिये ये नालियां आँगन में बहने वाले पानी को इस हौज में पहुंचा देती है और ये हौज उस वर्षाजल को भविष्य के लिए सुरक्षित कर लेता है | राजस्थान में घरों में भी इसी तरह छत का पानी सहेजने की परम्परा रही है पर वर्तमान सार्वजनिक वितरण व्यवस्था के चलते ये परम्परा प्रदेशवासी अब भूल चुके |

किले में बनी इमारतों के मध्य बनी  जगह  बावड़ी व कुएं जैसा रूप देकर इसमें में भी अथाह जलराशि का संग्रह किया जाता था | किले में हर कोने में जहाँ वर्षा जल संग्रह किया जा सकता हैं वहां जल एकत्र करने के लिए छोटे मोटे हौज बने हैं | किले में रहने वाली रानियों के मनोरंजन के लिए यह फव्वारा लगा खुला हौज बना है, आप इसे तरणताल भी कह सकते हैं, इसे देखकर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि किले में इतना वर्षा जल संचय किया जाता था जो ना सिर्फ पीने व अन्य जरूरतों के लिए आपूर्ति करता था बल्कि मनोरंजन के कार्यों में भी प्रयोग होता था |

इसी किले में एक विशाल तरणताल बना है, इसमें कभी अथाह जल संरक्षित किया जाता था, जिसे वर्तमान में होटल में आने वाले पर्यटकों के लिए तरणताल का रूप दे दिया गया है | आज बेशक पानी बचाने के लिए बना यह टैंक तरणताल में तब्दील हो गया, पर कभी इस बड़ा सा हौज किले की सुरक्षा में तैनात योद्धाओं के लिए  जल आपूर्ति किया करता था |

कुला मिलाकर हमारे पूर्वज वर्षा जल को संरक्षित कर वर्षभर के लिए जरुरी पानी का जुगाड़ कर लिया करते थे | यदि कहा जाय कि प्रदेश वासी बादलों द्वारा लाइ गई उनके भाग्य में लिखी बूंदों को सहेजकर जल समस्या से निजात पा लिया करते थे  और आज हम निर्मल व स्वच्छ वर्षा जल को संग्रह करने के बजाय देश के दूसरे भागों में बह रही नदियों का पानी नहरों द्वारा अपने क्षेत्र में लाने के लिए आन्दोलन करते हैं | भारत सरकार ने भी हमारे पूर्वजों द्वारा वर्षाजल को संग्रह करने के लिए अपनाई गई तकनीक व रहस्य को समझा और कृषि के लिए प्रधानमंत्री सिंचाई योजना के तहत इस तरह के तालाब बनवाने के अनुदान दिया जाता है ठीक इसी तरह पीने के पानी के लिए भी इस तरह के हौज बनवाने के लिए अनुदान दिया जा रहा है | सरकारी अनुदान पर बने इस तरह के जल संगरण हौज राजस्थान के खेतों में नजर आते हैं |

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