उजळी और जेठवै की प्रेम कहानी और उजळी द्वारा बनाये विरह के दोहे-2

उजळी और जेठवै की प्रेम कहानी और उजळी द्वारा बनाये विरह के दोहे-2


उजळी द्वारा अपने प्रेमी जेठवा की मृत्यु उपरांत बनाये पिछोले –

पाबासर पैसेह हंसा भेला नी हुआ |
बुगलां संग बैसेह , जूण गमाई जेठवा ||

संसार रूपी मान सरोवर में रहकर जेठवा रूपी हंसों का संसर्ग प्राप्त न हुआ और बगुलों (निकृष्ट प्रेमियों) के संग रहकर अपना जीवन नष्ट कर दिया |

जेठवै के बिना उजळी का संसार शून्य है | वहां के लोग उजळी को बगुले लगते है | सत्य भी तो है कि गरीब का आश्रय कुटिया है | उसके लिए गमनस्पर्शी राजप्रशाद और रम्य आश्रम पशुओं के निवास स्थान है | उसका उनसे कोई प्रयोजन भी तो नहीं |

वै दीसै असवार घुड़लां री घूमर कियां |
अबला रो आधार, जको न दीसै जेठवो ||

घोड़ों को घुमाते हुए कई अश्व सवार दिखते है लेकिन मुझ अबला का आधार जेठवा नहीं दिखाई देता |

जिनका हृदय टूट जाता है उनके लिए संसार आबाद होते हुए भी शून्य है | यों तो घोड़ों के सवार बहुत मिलेंगे लेकिन अबला उजळी का आधार अब नहीं आने का | किसी प्रिय की मृत्यु पर हमारे हृदय में जो वैराग्यपपूर्ण निराशा आती है उसे उजळी ने ‘ जको न दीसै’ जैसे मृदुल लेकिन तीक्षण शब्दों में प्रकट किया है |

अंगूठे री आग लोभी लगवाड़े गयो |
सूनी सारी रात, जंप न पड़ी रे जेठवा ||

हे लोभी तूं अंगूठे की आग लगाकर चला गया | मैं रात भर रोई ,और हे जेठवा ! मुझे लेश मात्र भी नींद नहीं आई |

उजळी का संबोधन “लोभी” बहुत मौके का है | विशेषतः राजस्थानी तो लोभीड़े शब्द को बहुत मानते है | फिर ‘ लगवाड़े गयो में कितनी वेदना है | एक बेबस हृदय बिछुड़ते हुए के प्रति रोने के सिवाय और क्या कर सकता है ?

बहता जळ छोडेह, पुसली भर पियो नहीं |
नैनकड़े नाड़ेह, जीव न धापै जेठवा ||

चलते जळ को छोड़कर उससे चुल्लू भर भी पानी नहीं पिया ,अब इन छोटे-छोटे तालाबों से पिपासा नहीं बुझती |

उजळी अपने प्रियतम की महानता किस विशेषता से अभिव्यंजित करती है – जेठवा बहता हुआ पवित्र जल था और संसार के अन्य जन छोटे गड्ढे है – उजळी की इच्छा थी कि जेठवा रूपी बहते जल को प्राप्त करूँ,लेकिन बहने वाला जल जब बह गया तो अब गंदे जलाशयों का पानी किस भांति पी सकती थी | पाठक देखेंगे कि इस सोरठे में वाही भाव है जो सती सावित्री द्वारा नारद व उसके पिता के सत्यवान से दूसरा वर चुनों कहने पर प्रदर्शित किया गया था |
क्रमशः

यहाँ भी जाएँ –
हठीलो राजस्थान , मेरी शेखावाटी , हरियाणवी ताऊनामा

5 Responses to "उजळी और जेठवै की प्रेम कहानी और उजळी द्वारा बनाये विरह के दोहे-2"

  1. प्रवीण पाण्डेय   December 15, 2010 at 3:00 am

    हृदय टूटने का कष्ट भारी है।

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  2. अगली कड़ी का इन्तजार है…

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  3. नरेश सिह राठौड़   December 15, 2010 at 8:36 am

    पवित्र प्रेम की ये दास्तां बहुत मार्मिक है | इसी लिए ये पिछोले अमर हो गए | आपके ब्लॉग के माध्यम से ये जन सामान्य को पढ़ने के लिए मिल रहे है आभार |

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  4. krishana   December 15, 2010 at 12:31 pm

    bahoot hi sunder rachana ,agali kadi ka intzar hai hkm

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  5. राज भाटिय़ा   December 15, 2010 at 4:31 pm

    बहुत अच्छी लगी कहानी, अगली कडी जल्द देवे, धन्यवाद

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