इस योद्धा को घोड़ी का नाम शेखावती रखना पड़ गया था भारी

इस योद्धा को घोड़ी का नाम शेखावती रखना पड़ गया था भारी

राजस्थान के एक योद्धा को एक घोड़ी का नाम शेखावती रखना भारी पड़ गया था | इतिहासकारों के अनुसार खाटू के इंद्रभाण जोधा बादशाही सेवा में थे| माधोदास व उनके पुत्र सूरसिंह बादशाही इलाकों में लूटपाट करते थे| इंद्रभाण जोधा बादशाह की ओर से सूरसिंह को पकड़ने आया| आपसी मुठभेड़ में इंद्रभाण जोधा के हाथों सूरसिंह मारे गए और उनकी घोड़ी “लाछी” इंद्रभाण जोधा के हाथ लगी| इंद्रभाण जोधा ने उस लाछी नामक घोड़ी का नाम शेखावती रख दिया| जो शेखावाटी के वीरों को अच्छा नहीं लगा, पर इंद्रभाण जोधा बादशाह औरंगजेब का कृपा पात्र था अंत: उसे सबक सिखाना आसान ना था |

सीकर के इतिहास में लिखा है कि एक बार बादशाह औरंगजेब अजमेर सो दिल्ली जा रहा था। रास्ते में पर्वतसर में बादशाह का ठहराव हुआ। वहाँ बादशाह के पास राव, उमराव उपस्थित हुए। जसवन्त सिंह भी अपने पचास सवारों के साथ वहाँ पंहुचे। देवराज नामक चारण भी वहाँ पंहुचा। वह सभी राव, उमराव. ठाकुरों के डेरे जाता और कविता आदि सुनाता था। वह इन्द्र भाण के डेर पंहुचा। चारण के सामने ही इन्द्रभाण जोधा ने ‘शेखावती’ घोड़ी पर जीन करने की आज्ञा दी। चारण को यह क्षुद्र बात अच्छी नहीं लगी और इन्द्र भाण को कहा ” आपके मुँह से यह बात अच्छी नहीं लगती।” इन्द्रभाण ने गुस्से में कहा,”जाओ शेखावतों को मेरे ऊपर चढा लाओ।” चारण को यह बात पसन्द नहीं आयी। वह वहाँ से चला आया और मन ही मन प्रतिज्ञा की कि इन्द्रभाण को मजा चखाकर ही अन्न जल ग्रहण करूँगा। वह शेखावतों के डेरे पर गया पर इन्द्रभाण पर औरंगजेब की कृपा जानकर चारण की बात को किसी ने सुना नहीं।

वह जसवन्त सिंह के डेरे पर आया, अपनी सब बातें कहीं और कहा कि जब तक इन्द्रभाण को दण्ड नहीं मिलेगा तब तक मैं खाना नहीं खाऊँगा। चारण के मन की तथा शेखावतों के अपमान की बात सुनकर जसवन्त सिंह का राजपूती शौर्य जाग उठा। उन्होंने तत्काल इन्द्रभाण जोधा पर चढाई करी दी और इन्द्रभाण का सिर काट डाला, उसके बहुत से आदमी भी मारे गये। बादशाह को इन्द्रभाण का मारा जाना अखरा पर घोड़ी का नाम शेखावती रखने को बादशाह औरंगजेब ने भी अच्छा नहीं माना और जसवंत सिंह के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की|

जसवंतसिंह लाछी घोड़ी को लेकर घाटवा आये और सूरसिंह के भाई फतहसिंह के सामने पेश कर दी| फतहसिंह बहुत प्रसन्न हुए और उस दिन से लाडखानी व रावजी का शेखावतों के मध्य जो आपसी वैमनस्य था, वह भी दूर हुआ| साथ ही एक चारण कवि व एक समुदाय की भावनाओं को आहत करने वाले को प्राण गंवाकर दंड भुगतना पड़ा|

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