इस देवी ने दिखाया था मुग़ल सेना को चमत्कार

सन 1679 के मार्च  महीने में मुगल सेना देवी के इस मंदिर को तोड़ने के लिए जूझ रही थी | मंदिर को बचाने के लिए मुग़ल सेना का प्रतिरोध करने वाले योद्धा भी नहीं थे, बावजूद मुग़ल सेना का मंदिर तोड़ने का मनसुबा सफल नहीं हो रहा था | जबकि इससे पूर्व खंडेला, हर्षनाथ व खाटूश्यामजी के मंदिर तोड़ने में उसे कोई परेशानी नहीं हुई थी | मुग़ल सेनापति दराब खान परेशान था क्योंकि इन पहाड़ियों में बने इस देवी मंदिर का उसकी सेना बाल भी बांका नहीं कर पा रही थी |

आपको बता दें “8 मार्च सन 1679 को बादशाह औरंगजेब की आज्ञा से एक विशाल मुग़लवाहिनी जिसमें तोपखाना तथा हस्ती सेना भी शामिल थी- सेनापति दराबखां के नेतृत्व में खंडेला के राजपूतों को सजा देने और उनके पूजा-स्थलों को तोड़-फोड़कर धराशाही कर देने हेतु भेजी गई| नबाब कारतलबखां मेवाती और सिद्दी बिरहामखां जैसे अनुभवी सेनानी, जो खंडेले के पहले युद्ध में पराजित होकर भाग गये थे- इस अभियान में शामिल थे|” इस सेना ने खंडेला नगर के मंदिरों को ध्वस्त कर दिया था, हालाँकि खंडेला के मंदिरों को ध्वस्त करने के लिए मुग़ल सेना को 300 धर्मपरायण शेखावत वीरों का सामना करना पड़ा था | इन 300 वीरों ने वीर सुजान सिंह शेखावत के नेतृत्व अपने शरीर में रक्त की अंतिम बूंद रहने तक युद्ध किया और अपने प्राणों का बलिदान दे दिया, पर पीठ नहीं दिखाई |

खंडेला के बाद मुग़ल सेना को अन्य मंदिर तोड़ने के लिए प्रतिरोध का सामना भी नहीं करना पड़ा | खाटूश्याम व हर्षनाथ पर्वत पर मंदिर को तोड़कर मुग़ल सेना ने जीणमाता मंदिर तोड़ने के लिए कूच किया था | ज्ञात हो जीण माता मंदिर धाम राजस्थान के शेखावाटी आँचल में अरावली की सुरम्य पहाड़ियों के मध्य स्थित है | पहाड़ी के एक ऊँचे शिखर पर मंदिर बना है जिसे स्थानीय लोग काजल शिखरा कहते हैं | इस मंदिर तक जाने के लिए पक्की सीढियाँ बनी है जो श्रद्धालुओं की राह आसान करती है | मंदिर के पुजारी बतातें है कि सबसे पहले जीण माता ने उसी शिखर पर शक्ति की आराधना व तपस्या की थी |

ज्ञात हो जीण का जन्म राजस्थान के चुरू जिले के घांघू गांव में चौहान वंश में हुआ था | अपनी भाभी से किसी विवाद को लेकर जीण रूठ गई और उसके जीवन में वैराग्य उत्पन्न हो गया | बस यही वैराग्य उसे अपने घर से दूर अरावली की इस सुरम्य पर्वतमाला में ले आया और वो यहाँ आकर तपस्या करने लगी | जीण का भाई हर्ष उसे मनाकर लेने आया पर जीण नहीं मानी, आखिर भाई ने भी घर ना जाने की ठानी और पास ही हर्षनाथ पहाड़ के शिखर पर तपस्या कर भैरव रूप को प्राप्त हुआ वहीँ जीण शक्ति की आराधना कर माँ शक्ति के रूप में पूजित हुई |

मुग़ल सेना इसी जीण का प्राचीन मंदिर तोड़ने को उद्धत थी, पर वह एक बड़ी मुसीबत में फंस गई, ऐसी मुसीबत का मुग़ल सेना ने कभी सामना नहीं किया था और सेना पर जिस दल ने आक्रमण किया उस पर किसी तरह का कोई हथियार काम नहीं आ रहा था, सामने हथियारों से लैस एक भी योद्धा नहीं था फिर भी मुग़ल सेना लहूलुहान हो रही थी, भागने व छुपने के लिए भी उसके सिपाहियों को कहीं ठौर नहीं मिल रही थी |

आपको बता दें मुग़ल सेना को यहाँ किसी सेना व योद्धाओं के दल ने चुनौती नहीं दी थी बल्कि बड़ी मधुमक्खियों ने जिन्हें स्थानीय भाषा में भंवरामोह कहा जाता है, मुग़ल सेना पर आक्रमण कर उसकी हालत बुरी कर दी थी | चूँकि मधुमक्खियों के आगे तोप, तलवार, भाला सभी तरह के हथियार फ़ैल थे अत: हारकर सेनापति मंदिर के पुजारियों से मिले और मंदिर पर हमले के लिए माफ़ी मांगते हुए बचाव का उपाय पूछा | पुजारी ने सलाह दी कि माता जीण से माफ़ी मांगते हुए मंदिर में तेल चढ़ाएं तभी आप बच सकते हैं | औरंग के सेनापति ने तब माता से माफ़ी मांगते हुए तेल चढ़ाया तभी मधुमक्खियाँ शांत हुई और मुग़ल सेना की जान में जान आई |

आपको बता दें बादशाह औरंगजेब ने सेनापति का वचन निभाया और मंदिर में अखंड दीप के लिए सवामण तेल प्रतिमाह दिल्ली से कई वर्षो तक आता रहा फिर दिल्ली के बजाय जयपुर से आने लगा | बाद में जयपुर महाराजा ने इस तेल को मासिक के बजाय वर्ष में दो बार नवरात्रों के समय भिजवाना आरम्भ कर दिया | और महाराजा मान सिंह जी के समय उनके गृह मंत्री राजा हरीसिंह अचरोल ने बाद में तेल के स्थान पर प्रतिमाह नकद रूपये भेजने की व्यवस्था शुरू की | जो देश की आजादी तक यानी जयपुर रियासत के शासनकाल तक निरंतर प्राप्त होते रहे | तेल के लिए आने वाला यह धन बेशक जयपुर से आता था पर जयपुर रियासत यह खर्च दिल्ली को चुकाए जाने वाले कर से कटौती कर लेती थी | मुग़ल सेना को चमत्कार दिखाने के बाद जीण माता ” भौरों की देवी ” के नाम से भी जानी जाने लगी | मंदिर के पुजारी के अनुसार ये भौरें अर्थात बड़ी मधुमक्खियाँ मंदिर से निकली थी और आज भी मंदिर के कुछ सौ मीटर के दायरे में ही रहती है

शेखावाटी के मंदिरों को खंडित करने के लिए मुग़ल सेनाएं कई बार आई जिसने खाटू श्याम, हर्षनाथ, खंडेला के मंदिर खंडित किए, पर जीण माता का मंदिर खंडित नहीं कर पाई | इसी प्रसंग पर एक कवि ने इस पर यह दोहा रचा – देवी सजगी डूंगरा , भैरव भाखर माय | खाटू हालो श्यामजी , पड्यो दड़ा-दड़ खाय ||

इस तरह औरंगजेब की सेना को चमत्कार दिखाने वाली यह देवी आज स्थानीय ही नहीं देशभर के लाखों लोगों की आस्था का केंद्र है | देश की कई जातियां इस देवी को अपनी कुलदेवी मानती हैं तो शेखावाटी के शासक रहे शेखावत राजपूत इसे अपनी ईष्ट देवी मानते हैं | पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल जब राष्ट्रपति थी तब वे भी इस मंदिर में मत्था टेकने आई थी| शेरे राजस्थान पूर्व उपराष्ट्रपति स्व. भैरोंसिंह जी का तो यहाँ आना लगा ही रहता था उनके अलावा भी राज्यपाल, मंत्री, नेता व बड़े अधिकारी यहाँ मत्था टेकने आये हैं और आते रहते हैं |

यदि आप भी इस देवी के दर्शन करने की इच्छा रखते हैं तो आप सीकर आकर यहाँ पहुँच सकते है सीकर दिल्ली व जयपुर व प्रदेश कई बड़े शहरों से रेल व बस सेवा से जुड़ा है और हाँ यदि आप सालासर या खाटू श्याम जी मंदिर में आते रहते है तो इस बार अपनी यात्रा में जीणमाता मंदिर धाम का नाम भी शामिल कर लीजिये, ये मंदिर सालासर व खाटूश्याम बाबा मंदिर के रास्ते में ही पड़ता है |

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