इस गांव वालों की भावपूर्ण भक्ति के आगे आज भी झुकते है देवता

आज हम आपको एक ऐसे गांव की जानकारी देंगे जिस गांव के लोगों की भावपूर्ण भक्ति के आगे आज भी देवता झुकते हैं| राजस्थान में प्राचीन काल से ही वर्षा कम होती रही है| वर्षा ऋतू के पानी पर ही यहाँ के निवासी वर्षभर निर्भर रहते थे| ऐसे में वर्षा ना होना ही यहाँ की प्रमुख समस्या होती थी| जिस वर्ष बारिश नहीं होती थी, उस वर्ष राजस्थान के गांवों में देवताओं को मना कर बारिश करवाने के लिए कई अनूठे आयोजन करने की परम्पराएं रही है| परम्पराओं की इसी कड़ी में बसेठ नाम के गांव में बारिश करवाने की अनूठी रही है जो आज भी कायम है| आज भी इस गांव में जब बारिश नहीं होती तब ग्रामीण अपनी भावपूर्ण भक्ति से इंद्रदेव को बारिश करने के लिए मजबूर कर देते हैं|

बसेठ राजपूताने में नरुखण्ड का एक प्रतिष्ठित ठिकाना है । कछवाह कुल के नरुका शाखा के दासावत खांप के कुँवर हृदयराम जी ने करीब 250 वर्ष पूर्व  महर्षि वशिष्ठ के प्राचीन आश्रम के निकट बसे एक गाँव मे धाकड़ जाति से इस गाँव को हस्तगत किया था । इस गाँव का नाम बसेठ है जोकि वशिष्ठ का अपभ्रंश है । आज यह ” बसेठ” के नाम से ही अधिकृत रूप से जाना जाता है । इस गाँव मे मान्यता है कि महर्षि वशिष्ठ के आश्रम के निकट एक कुंड था जो अब एक विशाल तालाब के रूप में आश्रम या देवस्थान के निकट है। यह तालाब हर वर्ष नहीं भर पाता है, पर जिस वर्ष यह तालाब भर जाता है अगले 5 वर्षों तक ठिकाना बसेठ की कुल कृषि भूमि जोकि 6696 बीघा है में खूब फसल होती है| कुँओं और बोरवेलों में जलस्तर बढ़ जाता है । मान्यता यह भी है कि जब तक गाँव के ठाकुर के परिजन समस्त गाँव की प्रजा को साथ लेकर अखण्ड कीर्तन भजन एवं मन्त्र जप के लिए वशिष्ठ मुनि के आश्रम में यज्ञ एवं भंडारा नहीं करते, तब तक गांव के सीमाक्षेत्र जो 12 गाँवो में फैला है वहां वर्षा नहीं होती है और तालाब भरने का तो मतलब ही नहीं।

इसी आश्रम में सूर्यवंशी कछवाहों के कुलदेवता अम्बिकेश्वर महादेव का प्राचीन शिवालय, कुलदेवी जमवाय माता का मंदिर, भैरों बाबा एवं कुल के पितरों एवं प्रेत बाबा का चबूतरा एवं ठान है । गांव में बारिश के लिए देवगणों को प्रसन्न करने के लिए किए जाने वाले अनुष्ठान को देशी भाषा मे ‘धर्म करना’ कहते है । इस गांव में जब भी बारिश नहीं होती तब गांव वालों द्वारा धर्म करने का अनुष्ठान किया जाता है| कई बार ऐसा भी हुआ कि ठिकाने के राजपूत परिवारों ने अन्य जातियों के सहयोग और सहमति के बिना धर्म अनुष्ठान किया तब उससे न तो अच्छी वर्षा ही हुई और न ही वह प्राचीन तालाब  छलका । ठीक इसी प्रकार एक दो बार गाँव के दूसरे समाज के लोगों ने राजपूतों के बिना इस तरह के आयोजन किये किन्तु परिणाम शून्य रहे । इससे यह मान्यता और प्रबल हो गई कि सभी देवगण एवं स्थानीय दैवीय शक्ति भी यही चाहती हैं कि यह धार्मिक अनुष्ठान गाँव के साथ लोग बिना किसी भेदभाव के मिलकर एवं अच्छी भावनाओं के साथ करे।

पिछले वर्ष भी 19 जून में इसी आश्रम में एक धार्मिक आयोजन हुआ था किन्तु वो कुलदेवी जमवाय माता के मंदिर में माता की मूर्ति के प्राण प्रतिष्ठान के लिए किया गया था जो श्री क्षत्रिय वीर ज्योति के संयोजक कुँ.राजेन्द्र सिंह बसेठ के पिताश्री ठाकुर साहब सुजान सिंह जी के परिवार द्वारा निजी खर्चे पर किया गया था। पर इस आयोजन में गांव की सभी जाति के लोग शामिल हुए| इस बार जब लगभग पूरे राजस्थान में भारी वर्षा हो गई फिर भी ठिकाना बसेठ के सभी 12 गाँवो में सूखे जैसी हालात थी| वर्षा के अभाव में फसल सूखने लगी थी, तब चिंतित गांव वालों द्वारा ठाकुर परिवारों की अगुवाई में 18 जुलाई को आश्रम में जमवाय माता एवं भैरों बाबा को साक्षी मान अखण्ड हरि कीर्तन शुरू किया गया| परिणाम यह हुआ कि 21 जुलाई की शाम को वर्षा होनी शुरू हुई और 22 जुलाई की शाम तक चलती रही| इस भारी वर्षा के बाद कभी कभार भरने वाला वो प्राचीन तालाब पानी से भरकर छलक गया । पूरे क्षेत्र में मुसलाधार बारिश हुई । चारों और जल ही जल ।

पुराने बुजुर्गों का कहना है कि ऐसी वर्षा 6 वर्ष पूर्व 2012 में हुई थी । इस बारिश के बाद ग्रामीणों के चेहरे खुशी के मारे खिल उठे हैं| उनके खिले चेहरों पर वर्षों से चली आ रही इस परम्परा पर विश्वास की झलक साफ़ देखी जा सकती है| जो साबित करती है  कि देवगण भावों के भूखे है एवं सदा से चली आयी मान्यताएं कोरी बकवास नहीं है।

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