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इस करणी माता मंदिर में गड़ा त्रिशूल खुद देवी करणी माता ने गाड़ा था

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श्री करणी माता मंदिर पूगल

देशनोक की श्री करणी माता देश विदेश में प्रसिद्ध है और लाखों करोड़ों लोगों की जन आस्था का केंद्र है | देशनोक में श्री करणी माता का मुख्य मंदिर है, जहाँ लाखों लोग प्रतिवर्ष धोक लगाने व पूजा अर्चना करने जाते हैं | लेकिन देशनोक से 111 किलोमीटर दूर पूगळ में श्री करणी माता का एक ऐसा ऐतिहासिक मंदिर स्थित है जिसमें श्री करणी जी ने स्वयं अपने हाथों से त्रिशूल गाड़ा था, और माँ के हाथों का स्पर्श पाया वह त्रिशूल आज भी उस मंदिर की शोभा बढ़ा रहा है | पूगळ के इतिहास प्रसिद्ध दुर्ग के मुख्य द्वार में प्रवेश करते ही सबसे पहले माँ करणी के मंदिर के दर्शन होते हैं|

इसी मंदिर में गड़ा त्रिशूल खुद श्री करणी माता ने गाड़ा था | करणी माता उस वक्त मुल्तान से पूगळ आई थी | इतिहासकारों के अनुसार पूगळ के तत्कालीन शासक राव शेखाजी भाटी को मुल्तान के शासक हुसैन खान लंगा (सन 1469-1502 ई.) ने कैद कर लिया था | राव शेखाजी भाटी करणी माता के अनन्य भक्त थे और उन्हें अपनी धर्म बहन मानते थे | आपको बता दें माँ करणी उस क्षेत्र की तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियों से अनभिज्ञ नहीं थी और वह उस क्षेत्र में शांति व विकास चाहती थी अत: किसी भी तरह की राजनैतिक उठापटक में वह हस्तक्षेप कर शांति स्थापित करवा देती थी | राव शेखाजी भाटी की मुल्तान में कैद होने की खबर पाते ही माँ करणी तत्काल पूगळ पहुंच गई, वहां राव शेखाजी की राणी, प्रधान गोगली भाटी और दीवान उपाध्याय से सारी समस्या पर चर्चा कर उन्हें इससे निपटने के सुझाव दिये |

साथ ही राव शेखाजी भाटी की पुत्री रंगकंवर का विवाह कुमार बीका से करने का सुझाव दिया | आपको बता दें कुमार बीका उस वक्त जांगलू प्रदेश (बीकानेर) में राज्य स्थापित कर चुके थे, और वे क्षेत्र की एक उभरती शक्ति थे | अत: शक्ति संतुलन व भविष्य में पूगळ व कुमार बीका के मध्य किसी भी तरह के संघर्ष को रोकने के लिए माँ करणी की नजर में यह विवाह सम्बन्ध अति अनिवार्य था | देवीजी पूगळ में सभी तरह का विचार विमर्श कर मुलतान पहुंची | पूगल के इतिहास में लेखक हरिसिंह भाटी लिखते हैं कि- “वहां के मुसलमानों पीरों के मठ में उनकी अतिथि बनी | उन्होंने पीर को अपना वहां आने का उद्देश्य बताया | देवी करणी जी की प्रखर बुद्धि, ज्ञान, उदार आचरण, दैवीय भाव-भंगिमा और चमत्कारिक प्रवृति से पीर बहुत प्रभावित हुये, उन्हें उच्च श्रेणी की अलौकिक शक्तियों से युक्त देवी माना और बहुत स्नेह से उनका आदर सत्कार किया|”

देवी करणीजी ने इन्हीं पीरों के माध्यम से मुल्तान के शासक से समझौता वार्ता की, उस पर दबाव बनाया और राव शेखाजी भाटी को कैद से मुक्त करवा कर पूगल ले आई | आपको बता दें मुल्तान के शासक राव शेखाजी भाटी द्वारा मुल्तान में धावे मारने से परेशान थे, और वे किसी भी कीमत पर उन्हें छोड़ने को राजी नहीं थे, पर मठ के पीर व देवी करणी जी के दबाव के चलते आखिर राव शेखाजी भाटी को कैद किया गया पर मुल्तान वालों ने देवी करणीजी से यह गारंटी चाही कि शेखाजी भाटी भविष्य में मुल्तान में बिगाड़ नहीं करेंगे | मठ के पीर को आशंका थी कि कहीं रास्ते में हुसैन खान लंगा राव शेखाजी भाटी को मरवाने का षड्यंत्र ना रच दे अत: उनकी सुरक्षा के लिए उन्होंने अपने मठ से पांच शिष्यों को देवी करणीजी के साथ पूगळ भेजा | वे शिष्य आजीवन पूगल रहे | इन पंच पीरों के निधन पर उन्हें किले के बाहर एक ऊँचे स्थान पर दफनाया गया जहाँ आज भी पंच पीरों की खानगाह नाम से छोटी से ईमारत बनी है |

इस तरह राव शेखाजी भाटी को छुड़वाने के घटनाक्रम में देवी करणीजी का पूगळ पधारना हुआ और तभी उन्होंने किले प्रवेश द्वार के पास यह त्रिशूल गाड़ा | डा. नरेन्द्रसिंह चारण ने “श्री करणी माता का इतिहास” पुस्तक में लिखा है कि- “मुलतान से पूगल पहुँच कर श्रीकरणीजी ने किले के पूर्वी द्वार पर विश्राम किया और द्वार दाहिनी दिवार के पास अपने हाथ से त्रिशूल को जमीन में गाड़कर स्थापित किया और वचन दिया कि जब तक यह त्रिशूल यहाँ गड़ा रहेगा तब तक पूगल पर भाटियों का राज बना रहेगा | यह त्रिशूल पिछले पांच से वर्षों से वहीं गड़ा हुआ है | कहते हैं कि जब देवी श्रीकरणीजी ने इसे भूमि में गाड़ा था तब उसकी ऊंचाई आदमी के बराबर थी, अब जमीन से केवल एक डेढ़ फुट ऊपर है|” इसका कारण मंदिर निर्माण को माना जा सकता है |

तो इस तरह पूगल गढ़ के पूर्वी प्रवेश पर बने इस श्री करणी मंदिर में गड़ा त्रिशूल ऐतिहासिक होने के साथ महत्त्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि यह त्रिशूल देवी श्री करणी माता ने स्वयं अपने हाथों से गाड़ा था |

नोट : इतिहास की कई किताबों व ख्यातों में लिखा है और जनश्रुति प्रचलित है कि देवी चील पक्षी का रूप धारण कर राव शेखाजी भाटी को मुलतान की कैद से छुड़ा लायी थी, जिसे “पूगल का इतिहास” पुस्तक में लेखक हरिसिंह भाटी ने अतिश्योक्ति माना है |

दूसरा “बीकानेर राज्य के इतिहास” में इतिहासकार ओझाजी ने राव शेखाजी को मुलतान की कैद से राव बीका द्वारा छुड़वाकर लाना लिखा है लेकिन हरिसिंह भाटी व डा. नरेन्द्रसिंह चारण ने बीका द्वारा राव शेखाजी को मुलतान की कैद से छुड़वाकर लाना इतिहास लेखन की भारी भूल और अतिश्योक्ति माना है |

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