इसलिए है कुचामन किले में वनखंडी बाबा की धुणी सबसे ऊपर

किसी भी दिशा से कुचामन सिटी में प्रवेश करने से एक ऊँची पहाड़ी पर कुचामन का किला नजर आता है और किले पर नजर आती है एक छतरीनुमा आकृति जो किले में सबसे ऊपर बनी है | किले में जितने भी महल, मंदिर व अन्य इमारतें है वे इस छतरीनुमा आकृति से नीचे बनाई गई है | दूर से इस छतरीनुमा आकृति को देखकर हर कोई सोचता है कि यह सुरक्षाकर्मियों द्वारा दूर तक निगाह रखने के लिए बनाई गई होगी, पर ऐसा नहीं है| कुचामन के पास ही स्थित मिठड़ी के कुंवर जालमसिंह ने कुचामन से कुछ दूर शिविर डाला हुआ था| रात के समय उन्हें कुचामन के पहाड़ की चोटी पर रोशनी दिखाई दी| दूर पहाड़ी की चोटी से रोशनी नजर आती देख जालमसिंह की जिज्ञासा बढ़ गई कि रात के समय कौन व्यक्ति हो सकता है जो सुनसान पड़ी पर रौशनी जलाये बैठा है| सुबह होते ही जालमसिंह ने पहाड़ी की उस सबसे ऊँची चोटी की ओर रुख किया, जहाँ से उन्हें रात को रौशनी नजर आई थी| पहाड़ी पर पहुँच कर जालमसिंह ने देखा कि एक महात्मा धूणा रमाये वहां तपस्या कर रहे हैं और यह रौशनी उन्हें की धुणी में प्रज्वलित अग्नि की दिखाई दे रही थी|

जालमसिंह के जाते ही महात्मा ने जालमसिंह को नाम से पुकारा | अनजान महत्मा के मुख से अपना नाम सुनकर जालमसिंह को समझते देर नहीं लगी कि ये महात्मा चमत्कारी है और जालमसिंह ने महात्मा से आशीर्वाद लेकर उनकी धुणी के पास ही किले का निर्माण शुरू कर दिया | राजस्थान के प्रमुख दुर्ग पुस्तक में डा. राघवेन्द्र सिंह मनोहर लिखते हैं –“प्रचलित लोक मान्यता के अनुसार यहाँ के पराक्रमी मेड़तिया शासक जालिमसिंह ने वनखंडी नामक महात्मा के आशीर्वाद से जो उस वक्त पहाड़ी पर तपस्या करते थे, कुचामन किले की नींव रखी|” इस पुस्तक के अनुसार उक्त महात्मा का नाम वनखंडी महात्मा था, हालाँकि किले में स्थित धुणी परिसर में प्रवेश करते समय एक बड़े द्वार पर “धुणी बाबा काम्प्लेक्स” लिखा है, जिसे पढ़कर लगता है कि किले के वर्तमान व्यवस्थापकों को उक्त महात्मा के नाम का ज्ञान नहीं है|

यह धुणी बाबा काम्प्लेक्स ही किले में सबसे ज्यादा उंचाई पर स्थित है ऊपर बताई छतरीनुमा आकृति वनखंडी महात्मा की धुणी पर बनी है| किले के शासकों ने महात्मा को सम्मान देने के लिए उनके स्थान यानी उनकी धुणी से ऊपर कोई भी ईमारत नहीं बनाई, जो भी महल, मंदिर आदि बनाए गए उनकी उंचाई धुणी से नीचे ही रखी गई| महात्मा के प्रति यह सम्मान यहाँ के शासकों के संस्कार और उनकी धर्मपरायणता परिचय देते हैं | किले के व्यवस्थापकों के अनुसार बाबा की उक्त धुणी आज भी प्रज्वलित है और सुबह शाम धुणी में पूजा अर्चना की पूर्ण व्यवस्था है| यदि आप भी कुचामन किले की सैर करने जा रहे हैं तो वनखंडी महात्मा की धुणी पर जाकर उन्हें प्रणाम कर बाबा का आशीर्वाद जरुर लें |

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