इसलिए बस मेरे शहर चली आई

इसलिए बस मेरे शहर चली आई


उस स्टेशन पर तुम बदहवास सी दौड़ रही थी
गाड़ी तो आई नहीं थी ,पर तुम घबरा रही थी
कुछ इसे ही पलो मे टकराई थी तुम मुझ से
फिर सिलसिला शुरू हुआ मुलाकातों का
ना तुम थी मेरे शहर की, ना मै था तुम्हारे शहर का
मै अपना हक़ किसी और को दे चूका था
और तुम पर हक़ किसी और का था
ना जाने क्यों फिर भी ये दूरियां सिमटने लगी
मै तुमको समझ गया तुम मुझे समझने लगी
एक दूजे की आदत हो गए थे हम
और फिर ना जाने क्यों ये नजदीकियां चुभने लगी
नम आँखों से तुम मुस्कुराती हुई मुड गई थी
तुम ये ना समझना कि मैने साथ छोड़ दिया था तुम्हारा
मै बस कुछ कदम पीछे हट गया था
……………………………………………
आज अरसे बाद तुम फिर मुझे मेरे शहर में क्यों दिख गई
मै बस लिपटना चाहता था एक बार तुमसे
तभी तुम्हारे होंठो ने बुदबुदाया , तुमको मुझ से कुछ काम था
एक बार झूठ ही सही कह देती ,कि रह नहीं पाई बिन मेरे
इसलिए बस मेरे शहर चली आई

केशर क्यारी…..उषा राठौड़

9 Responses to "इसलिए बस मेरे शहर चली आई"

  1. upendra shukla   July 6, 2011 at 6:51 pm

    bahut accha
    "samrat bundelkhand"

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  2. Ratan Singh Shekhawat   July 7, 2011 at 1:56 am

    बढ़िया रचना

    Reply
  3. Uncle   July 7, 2011 at 1:57 am

    हमेशा की तरह आपकी यह रचना भी बढ़िया लगी |

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  4. प्रवीण पाण्डेय   July 7, 2011 at 3:12 am

    गहन अभिव्यक्ति।

    Reply
  5. रश्मि प्रभा...   July 7, 2011 at 4:59 am

    kyun aur kaise ? kya ek kadam piche hatker tumne kuch kaha yaa socha ki uski kitni swabhawikta mar jayegi !

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  6. और फिर ना जाने क्यों ये नजदीकियां चुभने लगी
    नम आँखों से तुम मुस्कुराती हुई मुड गई थी
    तुम ये ना समझना कि मैने साथ छोड़ दिया था तुम्हारा
    मै बस कुछ कदम पीछे हट गया था

    फिर इसके बाद झूठ भी क्यों बोला जाता … बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ..सच्चाई को बयाँ करती हुई

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  7. वन्दना   July 7, 2011 at 7:41 am

    वाह ………किन लफ़्ज़ो मे तारीफ़ करू……… एक दूसरी ही दुनिया मे ले गयीं…………एक ख्याल ज़हन पर छोड गयीं।

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  8. नरेश सिह राठौड़   July 9, 2011 at 2:35 pm

    कम शब्दों में गहरी अनुभूती |

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  9. ummed singh kariri   August 25, 2012 at 3:05 am

    विरहन की अंतर मन की गाथा का संवेदनावो से परुपूर्ण चित्रण किया है आपने उषा राठौर हुकुम !

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