इसलिए नहीं लड़ा था महाराजा सूरजमल ने पानीपत युद्ध

फिल्म पानीपत को लेकर पिछले कई दिनों से भरतपुर के जाट महाराजा सूरजमल मीडिया की सुर्ख़ियों में है | आरोप है कि फिल्म में सूरजमल को लालची दिखाया गया और सोशियल मीडिया में वायरल हो रहे फिल्म के दृश्य में भी महाराजा सूरजमल मराठों से पानीपत युद्ध में सहायता देने के बदले आगरा का किला मांगते दिखे| जबकि भरतपुर के वर्तमान पूर्व महाराजा व राज्य सरकार में मंत्री विश्वेन्द्र सिंह ने न्यूज फॉर राजस्थान के साथ साक्षात्कार में साफ़ किया था कि आगरा का किला तो महाराज सूरजमल पहले ही जीत चुके थे ऐसे में अपने अधीन किला मराठों से क्यों मांगते| ऐसे में सवाल उठता है कि फिर वे कौनसे कारण थे कि सूरजमल ने पानीपत युद्ध में पेशवाओं का साथ क्यों नहीं दिया ?

हमने इस सम्बन्ध में जाट इतिहासकार ठाकुर देशराज का लिखा इतिहास खंगाला तो उसमें महाराजा सूरजमल द्वारा मराठों को पानीपत युद्ध में सहयोग नहीं देने के कई कारण नजर आये | इनमें पहला कारण उस समय दिल्ली में वर्चस्व को लेकर मराठों व सूरजमल के मध्य वैचारिक मतभेद थे| दिल्ली के वजीर पद पर गाजीउद्दीन व नजीबुद्दौला की नजर थी| मराठों के ताकतवर सरदार रघुनाथ राव ने गाजीउद्दीन को वजीर बना दिया| होलकर नजीबुद्दौला जे पक्ष में थे और महाराजा सूरजमल शुजाउद्दौला को दिल्ली का वजीर बनाना चाहते थे| वे नजीबुद्दौला को धोखेबाज समझते थे और उसे मारना भी चाहते थे| इस तरह इन तथ्यों को पढने के बाद साफ़ हो जाता है कि दिल्ली पर वर्चस्व को लेकर कहीं ना कहीं इन सभी पक्षों के बीच अनबन थी | बाकी कारण ठाकुर देशराज ने इस तरह लिखे हैं –

पहला – युद्ध के समय सूरजमल में स्त्रियों व बच्चों को साथ ना रखकर सुरक्षित स्थान पर रखने की सलाह दी, जिसे भाऊ ने अनुचित सलाह मानते हुए उटपटांग बातें की | सूरजमल के रूठने की दूसरी बात ठाकुर देशराज लिखते हैं कि भाऊ ने देहली के आमख़ास की चांदी की छत को उनकी इच्छा के विरुद्ध तुड़वा दिया| महाराज उस छत के एवज में पांच लाख रुपया तक देने को तैयार थे, पर लालची भाऊ को कहीं अधिक का माल उसमें दिखाई दे रहा था| वह हठी व लालची स्वभाव होने के कारण महाराज सूरजमल से बिगाड़ बैठा| छत तुड़वा देने पर भी जब तीन लाख का माल मिला तो सूरजमल ने फिर कहा कि- “आप इस छत को फिर बनवा दीजिये जिससे देहली की प्रजा और आपके प्रति सरदारों का बढ़ा हुआ असंतोष दूर हो जाये|” पर भाऊ ने नहीं माना और सूरजमल का अपमान किया|

देशराज लिखते हैं कि – भाऊ इतने से संतुष्ट नहीं हुआ, किन्तु उसने निश्चय किया कि सूरजमल के डेरों को लूट लिया जाय और उसे गिरफ्तार कर लिया जाय| किन्तु महाराज सूरजमल को होल्कर के द्वारा सूचित किये जाने जाने पर षड्यंत्र का पता लग गया और वह उसी रात अपने लश्कर समेत भरतपुर की ओर रवाना हो गए| भाऊ के सैनिकों ने उनका पीछा किया, लेकिन वह बल्लभगढ़ के किले में पहुँच गए|

जाट इतिहासकार द्वारा उपरोक्त तथ्य पढने के बाद आप खुद इस निर्णय पर पहुँच सकते हैं कि लालची महाराजा सूरजमल थे या मराठा ? लेकिन मराठी मानसिकता से ओतप्रोत फिल्म निर्माताओं ने मराठों को देशभक्त व महाराज सूरजमल को लालची प्रदर्शित कर हमेशा की तरह फिर एक बार इतिहास को विकृत करने का घृणित कार्य किया |

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