इतिहास की एक चर्चित दासी भारमली

ज्ञान दर्पण पर आपने जोधपुर की रूठी रानी के बारे में पढ़ते हुए उसकी दासी भारमली का नाम भी पढ़ा होगा | जैसलमेर की राजकुमारी उमादे जो इतिहास में रूठी रानी के नाम से प्रसिद्ध है अपनी इसी रूपवती दासी भारमली के चलते ही अपने पति जोधपुर के शक्तिशाली शासक राव मालदेव से रूठ गई थी और मालदेव के लाख कोशिश करने के बाद भी वह आजीवन अपने पति से रूठी ही रही| जोधपुर के राव मालदेव का विवाह जैसलमेर के रावल लूणकरणजी की राजकुमारी उमादे के साथ हुआ था | सुहागरात्रि के समय उमादे को श्रृंगार करते देर हो गई तो उसने अपनी दासी भारमली को कुछ देर के लिए मालदेव जी का जी बहलाने के लिए भेजा| भारमली इतनी सुन्दर थी कि उसके रूप लावण्य को देख नशे में धुत मालदेव जी अपने आप को न बचा सके|
श्रृंगार करने के बाद जब उमादे आई और उसने मालदेव जी भारमली के साथ देखकर यह कहकर वापस चली गयी कि ये पति मेरे लायक नहीं है | और वो जीवन भर रूठी ही रही | राव मालदेव ने जोधपुर आने के बाद अपने एक कवि आशानन्द जी बारहट को रानी को मनाने भेजा पर वे भी रानी मनाने में असमर्थ रहे | इस पर कवि आशानन्द जी बारहट ने जैसलमेर के रावत लूणकरणजी से कहा कि अपनी पुत्री का भला चाहते है तो दासी भारमली को जोधपुर से वापस बुलवा लीजिए |

रावत लूणकरण जी ने एसा ही किया और भारमली को उन्होंने जोधपुर से जैसलमेर बुलवा भेजा पर स्वयम लूणकरण जी भारमली के रूप और लावण्य पर मुग्ध हो गए जिससे लूणकरण जी की दोनों रानियाँ ने परेशान होकर भारमली को जैसलमेर से हटाने की सोची | लूणकरण जी की पहली रानी सोढ़ी जी ने उमरकोट अपने भाइयों से भारमली को ले जाने के लिए कहा लेकिन उमरकोट के सोढों ने लूणकरण जी से इस बात पर शत्रुता लेना उचित नहीं समझा |तब लूणकरण जी की दूसरी रानी जो जोधपुर के मालानी परगने के कोटडे के शासक बाघ जी राठौड़ की बहन थी ने अपने भाई बाघ जी को बुलाया |

बहन का दुःख मिटाने हेतु बाघजी शीघ्र आये और रानियों के कथनानुसार भारमली को ऊंट पर बैठकर जैसलमेर से छिपकर भाग आये | लूणकरण जी कोटडे पर हमला तो कर नहीं सकते थे क्योंकि पहली बात तो ससुराल पर हमला करने में उनकी प्रतिष्ठा घटती और दूसरी बात राव मालदेव जैसा शक्तिशाली शासक मालानी का संरक्षकथा | अत: रावत लूणकरण जी ने जोधपुर के ही कवि आशानन्द जी बारहट को कोटडा भेजा कि बाघजी को समझाकर भारमली को वापस ले आये |

दोनों रानियों ने बाघ जी को पहले ही सन्देश भेजकर सूचित कर दिया कि वे बारहट जी की बातों में न आना | जब बारहट जी कोटडा पहुंचे तो बाघजी ने उनका बड़ा स्वागत सत्कार किया और बारहट जी की इतनी खातिरदारी की कि वे अपने आने का उद्देश्य ही भल गए | एक दिन बाघजी शिकार पर गए ,बारहट जी व भारमली भी साथ थे | भारमली व बाघजी में असीम प्रेम हो गया था अत: वह भी किसी भी हालत में बाघजी को छोड़कर जैसलमेर नहीं जाना चाहती थी | शिकार के बाद भारमली ने सूलें सेंक कर खुद विश्राम स्थल पर बारहट जी दी व शराब आदि भी पिलाई | इससे खुश होकर व बाघजी व भारमली के बीच प्रेम देखकर बारहट जी का भावुक-कवि- हृदय बोल उठा –

जंह गिरवर तंह मोरिया, जंह सरवर तंह हंस |
जंह बाघा तंह भारमली ,जंह दारु तंह मंस |

अर्थात जहाँ पहाड़ होते है वहां मोर होते है ,जहाँ सरवर होता है वहां हंस होते है इसी प्रकार जहाँ बाघ जी है वहीँ भारमली होगी ठीक उसी तरह जिस तरह जहाँ दारू होती है वहां मांस भी होता है |

बारहट की यह बात सुन बाघजी ने झट से कह दिया ,बारहट जी आप बड़े है और बड़े आदमी दी हुई वास्तु को वापिस नहीं लेते अत: अब भारमली को मुझसे न मांगना | आशानन्द जी बारहट पर वज्रपात सा हो गया लेकिन बाघजी ने बात सँभालते हुए कहा – कि आपसे एक प्रार्थना और है आप भी मेरे यहीं रहिये |

और इस तरह से बाघजी ने कवि आशानन्द जी बारहट को मनाकर भारमली को जैसलमेर ले जाने से रोक लिया | आशानन्द जी भी कोटडा रहे और उनकी व बाघजी जी की भी इतनी घनिष्ट दोस्ती हुई कि वे जिन्दगी भर बाघजी को भुला ना पाए | एक दिन अकस्मात बाघजी का निधन हो गया , भारमली बाघजी के शव के साथ चिता में बैठकर सती हो गई और आशानन्द जी अपने मित्र बाघजी की याद में जिन्दगी भर बैचेन रहे और उन्होंने बाघजी की स्मृति में अपने उदगारों के पीछोले बनाये |

बाघजी और कवि आशानंद जी के बीच इतनी घनिष्ट मित्रता हुई कि आशानन्द जी सोते उठते बाघजी का नाम ही लेते थे एक बार उदयपुर के महाराणा ने कवि आशानन्द जी की परीक्षा लेने के लिए कहा कि वे सिर्फ एक रात बाघजी का नाम लिए बिना निकाल दे तो मैं आपको चार लाख रूपये दूंगा | कवि पुत्र ने भरपूर कोशिश की कि कवि पिता अपने मित्र बाघजी का नाम कम से कम एक रात्री तो न ले पर कवि मन कहाँ चुप रहने वाला था |
पूरी कहानी व बारहट जी के बनाये पीछोले अगले किसी लेख में |

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10 Responses to "इतिहास की एक चर्चित दासी भारमली"

  1. ओह! भरमाली के चरित्र को कैसे आंका जाये। स्थापित खांचे से अलग है न।

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  2. PADMSINGH   December 5, 2010 at 2:15 pm

    राजस्थान की धरती ढेरों वीरगाथाओं और प्रेम प्रसंगों से भरी पड़ी है… राजस्थान इतिहास के खजाने में अनेक रत्न और नगीने हुए हैं, लेकिन कालान्तर में ऐसा क्या हुआ कि धीरे धीरे राजपूताने की साख और आन आपसी मतभेदों और निजी स्वार्थों की भेंट चढ़ गयी और राजपूत साम्राज्य पतन की ओर बढ़ गया ..

    इतिहास की बहुमूल्य धरोहरों से परिचय कराने के लिए आभार

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  3. ललित शर्मा   December 5, 2010 at 2:42 pm

    भाई भारमली तो दासी थी।
    जहां दिल लग गया वहाँ रह गयी।
    जिसकी लाठी उसकी भैंस

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  4. P.N. Subramanian   December 5, 2010 at 3:59 pm

    मुझे तो उसकी बुद्धि पर तरस आता है क्योंकि
    उसने अपनी दासी भारमली को कुछ देर के लिए मालदेव जी का जी बहलाने के लिए भेजा.

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  5. Pagdandi   December 5, 2010 at 5:13 pm

    kya kya jankariya dete ho hukum ..shukriya …..

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  6. नरेश सिह राठौड़   December 6, 2010 at 11:21 am

    रोचक प्रस्तुतीकरण है | अगली कड़ी का इन्तजार है |

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  7. फ़िरदौस ख़ान   December 6, 2010 at 12:25 pm

    जंह गिरवर तंह मोरिया, जंह सरवर तंह हंस |
    जंह बाघा तंह भारमली ,जंह दारु तंह मंस |

    रोचक प्रस्तुतीकरण…

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  8. ताऊ रामपुरिया   December 6, 2010 at 2:50 pm

    बहुत ही रोचक प्रस्तुति, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  9. प्रवीण पाण्डेय   December 6, 2010 at 2:55 pm

    बड़ी रोचक कथा।

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  10. कुन्नू सिंह   December 6, 2010 at 6:34 pm

    बहुत बढीया और रोचक है।

    रात मे जैसा गांव दिखता है वैसा ही लगा।

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