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Wednesday, May 25, 2022

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इतिहास का ऐसा विश्लेषण करने वालो पहले अपने अन्दर झांको

इतिहास का विश्लेषण वर्तमान युवा पीढ़ी का पसंदीदा विषय है| जब से हिन्दुत्त्व व राष्ट्रवाद का उन्माद बढ़ा है तब से इतिहास विश्लेषण का कार्य इसी विचारधारा के अनुरूप त्वरित गति से बढ़ा है| इतिहास में जिन शासकों ने तत्कालीन परिस्थितियों के मध्यनजर अपने पड़ौसियों या फिर अपने से बड़े शासकों से संधियाँ कर अपने राज्य का चहुंमुखी विकास किया, राज्य में शांति स्थापित कर प्रजा को सुखी जीवन दिया| आज के थोथे गाल बजाने वाले शूरवीर आज के सन्दर्भ में उस इतिहास का विश्लेषण कर उन शासकों को गद्दार, राष्ट्रद्रोही के प्रमाण पत्र बांटते नजर आते है| पर वे नहीं समझते कि ऐसा करके वे अपने समाज, देश के साथ सबसे बड़ी गद्दारी कर रहे हैं| एक तरफ हमारे इतिहास पुरुषों को वामी-सेकुलर गैंग ने फर्जी इतिहास लिखकर कलंकित किया, अब दूसरी और हिन्दुत्त्व व राष्ट्रवाद रूपी अफीम के नशे में हम खुद अपने इतिहास पुरुषों का चरित्रहनन करने में लगे हैं|

आजकल 16 साल के बच्चे से लेकर बूढ़े तक जिसके हाथ में स्मार्टफोन है वह फेसबुक पर किसी भी राजनैतिक चर्चा में ज्ञान झाड़ देता है – मानसिंह को महाराणा प्रताप का साथ देना चाहिए था, जयचंद ने पृथ्वीराज का साथ नहीं देकर देश के साथ गद्दारी की आदि आदि| इन मूर्खों को यह नहीं समझ कि उस वक्त का राजनैतिक परिदृश्य अलग था| सबकी अपनी अपनी राजनैतिक आवश्यकताएं थी| आमेर के राजा हमेशा मेवाड़ के साथ रहे, खानवा युद्ध में राणा सांगा के नेतृत्व में युद्ध लड़ा, उसके बाद भी बाबर के बेटे हुमायूँ को राणा सांगा की विधवा रानी कर्मावती ने राखी भेजकर भाई बना लिया, तब भी आमेर हुमायूँ के साथ संघर्षरत था| आमेर के राजा भारमल एक तरफ गृहकलह व दूसरी तरफ मीणाओं की लूटपाट व पड़ौसी मुस्लिम राज्यों के आक्रमण से त्रस्त थे, तब उन्होंने मेवाड़ से सहायता मांगी, मेवाड़ ने गृहकलह सुलझाने की छोटीसी कोशिश की व बाद में यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि यह आपका पारिवारिक मामला है खुद निपटिये| फिर उक्त मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह भी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे थे| ऐसे में राजा भारमल को अपनी पीठ मजबूत करने के लिए एक शक्तिशाली मित्र की आवश्यकता थी, जो उन्हें अकबर के रूप में मिला और उन्होंने अपने राज्य में स्थिरता के लिए संधि कर ली|

ठीक इसी प्रकार जयचंद व पृथ्वीराज के मध्य युद्ध हो चुका था| पृथ्वीराज जयचंद को अपमानित कर चुके थे| फिर गौरी के साथ युद्ध के लिए जयचंद को आमंत्रित भी नहीं किया गया| ऐसे में जयचंद तटस्थ रहे, पर जैसा कि उनके ऊपर गौरी को सहायता देना व बुलाने का आरोप है वह सरासर झूठा व दुष्प्रचार है| गौरी व जयचंद के मध्य किसी भी तरह के संपर्कों का किसी भी इतिहास शोधार्थी को सबूत नहीं मिले| खैर………ये इतिहास का विषय है जिस पर कई लेख ही नहीं कई किताबें लिखी जा सकती है पर यहाँ विषय युवाओं की मानसिकता का है|

अपने महान पूर्वजों की आपसी फूट (जो थी ही नहीं) को लेकर उनकी आलोचना करने वाले खासकर राजपूत युवाओं से अनुरोध है कि इतिहास का विश्लेषण करने के बजाय खुद के अन्दर झांके, आत्म विश्लेषण करे कि क्या उन्होंने इतिहास से सबक लेकर अपने आपको सुधार लिया| महाराणा प्रताप-मानसिंह, जयचंद- पृथ्वीराज प्रकरण के समय तो आप नहीं थे पर आज तो आप उपस्थित हैं फिर आपके सामने जिन राजपूत नेताओं ने तीव्र विरोध कर गजेन्द्रसिंह शेखावत को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनने से रोक दिया, उन राजपूत नेताओं का आपने क्या उखाड़ लिया| उखाड़ना तो दूर उनके कृत्य के खिलाफ आपनके मुंह से विरोध के शब्द तक नहीं निकले, ना फेसबुक पर उनके खिलाफ लिखने के लिए आपकी अंगुलियाँ चली|

अमरूदों के बाग़ में राजपूत एकता तोड़ने के लिए जिम्मेदार राजनेताओं का आपने क्या बिगाड़ लिया| बिगाड़ना तो दूर उन कथित जिम्मेदार राजनेताओं की आज भी आप चापलूसी करते हुए नजर आते हो| हाल ही देशभर के क्षत्रिय संगठनों को एक होने से रोकने के लिए केंद्र में स्थापित एक बड़े राजपूत नेता ने जो किया उसका विरोध आप नहीं कर सके| वर्तमान समाज के साथ गद्दारी करने वालों की खिलाफत करते समय शायद आपके मुंह में दही जम जाता है| आपकी सबसे बड़ी पूजनीय माता पद्मिनी का सम्मान नहीं बचाने वाले प्रधानमंत्री मोदी की भक्ति आज भी आप पूरी निष्ठा से कर रहे हैं|  आज राजपूत समाज राजनैतिक रूप से अपना स्वाभिमान बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है| इस संघर्ष में आप में से ही कई समाज बंधू पार्टी भक्ति के चक्कर में कमजोर करने में लगे हैं| संघर्ष करने वाले बंधुओं को ये तत्व गद्दार की संज्ञाएँ दे रहे हैं जबकि समाज के विरुद्ध कार्य कर खुद समाज के साथ गद्दारी कर रहे हैं| आप उनका कुछ नहीं बिगाड़ पा रहे, ना उन्हें समझाकर समाज की जाजम पर ला पा रहे है ऐसे में आपको अपने महान पूर्वजों की गलतियाँ तलाशने व उनके इतिहास की आलोचना करने कोई अधिकार ही नहीं नहीं है|

सीधी सी बात है आपको इतिहास का विश्लेषण करने की नहीं, आत्म-विश्लेषण करने के लिए अपने अन्दर झाँकने की जरुरत है|

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