आशियाने

आशियाने

आशियाने


देखा होगा सागर किनारे मिट्टी के घरोंदो को टूटते हुए …….उन पर बच्चो को रोते हुए ……….पर .…….पर …….देखा है मेने घरो को उजड़ते हुए …….जवानों को देखा है मैने झोपड़े हटाते हुए ………बच्चो को चिलाते हुए ….माँ को सहलाते हुए ……….पास की इमारत के लोग देख रहे है इस नज़ारे को अपनी खिडकियों से ……..प्यासे के पानी मांगने पर भगा रहे है झिडकियो से ……….देखा है मैने घरो को उजड़ते हुए …………….देखा है शान से लोगो को वहाँ खड़े हुए …………..देख रहे है जो तिनको को बिखरते हुए ,……….किसी के आशियाने को उजड़ते हुए धुल को उड़ते हुए ……देखा है मैने घरो को उजड़ते हुए …………..झोपड़े ही क्यों देखा है मैने दुनिया की ऊँची इमारतों में रहने वालो को भी बिलखते हुए ……देखा है मैने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर से हवाई विमान टकराते हुए ………देखा है मैने घरो को उजड़ते हुए ……………….

18 Responses to "आशियाने"

  1. बहुत मार्मिक …

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  2. Tany   August 12, 2010 at 7:39 pm

    Dua hai Ki Kamyabi ke har sikhar per aap ka naam hoga,Aapke har kadam per duniya ka salaam hoga,Himmat se mushkilon ka saamna karna koi aapse sikhe,Hamari dua hai ki waqt bhi ek din aapka gulam hoga.Well Done Girl Keep Going 🙂

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  3. अविनाश वाचस्पति   August 12, 2010 at 10:34 pm

    समन्‍वयन तीन हकीकतों का
    जिनमें घुली मिली हैं
    खूब सारी सच्‍चाईयां।

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  4. Ratan Singh Shekhawat   August 13, 2010 at 1:13 am

    झोपड़े ही क्यों देखा है मैने दुनिया की ऊँची इमारतों में रहने वालो को भी बिलखते हुए
    @ ये तो समय चक्र है सभी के साथ आता है कभी झोपड़े में तो कभी महल में |

    बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति ! दर्द वही महसूस करता है जिसके चोट लगी हो !

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  5. क्षत्रिय   August 13, 2010 at 1:16 am

    मार्मिक रचना

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  6. Uncle   August 13, 2010 at 1:31 am

    Nice

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  7. Rajul shekhawat   August 13, 2010 at 3:20 am

    bohat badiya ………

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  8. नीरज जाट जी   August 13, 2010 at 4:40 am

    सही बात है, घर सबके उजड सकते हैं। यह तो समय है।

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  9. SUNIL KUMAR   August 13, 2010 at 6:43 am

    bahut achchhi rachana…….

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  10. Mahavir   August 13, 2010 at 6:46 am

    bahut sahi kaha sa

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  11. hem pandey   August 13, 2010 at 8:21 am

    सुन्दर अभिव्यक्ति.

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  12. वन्दना   August 13, 2010 at 10:36 am

    सच्चाई से रु-ब-रु करवाती हुयी बेहद मार्मिक कविता ।

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  13. नरेश सिह राठौड़   August 13, 2010 at 11:38 am

    उजडना बसना ये प्रकृति का नियम है | आपकी कविता में एक दर्द की अभिव्यक्ती भी है एक बेबस का दर्द आज कल बहुत कम लोग समझ पाते है |

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  14. ताऊ रामपुरिया   August 13, 2010 at 3:32 pm

    बहुत ही सटीक और मार्मिक रचना.

    रामराम.

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  15. प्रवीण पाण्डेय   August 13, 2010 at 3:49 pm

    आशियाना चले जाने का दुख बड़ा गहरा होता है।

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  16. परमजीत सिँह बाली   August 13, 2010 at 4:29 pm

    बहुत भावपूर्ण रचना है बधाई।

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  17. संजय भास्कर   August 19, 2010 at 1:12 am

    उजडना बसना ये प्रकृति का नियम है

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  18. संजय भास्कर   August 19, 2010 at 1:13 am

    सुन्दर भावों को बखूबी शब्द जिस खूबसूरती से तराशा है। काबिले तारीफ है।

    Reply

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