आभास

आभास

आभास ही सही क्षितीज पर धरा और अम्बर का मिलन तो दिखता है …..

पर तुम को क्या हुआ तुम तो मेरे अपने थे ना,

फिर तुमने अपना रुख क्यों मोड़ लिया

हर आहट पर लगता है तुम आये हो ,

पर क्यों रखु मैं अपने ह्रदय द्वार खुले अगर वो तुम ना हुए तो ?

वो हलकी सी चपत लगा दी थी तुमने ,

जब मैंने कहा था एक दिन दूर चली जाउंगी

अब खुद क्यों अपने वादे से फिर गए हो

तकते तकते अब तो पलके भी ना भीगती है

पर हाँ आज भी हर बार जाने से पहले एक बार मुड के देख लेती हूँ

केसर क्यारी ….उषा राठौड़

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